भिंडी का भाव
रामदीन के घर आखिर वह घडी आ ही गई थी
जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। उसके घर शहनाई क्या बजी जैसे पूरे गाँव में
उत्सव मनने लगा। जानकीदास हलवाई ने पूरे ग्यारह सेर पेडे बनवाकर रामदीन के घर
भिजवाए। भला क्यों न भेजता, रामदीन जैसे भले इंसान की आखिर भगवान ने सुन ही ली थी।
उसके यहाँ देर जरूर है पर अन्धेर नहीं, गाँव के हर व्यक्ति की जुबान पर बस यही बात
थी। रामदीन ने पूरे दस बरस अपने आँगन में
बच्चे की किलकारी सुनने का इंतजार किया था। छोटे से गाँव में शादी के बाद इतने
लम्बे समय तक बच्चे का जन्म न हो तो लोग तरह तरह की बातें उछालने लगते हैं। वह तो
रामदीन का भला व्यवहार ही था जिसके कारण उस पर छींटाकशी करने की बजाए लोग दुआएँ
करते रहे कि रामदीन के घर एक नन्हे-मुन्ने के रूप में खुशियाँ आएँ।
किसी काम से पास के शहर में गई करीमा चाची
ने जब अपने फूफा के यहाँ रामदीन के घर बच्चे के जन्म की खबर सुनी तो दौडी-दौडी
बाजार गई, सवा सेर पेडे और एक झुनझुना खरीद कर शाम की रेल से ही गाँव कौट आई।
रामदीन के यहाँ गाना-बजाना जारी था। करीमा चाची ने नन्हे की बलाइयाँ लीं और
बहुरानी की गोद भरी। नन्हे से बच्चे को जब चाची ने गोद में लिया तो उनकी आँखों में
खुशी के आँसू छलछला आए। बोलीं- ‘बडा होके अपने अब्बा पर जाना,बडा नेक इंसान बनेगा
हमारा नन्हा रामदीन।’
आदमी के पहचान हर व्यक्ति अपने-अपने हिसाब
से करता है। रामदीन भला आदमी है यह बात करीमा चाची भी कहतीं थीं और जानकीदास हलवाई
भी। जहाँ जानकीदास उसकी खुशमिजाजी से प्रभावित था, वहीं करीमा चाची रामदीन की
दरियादिली से। करीमा चाची को शौक था तो बस अच्छा खाने का। बाजार में जो नई सब्जी
आती,सबसे पहले करीमा चाची के घर ही बनती थी। कारण-रामदीन की इकलौती सब्जी की दुकान
जो थी गाँव में। शहर से जो ताजी सब्जी वह लेकर आता करीमा के घर पहले पहुंचाता था।
अगर करीमा स्वयं उसकी दुकान पर आती तो बडे ही प्रेम से ताजी सब्जियाँ तोलता और
तोलने के बाद कुछ सब्जी ऊपर से और थैली में डाल देता।
बाद में करीमा चाची तो गाँव में ही रह गई,
लेकिन रामदीन का परिवार शहर चला आया। रामदीन की खबरें आते-जाते लोगों से करीमा को
मिलती रहतीं। किसी ने बताया था कि शहर में रामदीन ने ‘कारपोरेशन’ के सब्जी बाजार
में अपनी दुकान ले ली है और उसका धन्धा खूब अच्छा चल निकला है। फुटकर के साथ-साथ
उसने थोक व्यवसाय भी शुरू कर दिया है। कुछ दिनों बाद चाची को पता चला कि रामदीन ने
एक मकान भी शहर में खरीद लिया है और उसका बेटा भी उसके करोबार में हाथ बंटाने लगा
है। करीमा चाची को यह सब सुनकर बहुत खुशी होती, ईश्वर से यही दुआ करती- ‘रामदीन और
उसका बेटा खूब फलें-फूलें।’
समय बीतता रहा। खबर मिली रामदीन नही रहा।
करीमा चाची बूढी हो गईं और फूफा के लडके के पास रहने शहर चली आईं। चाची बूढी जरूर
हो गई थी पर खाने-पीने का शौक पहले जैसा ही अब भी बरकरार था। फूफा के लडके की बहू लाख बढिया खाना पकाती पर
चाची को तृप्ति नही होती थी। ‘यह क्या बेकार कूढा बना डाला है, तुम्हे तो सब्जी
लाना- बनाना ही नही आता, कितनी सडी-गली गिलकियाँ लाई हो, बैंगन में कितने छेद
हैं।’ ऐसे जुमले तो बेचारी बहू को रोज ही सुनने को मिलते थे।
परेशान हो कर बहू ने एक दिन थैली चाची को
थमाई और बोल दिया-‘पास ही बाजार है- जा कर खुद ही ले आओ।’
और चाची बाजार के लिए निकल पडी। सोचने लगी
रामदीन की भी सब्जी की दुकान है इसी शहर में, अब उसका बेटा बैठता होगा। शक्ल तो
जरूर मिलती होगी रामदीन से, बचपन में तो उसके जैसा ही दिखता था। खुदा ने चाहा तो
उसी की दुकान से सब्जियाँ खरीदूंगी।
और वास्तव में चाची की खुदा ने सुन ली।
सब्जी की दुकान पर जैसे हूबहू रामदीन ही बैठा था। चाची की चाल खुशी से तेज हो गई।
दुकान पर पहुंची और रामदीन के बेटे की और देख मुस्कुराई तो रामदीन के बेटे ने
उन्हे ऊपर से नीचे तक निहारा। चाची की खस्ता माली हालत उनके पहने कपडों से बयान हो
रही थी। चाची ने सब्जियों की टोकरियों पर नजर दौडाई। उनकी मनपसन्द सब्जियों से
टोकरियाँ भरी हुईं थीं। मनपसन्द भिंडी की टोकरी से भिंडियाँ छांटने के लिए जैसे ही
उन्होने हाथ आगे बढाया चार भिंडियाँ अलग से देने वाले बाप के बेटे ने झुंझलाकर
चाची का हाथ पकड लिया- ‘हाथ मत लगाओ माई, तुम्हारे बस की नही है।’
चाची की आँखों के सामने कभी रामदीन आ रहा
था, तो कभी ताजी भिंडियों की टोकरी, तो कभी फूफा के बेटे की बहू का बुझा-बुझा सा
चेहरा। इस बीच चाची को पता ही नही चला कि नए ग्राहकों की भीड ने उन्हे दुकान से
बहुत दूर ढकेल दिया था।
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