Sunday, November 15, 2015

बरतन

बरतन

दादी का बक्सा खुला और हंगामा शुरु हो गया। मुझे पता नहीं था कि मैनें इतना बड़ा अपराध कर दिया है। बरतनों की तरह सब लोग खड़खड़ा रहे थे। छोटी भाभी ने तो यहाँ तक कह दिया कि-'दादी के साथ रहने और उनकी देखभाल करने का यह मतलब तो नही कि यही उनकी चीजों का वारिस है।' चाचाजी पिताजी को उलाहना दे रहे थे-'आपने कैसे अधिकार दे दिया इसे ऐसा करने का। यह कौन होता है अकेला फैसला लेने वाला!'

बहुत देर तक चलता रहा यह कुहराम। मै चुपचाप निकलकर मुहल्ले के मंदिर मे आ गया। हर साल देवी पूजन पर सब इकट्‌ठा होते रहे हैं किंतु इसबार कुछ दूसरा ही  दृश्य उपस्थित हो गया था। खाना पीना सब जहर समान हो गया।

दादी थीं तब भी बक्सा खुलता था। बक्से से निकलते ताँबे-पीतल के बरतनों को परिवार की नववधुएँ और बच्चे बड़े कुटुहल से देख आँखें झपकाते थे। इन्हीं ऐंटिक बरतनों मे भोजन बनता था पूजा-अर्चना के बाद पूरा कुटुम्ब एकसाथ बैठकर भोजन ग्रहण करता था। सबका साथ होने और पकवानों के स्वाद की अद्‌भुत अनुभूति से ऐसा लगता जैसे दादी के बरतनों और उनके ममतामयी स्पर्श में कोई जादू सा समाया रहता था जिससे भीतर बाहर अमृत-वर्षा होने लगती थी। दादी, माँ,चाची, भाभियाँ,बहुएँ,पौत्र-वधुएँ सब एक साथ इकट्‌ठी होतीं थीं लेकिन पीढ़ियों का अंतर स्पष्ट दिखाई देता था। सबके अपने-अपने घर परिवार थे लेकिन देवी पूजन दादी के साथ पैतृक घर में ही मनाने की परंपरा कई वर्षों से जारी थी।

दादी के गुजर जाने के बाद हर साल देवी पूजन पर सब लोग इकट्‌ठे जरूर होते लेकिन पहले वाली बात अब नहीं रही। तैयार भोजन कैटरर से मंगवा लिया जाता,  प्रसाद जितना माँ घर पर बनाती। समय मिलता तब परिवार के सदस्य दिनभर में कभी भी अपनी सुविधानुसार आकर प्रसाद ग्रहण कर लौट जाते। धीरे-धीरे दिन भर होने वाला आनंदोत्सव रस्म अदायगी में बदल गया। दादी का बक्सा अब भी खुलता था ,बरतन भी निकलते लेकिन उनकी साफ सफाई और रख-रखाव किसी के बस की बात नहीं रह गया था। बरतनों को देखकर सबकी आँखे अब भी चौंधिया जाती थीं लेकिन दादी के बरतनों से होने वाले जादू की स्मृतियों का स्थान बरतन बाजार की दुकानों तथा पीतल-ताँबे के वर्तमान भावों की चर्चा ने ले लिया था।

पिछले माह उस वक्त मुझे इस हंगामें का जरा भी अंदाजा नही था जब मैने मंदिर प्रांगण में चेनैई से आए कलाकार का काम देखा था। शिवमूर्ति ने अपनी भट्‌टी मंदिर के बाजू में लगाई थी। धातु को पिघलाकर सांचों में डालते ही  मनचाही मूर्ति बन जाती थी। मुहल्ले वाले बेकार हो गए बरतनों की मूर्तियां बनवा रहे थे।  दादी के बरतनों का इससे अच्छा उपयोग उस समय मेरी  दृष्टि में शायद कोई और नहीं था। एक घंटे से भी कम समय में दादी के बरतन  शिव, गणेश, दुर्गा, सरस्वती, हनुमानजी और नटराज की खूबसूरत प्रतिमाओं में रूपांतरित हो चुके थे।

आज वे ही मूर्तियाँ दादी के बक्से से निकली थीं। मेरे लाख समझाने के बावजूद कोई मानने को तैयार नहीं था कि एक-एक मूर्ति को अपने-अपने घर में स्थापित कर दादी की स्मृतियों को संजोया जा सकता है। बरतनों से मूर्तियाँ तो मैने जरूर बनवा लीं थीं किन्तु मेरे भीतर कुछ मूर्तियाँ आज दरक भी गर्ईं थीं।



No comments:

Post a Comment