ज्वार भाटा
तहसील कार्यालय जाते हुए गिरधारी की निगाह अचानक किशनलाल के झोपड़े पर पड़ी।कितनी बड़ी गलती की थी किशनलाल ने। बड़े दफ्तर से आए बैंकवाले साहब ने बहुत समझाया था कि इस बार वह चूके नहीं और वर्षों पुराने अपने कर्ज से छुटकारा पा
ले, ईमानदारी पर लगे निरर्थक धब्बे को ढ़ोते रहने में कोई समझदारी नही है।वैसे भी सरकार
कर्ज का अधिकाँश हिस्सा माफ कर
रही थी,कुछ
राशि बैंकवाले समझौता योजना में छोड़ रहे थे, ले देकर चौथाई भाग
की व्यवस्था अपने पास से करनी थी लेकिन किशनलाल वह भी नहीं कर पाया।
भले आदमी थे बडे अफसर । धौंस-धपट की बजाए दुनियादारी की बाते कीं,कर्ज नहीं चुकाने का ऊँच-नीच समझाया लेकिन उनकी बातों का किशनलाल पर उल्टे घड़े पर पानी जैसा असर हुआ। किशनलाल को तो हर बार जैसे सख्त वसूली अधिकारियों तथा बद-जुबान एजेंटों की फटकार सुनने की आदत सी हो गई थी। धीरे-धीरे कर्ज की राशि ब़ड़ती गई और उसकी चुकाने की क्षमता से बाहर हो गई। अन्ततः वही हुआ जो गए साल मुरारी के साथ हुआ था। फसल के कीड़े मारने वाली दवाई पीकर किशनलाल ऐसा बेहोश हुआ कि बड़े अस्पताल के बड़े डाकटर साहब भी उसे होश में नहीं ला सके ।
किशनलाल का किस्सा गिरधारी के मन से हटता ही नहीं था । वह सोंचे जा रहा था।एक बेटा है किशनलाल का, न जाने कौनसा दंड मिला है उसे, दिन भर घानी के बैल की तरह चबूतरे पर चक्कर काटता रहता है। एक बेटी है जो सयानी हो गई है लेकिन दिनभर पार्वती काकी के साथ घर और खेत पर काम में जुटी रहती है। किशन के जाने के बाद कैसे हो पाएगा उसका ब्याह । चबूतरे पर चक्कर काटते डूंडे बैल को कब तक खिला सकेगी बूढी काकी।
गिरधारी खुद अपने कर्ज को लेकर परेशान रहता है। हर फसल पर किश्त जमा करवाता है लेकिन बात बनती
नहीं। मूलधन ज्यों का त्यों मुँह चिढ़ाता रहता है। ऊपर से इस बार फिर पाला पड़
गया है।बरबाद हो गई है फसल। कहीं ऐसा न हो कि मुरारी के बाद किशनलाल और उसके बाद वह़ । ऩ न, ऐसा नहीं सोंचना चाहिए।
विचारों मे डूबे गिरधारी को पता ही नहीं चला कि कब तहसील कार्यालय में पहुँच कर वह शुक्ला बाबू के सामने लगी फसल नुकसान पर मिल रहे मुआवजा प्राप्त करने वाले किसानों की लंबी लाइन में खड़ा हो गया था। अपनी बारी आने पर उसने रजिस्टर में दस्तखत किए और चैक लेकर बैंक की ओर चल दिया।
नौ हजार सात सौ रुपयों का चैक मिला था। चलो इतनी मदद तो मिली। इसबार किश्त भी जमा नहीं करनी है। पाला पड़ने के कारण बैंक ने थो़ड़ी राहत देकर किश्त की तारीख आगे बढ़ा दी है। हाल फिलहाल तो ऐसी नौबत नही आई है कि रेल पटरियों पर लेटना पड़े। पर किशनलाल के परिवार का क्या होगा़ ? उनका तो मुआवजा भी खटाई में पड़ा हुआ है और होगा भी कितना़ यही हजार बारह सौ़ , पार्वती काकी क्या करेंगीं ? गिरधारी के अंदर उमड़ते विचार सागर में एका-एक ज्वार सा उफना और एक फैसला निकल कर बाहर आया़ , मुआवजे का अपना चैक वह पार्वती काकी को दे देगा। अब सागर में भाटे की स्थति थी।
गिरधारी ने बैंक से पैसे लिए और पार्वती काकी के घर की और रवाना हो गया।
सागर अब शांत था। मनुष्यता की नाव में सवार गिरधारी के चेहरे पर आनन्द की अद्भुत आभा स्पष्ट दिखाई दे रही थी।
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