रोशनी के पंख
ननकू की गुमटी पर थोडी देर गपशप करके
सुखीराम अपनी झोपडी मे लौटा तो देखा कि चिमनी की रोशनी मे काशी अब तक पढ रहा था।
‘सो जा बेटा काशी, बहुत रात हो गई है।’
सुखीराम ने बेटे के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा ।
‘दादा, थोडा सा और पढना बचा है, कल तिमाही
टेस्ट है, गुरूजी ने कहा है,इस परीक्षा के नम्बर भी वार्षिक परीक्षा के रिजल्ट मे
जुडेंगे।’ चिमनी के उजाले मे अपनी किताब के पन्ने पर नजर गडाए-गडाए ही काशी ने
कहा।
तभी हवा का तेज झोंका आया और चिमनी की लौ
फडफ़डाने लगी। किसी तरह काशी अपने हाथो एवम किताब की आड करके चिमनी को बुझने से
रोकने की कोशिश करने लगा।
सुखीराम को मन मे इस बात का बडा दुख रहता
था कि काशी पढना चाहता है लेकिन स्थिति
ऐसी नही है कि उसे रोशनी भी उपलब्ध करा सके। कौनसा सुख मिला है उसे अपने जीवन में।
लोग ठीक ही कहते हैं न जाने क्या सोंचकर माँ बाप ने उसका नाम सुखीराम रखा
होगा। हाँ, सुखीराम को थोडी खुशी तब जरूर
मिली थी जब काशी परीक्षाएँ पास करते हुए पाँचवी कक्षा मे पहुँच गया था।
सागवान के घने जंगलों के बीच से घाटियों
वाला हाइवे गुजरता था। सडक से लगकर कुल जमा सात झोपडियों की बस्ती ही सुखीराम का
गाँव थी। पत्नी कुसुमा और वह जंगलों के ठेकेदारों के घरों और खेतों मे हाड-तोड
मेहनत करके किसी तरह अपना खर्चा पानी चला पा रहे थे। ठेकेदार के परिवार और उनके
रहन सहन को देखकर सुखीराम ने इतना तो समझ ही लिया था कि अपने बेटे काशी को वह
स्कूल मे जरूर डालेगा। पढ लिख गया और लिखा-पढी का साफ-सुथरा काम-धन्दा मिल जाए तो
उसकी तरह खून तो नही जलाना पडेगा।
जब सरकार ने उसकी बस्ती से थोडी दूर स्कूल
खोला तो सुखीराम ने आगे रहकर काशी को दाखिल करा दिया। आदिवासी बच्चों को पंचायत और
जिले का शिक्षा विभाग भी सहयोग कर रहा था। काशी की लगन और चिमनी की रोशनी मे उसे
पढता देखकर माँ बाप की तो जैसे आत्मा तृप्त हो जाती थी। ऐसे मे यह हवा.... न जाने
कब उसकी बस्ती मे बिजली आएगी। न जाने कब काशी बल्ब की तेज रोशनी मे पढाई कर सकेगा।
उस दिन बस्ती से लगी हुई पहाडी के आस-पास
गहमागहमी दिखाई दे रही थी। बडे-बडे पंखों के आकार के कुछ यंत्र तथा विशालकाय
खम्बों के हिस्से ट्रकों पर लादकर पहाडी के ऊपर पहुँचाए जा रहे थे। एक ट्रकवाले से
सुखीराम ने जानना चाहा तो पता चला कि पहाडी पर हवा से बिजली बनाने की मशीनें लगाई
जा रहीं हैं। एक बार फिर सुखीराम को खुश होने का अवसर मिल गया। चलो अच्छा रहा...
अब अपनी ही पहाडी पर हवा से बिजली बनेगी...अपना काशी बिजली के बल्ब की रोशनी मे पढ
सकेगा।
थोडे दिन बाद एकबार फिर पहाडी पर हलचल
दिखाई दे रही थी। ऊपर तक जाने वाले रास्ते को रंग बिरंगी झंडियों से सजाया गया था।
पहाडी पर अनेक दैत्याकार पंखे रावण के पुतलों की तरह खडे हो गए थे। सयंत्र का
उदघाटन विदेशी कम्पनी का कोई बडा अफसर कर रहा था, प्रदेश के कोई मंत्री भी इस अवसर
पर मौजूद रहने वाले थे। ननकू की गुमटी पर
खडे सुखीराम और उसकी बस्ती के लोग बडे कौतुहल से सारा नजारा देख रहे थे। पटाखों की
गूँज और रंगीन गुब्बारों के आकाश मे उडते
ही विशालकाय पंखे हवा के प्रवाह से घूमने लगे और शायद मशीनों ने बिजली बनाना शुरू
कर दी थी।
सुखीराम की बस्ती से होकर गुजरने वाली हवा
के प्रवाह से पहाडी के पंखों को घूमते हुए दो साल बीत गए । सुखीराम समझ ही नही पा
रहा था कि उसकी हवा, उसकी पहाडी की मदद से बनने वाली बिजली आखिर उसकी बस्ती और
उसकी झोपडी तक क्यों नही पहुँच पा रही है। कहाँ उड गई पवन ऊर्जा पंख लगा कर...।
कल काशी की आठवीं कक्षा का इम्तिहान है।
हवा का झोंका एकाएक फिर आया, चिमनी की लौ फिर लहराई, लेकिन काशी ने अपने दोनो
हाथों से बुझने से उसे बचा लिया था ।
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