Sunday, November 15, 2015

उजाले की ओर

उजाले की ओर

बडी देर से राधा अपनी बेटी हेमा को लेकर कतार मे लगी हुई थी। हेमा का शरीर बुखार से तप रहा था और डाक्टर को दिखाने से पहले अस्पताल का पर्चा बनवाना जरूरी था। मौसम बदलते ही जैसे हर  कोई बीमार हो गया था।  वह तो मनोरमा आँटी ने सुझा दिया था कि जवाहर चौक के सरकारी अस्पताल मे हेमा को दिखा दे, वहाँ दवाइयाँ भी मुफ्त मिल जाएँगी। आँटी ने वहाँ तक का रास्ता भी समझा दिया था वरना इस नए शहर मे वह परेशान हो जाती। सवेरे जल्दी ही घर से निकलकर वह यहाँ चली आई और लाइन में लग गई।

अभी कुछ ही समय हुआ था राधा को इस शहर मे आए हुए। शहर का रंग अभी उस पर नही चढा था। पढी लिखी तो वह नही थी किंतु उसके अच्छे काम  के कारण बहुत से घरों मे उसे बर्तन साफ करने तथा झाडू पौछा लगाने का काम मिल गया था। राधा के विनम्र व्यवहार एवम सरल स्वभाव के फलस्वरूप मनोरमा आँटी ही क्या अन्य मेडमें व दीदियाँ भी उसे सहयोग कर देतीं थीं।

आँटी ने ही कहा था कि पहले खिडकी  से पर्चा बनवा लेना फिर डाक्टर साहब देखेंगे सो वह लाइन मे लगी हुई थी। अंतत: वह खिडकी  तक पहुँच ही गई। अन्दर बैठे बाबू ने हाथ बढाते हुए उससे कहा  - ‘लाओ बिल दो बाई!’ 
राधा अचम्भित होगई बोली- ‘कौनसा बिल भैया? पर्चा बनवाना है डाक्टर साहब का !’ 
‘ चलो हटो लाइन से, यहाँ कहाँ चली आई हो ,अस्पताल तो सामने है ,यह तो बिजली का बिल जमा करने का ऑफिस है,पढना नही आता क्या?’ काउंटर पर बैठे बाबू ने झुंझलाकर कहा तो राधा अचकचा गई, अपने आप की  नासमझी के कारण उसका चेहरा तमतमा उठा, कान के पीछे और माथे पर पसीना बह निकला।

लाइन मे खडे किसी व्यक्ति ने इशारे से सामने अस्पताल का गेट दिखा दिया तो वह भारी मन लिए हेमा का हाथ थामे उस ओर बढ गई। मन ही मन राधा सोच रही थी यदि वह पढी लिखी होती तो शायद बिजलीघर और अस्पताल की खिडकी का अंतर समझ पाती और अपमानित नहीं होना पडता।
हेमा जितनी ही रही होगी जब उसने माँ के साथ काम पर जाना शुरू कर दिया था,और वह भी तो यही कर रही है, हेमा भी तो उसके साथ घरों में बर्तन घिस रही है।
नही-नहीं  हेमा के साथ वह ऐसा हरगिज नही होने देगी। मनोरमा आँटी हेमा को उनके स्कूल मे भरती कराने के लिए ठीक ही कहतीं हैं।

हेमा के ठीक होते ही राधा ने उसे स्कूल मे दाखिल करवा दिया। अनपढ राधा ने हेमा को उजाले की राह दिखाकर अपने भीतर संतोष के दीपक प्रज्ज्वलित कर लिए थे।


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