मॉस्किटो बाइट
मधुकर जी के घर के सामने स्टेडियम बनना
प्रस्तावित था। देखते देखते दस साल हो गए थे लेकिन मैदान खाली पडा था। अपने घर को
फार्म हाउस जैसा हो जाने का अनायास लाभ जरूर इससे मधुकर जी को मिल गया था। बरसात
होते ही मैदान हरा भरा हो जाता था। गैलरी में आरामकुर्सी मे बैठकर कई नई कविताओं
का सृजन यहीं सम्भव हुआ था। घास के बीच बरसाती पानी के पोखर से बन गए थे जिनमे कुछ
बगुले अपनी चोंच गडाकर भोजन तलाश रहे थे। अचानक मधुकर जी को गरदन के पास कुछ होने का अहसास हुआ। जब तक उनका हाथ
वहाँ तक पहुँचता मच्छर अपना काम कर चुका था। ठीक कान के नीचे ‘मॉस्किटो बाइट’ हुआ
था। मधुकर जी के चेहरे पर अनायास मुस्कुराहट तैर गई। रूपम यहाँ होता तो जरूर
चिंतित हो उठता, कहता ‘दादाजी आपको मॉस्किटो ने बाइट कर लिया है, सॉरी सॉरी मच्छर
ने काट लिया है ,मै क्रीम लगा देता हूँ,जलन कम हो जाएगी।’
गैलरी मे बैठे बैठे जब शाम घिर आती तो
अक्सर मच्छरों का प्रकोप बढ जाता था। कभी काटते,कभी नही भी काटते लेकिन रूपम के
लिए यह नित्य का खेल हो गया था।
उस दिन मधुकर जी थोडे खुश जरूर हुए थे जब
उन्हे पता चला था कि बेटे को कम्पनी के किसी प्रोजेक्ट की वजह से दो साल के लिए
अमेरिका जाने का मौका मिल रहा है। बेटे के परिवार को लेकर चिंता भी उन्हे सता रही
थी। कई प्रश्न सामने थे, क्या बहू भी अपना जॉब छोडकर अमेरिका जाएगी? रूपम की पढाई
का क्या होगा? बैंगलौर मे सब अच्छे से जम गया था। बेटा साफ्ट्वेयर इंजीनियर था।
बहू मल्टी नेशनल में वित्तीय सलाहकार की अच्छी पोजीशन पर काम कर रही थी। सब कुछ
गडबडा जाएगा। देश मे ही होने से पोते से जब चाहे मिला जा सकता था,बैंगलौर जाकर
थोडा चेंज भी मधुकर जी का हो जाया करता था।
सप्ताह भर मे बात साफ हो गई थी। बेटा
अकेला ही अमेरिका जा रहा था। बहू ने अपने कैरियर से समझौता नही करने का फैसला कर
लिया था। बेटा विदेश चला गया, बहू विमेन होस्टल मे शिफ्ट कर गई, रूपम को दादा दादी
के पास भेज दिया गया।
रूपम को अच्छे स्कूल मे दाखिल कराने मे कोई
खास परेशानी नही उठानी पडी। मधुकर जी शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार और सामाजिक
कार्यकर्ता थे।साहित्य,संसकृति तथा लोक कल्याण की गतिविधियों मे स्थानीय प्रशासन
एवम लोगों द्वारा सबसे पहले मधुकर जी को ही याद किया जाता था। सेवानिवृत्ति के बाद
उन्होने अपना जीवन पूरी तरह साहित्य एवम समाज को समर्पित कर रखा था। यही कारण था
कि उनके कहते ही लम्बी प्रतीक्षा सूची के बावजूद रूपम को एड्मिशन आसानी से मिल गया था। रूपम के आने से पत्नी की बीमारी के
बाद मधुकर जी के जीवन मे खुशियों का इन्द्रधनुष सा छा गया।
अपने मम्मी डैडी के समकालीन पालन पौषण तथा
बैंगलौर के मँहगे प्लेस्कूल के वातावरण के फलस्वरूप रूपम अन्य बच्चों की तुलना में
होशियार था। बैंगलौर मे तो सब कुछ वैसे ही अंगरेजीमय होता था,यहाँ भी स्कूल ने
रूपम को अंगरेजी सिखाने मे कोई कसर नही छोड रखी थी। इधर आकर रूपम द्विभाषी हो गया
था। अंगरेजी और हिन्दी दोनो शब्द वह साथ साथ बोलता था। स्कूल मे उसे मॉस्किटो बाइट
करते थे तो घर पर वह मच्छरों से परेशान हो जाता था।
दीपावली पर बेटा तो नही आ सका पर बहू घर
जरूर आई। माँ को पाकर रूपम खुशी से भर सा गया। पूरे समय वह चहकता रहा। दादा तथा
स्कूल मे बिताए समय की बातें बताते हुए वह थकता नही था। इतना बोल रहा था कि जैसे
सब कुछ कह डालना चाहता हो अपनी मम्मी से।
छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो बहू वापिस
बैंगलौर लौट गई। दादा दादी और पोता फिर अपनी मस्ती मे लीन हो गए।
उस दिन बहुत दिनों के बाद बेटे का अमेरिका
से फोन आया था । कह रहा था ‘पापा अपने और माँ के स्वास्थ्य का ध्यान रखना। रूपम भी
आप लोगों को तंग करता होगा, उसका काम भी आपके लिए बढ गया है। मुझे चिंता हो रही
है। हमारा विचार है रूपम को होस्टल मे डाल देना चाहिए। घर पर रह कर वह अपनी
अंगरेजी भी भूलता जा रहा है। वैसे भी उधर के स्कूलों की अंगरेजी ठीक नही है। ऐसा न
हो कि रूपम का भविष्य बिगड जाए। घर पर रहकर हिन्दी की आदत पड जाएगी तो बाद मे बहुत
दिक्कत आएगी।’
मधुकर जी अपना बाँया कान सहला ही रहे थे
कि ठीक ललाट पर किसी मॉस्किटो ने जोरदार बाइट किया। काफी अन्धेरा घिर आया था।
आरामकुर्सी छोड वे अन्दर कमरे मे चले आए।
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