Monday, June 15, 2026

आत्मग्लानि!

आत्मग्लानि

दोपहर का भोजन करने के बाद वे थोड़ी देर विश्राम के लिए पलंग पर लेटे ही थे कि मोबाइल पर संदेश आने की ध्वनि सुनाई दी।

व्हाट्सऐप पर संदेश था— 'फूफाजी, आज ही लखनऊ पहुँचा हूँ। रास्ते में मोटरसाइकिल वाले ने टक्कर मार दी। अस्पताल में हूँ। पर्स भी कहीं गिर गया है। कृपया मेरे खाते में दो हजार रुपये भेज दीजिए, इलाज के लिए जमा करना है। फिलहाल यही नंबर है।"

उन्होंने संदेश पढ़ा और सोच में पड़ गए। राकेश के लखनऊ आने की सूचना तो थी, लेकिन यह नंबर उसका नहीं था। कहीं कोई साइबर ठग तो नहीं? आजकल बैंक, अखबार और टीवी—सभी जगह बार-बार चेतावनी दी जाती है कि बिना पुष्टि किए किसी को पैसे न भेजें।

संतुष्टि के लिए उन्होंने अपने मोबाइल में सुरक्षित राकेश के नंबर पर फोन लगाया। दुर्भाग्य से फोन नहीं लगा। मशीन जैसी आवाज आई— "यह नंबर अस्तित्व में नहीं है।"

अब उनका संदेह और गहरा गया। उन्हें विश्वास हो गया कि यह किसी साइबर अपराधी की चाल है। उन्होंने संदेश का कोई उत्तर नहीं दिया और चादर ओढ़कर सोने का प्रयास करने लगे।

शाम लगभग पाँच बजे दरवाजे की घंटी बजी। उन्होंने दरवाजा खोला तो सामने राकेश खड़ा था। उसके चेहरे और पैर पर पट्टियाँ बंधी थीं तथा चेहरा सूजा हुआ था। उसे देखते ही वे हतप्रभ रह गए।

"अरे राकेश! वह संदेश तुमने ही भेजा था? मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई। मैंने उसे धोखाधड़ी समझ लिया और समय पर तुम्हारी मदद नहीं कर सका।" उनकी आवाज में गहरा अपराधबोध था।

राकेश मुस्कराने का प्रयास करते हुए बोला, "फूफाजी, इसमें आपकी कोई गलती नहीं है। आपने वही किया जो आज के समय में समझदारी है। मेरे घाव कुछ दिनों में भर जाएंगे। एक मित्र ने मदद कर दी थी। लेकिन अगर आप किसी साइबर ठग के झांसे में आ जाते, तो आपको आर्थिक नुकसान के साथ मानसिक पीड़ा भी झेलनी पड़ती। इसलिए मन पर बोझ मत रखिए।"

राकेश के शब्दों ने उन्हें थोड़ी राहत तो दी, पर मन की टीस बनी रही। उन्हें लगा कि साइबर अपराधियों ने केवल लोगों का पैसा ही नहीं छीना है, बल्कि रिश्तों के बीच भरोसे की गर्माहट भी कम कर दी है।

उन्हें अनायास ही पुरानी कहावत याद आ गई— "करे कोई, भरे कोई।"

ब्रजेश कानूनगो 

Tuesday, May 5, 2026

विचारों की भूमध्य रेखा

विचारों की भूमध्य रेखा

प्रभुदयालजी का समूचा सेवाकाल क्रोध से भरा हुआ निकला था। किसी भी बात या विचार को वे सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते थे। तुरंत प्रतिक्रिया देते, बहस करते और बड़ी मुश्किल से संतुष्ट हो पाते थे। इस प्रक्रिया में उनका व्यक्तित्व और व्यवहार भी बुरी तरह प्रभावित होता गया था। ऐसा लगता जैसे गुस्सा और बैचेनी उनका एक स्थायी भाव हो, उनकी भावभंगिमा से ऐसा ही सामान्यतौर से महसूस भी होता था। 

जब तक शरीर और मन शक्ति से भरा था उनका जीवन जैसे तैसे कट ही गया लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद यही स्वभाव उनकी बीमारी का बड़ा कारण बनता गया। 


दिनभर टीवी पर खबरिया चैनलों की उत्तेजक बहसों को देखते हुए परेशान होते रहते। भिन्न विचारधाराओं वाले प्रवक्ताओं के तर्कों और कुतर्कों से वे बहुत प्रभावित और उद्वेलित हो जाते। यह देखकर वे बहुत दुखी होते कि कोई दाएं की बात करता है तो कोई बाएं की।  इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ने लगा। गहरे अवसाद और निराशा से उनका जीवन रसहीन होता गया। 


अंततः उन्होंने टीवी पर उत्तेजक खबरिया बहसों को देखना बंद कर दिया। समय काटने को उन्होंने यूट्यूब पर विश्व यात्रियों के वीडियो देखना शुरू करके दुनिया को जानने समझने का नया विकल्प तलाश लिया। लेकिन उनका स्वभाव कैसे बदल सकता था, लोगों के विचारों से सहमत होने में अब भी बड़ी कठिनाई आती थी, उनके भीतर संताप बना ही रहता था। 


एक ट्रेवलर के यूट्यूब वीडियो में जब प्रभुदयालजी ने भूमध्य रेखा पर युगांडा के एक पर्यटन स्थल पर एक दिलचस्प प्रदर्शन देखा तो हतप्रभ रह गए। युगांडा में भूमध्य रेखा पर एक प्रसिद्ध टूरिस्टिक प्वाइंट है, जिसे "इक्वेटर लाइन" कहा जाता है।  इस स्थान पर क्रमशः भूमध्य रेखा के दाहिने तरफ एक पात्र, एक पात्र ठीक भूमध्य रेखा पर तथा एक अन्य पात्र बांई ओर रखा है। इन पात्रों में जब पानी के बीच फूल को रखा जाता है तो वह भूमध्य रेखा के पात्र में स्थिर रहता है लेकिन अन्य दोनों पात्रों में उसके घूमने की दिशा बिल्कुल विपरीत हो जाती है। 


यह प्रयोग पृथ्वी की घूर्णन गति के प्रभाव से कोरिओलिस पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध में दाईं ओर तथा दक्षिणी गोलार्ध में बाईं ओर कार्य करता है। जबकि भूमध्य रेखा पर, कॉरिओलिस बल शून्य होता है। इसी वजह से उत्तरी गोलार्ध में, फूल दाईं ओर घूमने लगता है, जबकि दक्षिणी गोलार्ध में, वह बाईं ओर घूमने लगता है।


प्रभुदयालजी को अनायास इस वीडियो को देखते हुए जीवन में पुनः आनंद की वापसी का रास्ता दिखाई दे गया। मन ही मन सोचने लगे, जब समूची पृथ्वी भूमध्य रेखा के दोनों ओर अलग अलग तरह से व्यवहार करती है, अलग अलग दिशाओं में हवाएं बहती हैं, अलग अलग बल काम करते हैं तब भी पृथ्वी संतुलित है, उसका चक्र सहजता से कायम है तो फिर उनके लिए क्या मुश्किल हो सकती है। उन्होंने अपने मस्तिष्क में पहुंचने वाले भिन्न विचारों के विपरीत बलों के प्रभाव से व्यथित होने की बजाए भूमध्यरेखीय स्थिति को बनाए रखने का अभ्यास शुरू कर दिया। उनके जीवन में प्रसन्नता के फूल फिर से खिलने लगे। 


ब्रजेश कानूनगो



सूरजमुखी की रीढ़

सूरजमुखी की रीढ़

रामनाथजी रोज़ की तरह सुबह अपने पोते राहुल के साथ सैर पर निकले थे। प्रदेश के प्रतिष्ठित उद्योगपति रह चुके रामनाथजी अब अपना स्थापित कारोबार बेटे को सौंपकर राजनीति और समाजसेवा में सक्रिय हो गए थे।

उनकी आलीशान कोठी के बगीचे में दुनिया भर के फूलों के पौधे लगे थे। एक विशेष फुलवारी में सैकड़ों सूरजमुखी खिले हुए थे और उनकी सुनहरी आभा पूरे वातावरण को मोहक बना रही थी।

रामनाथजी ने सूरजमुखी की ओर इशारा करते हुए कहा,

“देखो राहुल, इन फूलों का चेहरा हमेशा सूरज की ओर रहता है।”

“हाँ दादाजी, मुझे यह पता है। इसके पीछे का विज्ञान भी जानता हूँ।” राहुल ने आत्मविश्वास से कहा।

“अच्छा! तो ज़रा हमें भी बताओ।” रामनाथजी मुस्कुरा उठे।

राहुल ने समझाना शुरू किया, “सूरजमुखी के तने में ऑक्सिन नाम का हार्मोन होता है। सूरज की रोशनी पड़ने पर यह तने के छायादार हिस्से में अधिक जमा हो जाता है। वहाँ कोशिकाएँ तेजी से बढ़ती हैं, इसलिए तना सूरज की दिशा में झुक जाता है। दिन भर फूल पूर्व से पश्चिम तक सूरज का अनुसरण करता है। फिर रात में अपनी जैविक घड़ी के अनुसार वापस पूर्व दिशा की ओर मुड़ जाता है, ताकि अगली सुबह की पहली किरण का स्वागत कर सके।”

वह थोड़ा रुका, फिर बोला, “लेकिन जब फूल पूरी तरह परिपक्व हो जाता है, तब उसका तना सख्त हो जाता है। फिर वह हमेशा के लिए पूर्व दिशा की ओर स्थिर हो जाता है। उसके बाद वह सूरज के पीछे-पीछे नहीं घूमता।”

राहुल का वैज्ञानिक विवेचन सुनकर रामनाथजी क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गए।

अचानक उनके भीतर भी जैसे कोई जैविक घड़ी जाग उठी। विचारों का एक झोंका मन में उठा। वे अनायास अपनी रीढ़ पर हाथ फेरने लगे।

उन्हें याद आया कि जीवन भर जिस राजनीतिक दल की सत्ता रही, वे उसी के गुणगान में लगे रहे। सत्ता बदलती रही, और वे भी सूरजमुखी की तरह अपना मुख मोड़ते रहे।

सामने खिले सूरजमुखी हवा में झूम रहे थे, किंतु परिपक्व फूल पूर्व दिशा में अडिग खड़े थे।

रामनाथजी को पहली बार अपनी रीढ़ में कुछ चुभता हुआ महसूस हुआ। शायद यह आत्मग्लानि थी, या फिर अपनी रीढ़ के अब तक सख्त न हो पाने का एहसास।


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ब्रजेश कानूनगो