Sunday, November 15, 2015

विभूति

विभूति

रात का सफर था। भारी बरसात हो रही थी।छोटे से गाँव में बस खराब हो गई थी। कीचड़ और पानी से परेशान यात्रीगण छोटी-छोटी गुमटियों में बनी चाय की दुकानों का सहारा लिए दूसरी बस के आने का इंतजार कर रहे थे ताकि सबसे पहले पड़ने वाले शहर तक पहुँच सकें।
रात नौ बजे से लेकर दो बजे तक कोई बस नहीं आई। नदी नालों में बाढ़ आई हुई थी,रास्ते बंद थे। अधिकाँश बसें निरस्त हो गर्ईं थी। यात्रियों में एक गर्भिणी युवती भी थी जो लगातार चार पाँच घंटों से परेशान हो रही थी। कीचड़ भरे गाँव में सड़क किनारे ऐसा कोई स्थान नहीं दिख रहा था, जहाँ वह थोड़ी देर आराम कर सकती।
करीब ढ़ाई बजे एक बस आकर रुकी। वह पहले ही से यात्रियों से खचाखच भरी हुई थी। इंतजार करते यात्रियों को किसी तरह कंडक्टर ने आने वाली बस में चढ़ाया ।गर्भिणी युवती को भी एक अटैची लगाकर उस पर बैठा दिया गया। दो पढ़ी-लिखी लड़कियाँ पहले से ही इस बस में खड़ी हुर्ईं थीं। वे लगातार एक दूसरे से बतिया रहीं थीं। गर्भिणी युवती को पास में अटैची पर बैठा देने पर उन्होने अपनी नाक-भौं सिकोड़ी तथा लगातार युवती पर अपरोक्ष रूप से बातों-बातों में शब्द बाण चलाती रहीं। अटैची रखने और उस पर युवती के बैठ जाने से उन्हे खड़े रहने में थोडी परेशानी जो हो रही थी। एक ने कटाक्ष करते हुए कहा-'लोगों को तो खड़े रहने में दिक्कत हो रही है और ये महारानी बैठ गर्ईं हैं।'
अपने अंदर एक नए जीवन को संभाले हुए एक गर्भिणी युवती की पीड़ा को समझ पाना शायद उसी की हमउम्र उन लडकियों के सामर्थ्य और संस्कारों से बाहर की बात थी।
एकाएक पास वाली सीट पर से एक ग्रामीण औरत उठ खड़ी हुई और अटैची पर से युवती को उठाते हुए बोली- 'बेटी,यहाँ मेरी जगह बैठ जाओ, अटैची पर मैं बैठ जाती हूँ, कब तक परेशान होती रहोगी।'
अब अटैची पर ग्रामीण औरत विराजित हो गई थी किसी विभूति की तरह उसके व्यक्तित्व से अद्‌भुत आभा प्रस्फुटित हो रही थी जिसकी चमक का सामना कर पाना लड़कियों के लिए शायद कष्टकारी था। दोनो की नजरें खिड़की के बाहर बहुत देर तक अंधेरे में न जाने क्या  तलाश करती रहीं।






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