रंग बेरंग
छब्बीस जनवरी से
लेकर पन्द्रह अगस्त जैसे त्यौहारों पर वह आशा करता रहता था कि शायद इस बार उसकी
दुकान से तिरंगे के कपडों के थान बिक जाएँ, लेकिन ऐसा होता नही था। लोग बने-बनाए
झंडे खादी भंडार से खरीद लिया करते थे।
लेकिन इस बार कुछ
विचित्र घटा। एक बूढा व्यक्ति, जिसके बारे में लोग सिर्फ इतना जानते थे कि वह
सिलाई वगैरह करके अपना गुजारा करता रहा है , उसकी दुकान पर आया और केसरिया रंग का
पूरा थान खरीद ले गया। दुकानदार को बडी खुशी हुई कि उसका बेकार पडा कुछ माल तो
बिका।
कुछ दिनों बाद वही
बूढा व्यक्ति पुन: उसकी दुकान पर आया और उसने हरे रंग के कपडे की मांग की और पूरा
हरे रंग का थान खरीद लिया। दुकानदार बडा प्रसन्न हुआ। अगले हफ्ते उसने देखा शहर के
हर गली-मोहल्ले में हरे और केसरिया रंग के झंडे-झंडियाँ लहरा रहे थे।
किंतु एक दिन अचानक सारे शहर में लाल ही
लाल रंग बिखर गया। दंगे भडक गए थे। कर्फ्यू लगा। सेना आई। राजनीतिक शतरंज खेला
गया। और फिर अंतत: शांति के दौरान कर्फ्यू में कुछ समय के लिए छूट भी दी गई।
दुकानदार ने छूट के दौरान अपनी दुकान भी
खोली। वही बूढा पुन: उसकी दुकान पर उपस्थित हुआ। इस बार उसने दुकानदार से दो मीटर
सफेद कपडे की माँग की। दुकानदार को आश्चर्य हुआ,पूरा थान खरीदने वाले बूढे से
जिज्ञासावश उसने पूछ लिया-‘क्यों बाबा अबकी बार सिर्फ इतना ही? क्या पूरा थान नही
खरीदोगे?’
बूढा फफक कर रो पडा, बोला-‘यह कपडा तो मैं
अपने पोते के लिए खरीद रहा हूँ बेटा, जो कल के दंगों की चपेट में आ गया...।’
कुछ ही घंटों में दुकानदार का सफेद कपडे
का थान भी बिक गया,दो-दो मीटर के टुकडों में कट कर।
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