Sunday, November 15, 2015

समाधि

कहानी
समाधि
ब्रजेश कानूनगो

प्रलय ही आ गया था जैसे . किसी ने शायद ही कभी प्रलय देखा था लेकिन हर कोई कह रहा था प्रलय आ गया है. जो बुजुर्ग थे बता रहे थे कि उन्होंने ऐसी घनघोर बारिश पिछले साठ बरसों में नहीं देखी थी. बच्चे डर भी रहे थे और बारिश का मजा भी ले रहे थे. मजा तो यह था कि स्कूलों की छुट्टी कर दी गयी थी. लेकिन दानवी शक्ल के काले बादलों की गडगडाहट के बीच बिजली चमकती तो वे सिहर जाते थे. दिन के अभी बारह भी नहीं बजे थे लेकिन अन्धेरा ऐसा हो गया था जैसे शाम के सात बज गए हों.

ऐसे में रहमान ने किसी तरह अपने को फटी बरसाती से थोड़ा बचा रखा था. हाथ में औजारों की पेटी लिए सड़क के गड्ढों से बचता बचाता वह कोठी की ओर चला जा रहा था. ठाकुर साहब का हुक्म टालने का तो वह कभी सोंच ही नहीं सकता था. न सिर्फ पुरानी बरसाती उनकी दी हुई थी बल्कि कई बार ठाकुर साहब ने उसकी बहुत मदद भी की थी. और आज जब उनका संदेशा आया तो उसने मौसम की परवाह किये बगैर तुरंत कोठी का रुख कर लिया था.

ठाकुर साहब बड़े अफसर थे. और हर तरह से बड़े थे. उनके पिताजी भी बड़े अफसर रहे थे, उनकी कोठी बड़ी थी, नाम बड़ा था, शरीर भी कोई पचासी-नब्बे किलो का रहा होगा. ठाकुर साहब नगर पालिका के स्वच्छता अधिकारी या शिक्षा विभाग के निरीक्षण अधिकारी की तरह केवल नाम के अफसर नहीं थे. वे अफसर शब्द का बोझ ढोते नहीं थे बल्कि उसे जीते थे. उनकी अफसरी का आभा मंडल उनके साथ-साथ चलता था. ठाकुर साहब में वे सब गुण थे जो किसी अफसर को बड़ा अफसर बनाते हैं. मसलन वे इतने सख्त थे कि दफ्तर में उनके कैबिन के आगे से भी गुजरने से कर्मचारी कतराते थे. उनकी  मौजदगी मात्र से दफ्तर के सारे काम काज बड़े व्यवस्थित रूप से चलते-होते दिखाई देते थे.
      
लेकिन बहुत से ऐसे कारण भी थे जिनके कारण ठाकुर साहब की दफ्तर की सख्ती घर-परिवार में विनम्रता की गंगा बन जाती थी. अफसरी के पहाड़ को घर में अक्सर पिघलते देखा जा सकता था. यों तो रहमान को उनके दफ्तर में मरम्मत आदि के काम से बुलाया जाता था मगर  ठाकुर साहब की कोठी पर जरूरत होती तो वहाँ भी वह पहुँच जाता था. धीरे-धीरे जैसे वह ठाकुर साहब की कोठी का ही एक कर्मचारी हो गया था. शौक़ीन तबीयत के तो थे ही ठाकुर साहब और रहमान मुर्गा साफ़ करने पकाने में भी माहिर था. पार्टियों आदि में उसके पकाए मुर्गे की बड़ी तारीफ़ होती थी. आज कोठी ही पहुँचना था रहमान को.

आज कोई दावत आदि भी नहीं होनी थी..फिर क्यों बुलवाया था ठाकुर साहब ने..अब तो सूमो भी नहीं है कोठी में..रहमान सोंचने लगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि बारिश को देखते हुए गोष्ठी वगैरह का इंतजाम करना हो. शायर लेखक आ रहे हों..महफ़िल ज़मने वाली हो कोठी पर..साहित्य और कला से ठाकुर साहब का विशेष लगाव रहा था. कभी-कभी उन्हें अफसोस भी होता था कि वे इस महकमें में गलत आ गए हैं. उन्हें तो किसी कॉलेज में हिन्दी का प्रोफ़ेसर होना था या किसी कला अकादमी का अध्यक्ष. मगर ऐसा होता कहां हैं. वे यह सोंचकर संतोष कर लेते थे कि यह केवल उनके साथ तो नहीं हो रहा. जिन्हें परचून की दूकान में पुडिया बांधना था वे कालिदास और शेक्सपियर पढ़ा रहे थे, जिन्हें ठेकेदारी करते हुए सड़कें बनानी थीं वे प्रजातंत्र की बिछात पर शतरंज खेल रहे थे. इसलिए उन्होंने अपने को कुछ ऐसे एडजेस्ट कर लिया था कि अब वे एक तरफ सख्त अफसर थे तो दूसरी तरफ एक संवेदनशील कवि और कलाप्रेमी व्यक्ति की छवि शहर के प्रबुद्ध वर्ग में बनाने में सफल हुए थे.

कोठी अभी दूर थी. बारिश जरूर कम हुई लेकिन हवा बहुत तेज चल रही थी. रहमान की बरसाती थोड़ी सी और फट गयी इस हवा में. किसी तरह वह सड़क किनारे ‘ साहित्य भवन’ के वरांडे में बरसाती को ठीक से अपने शरीर पर लेने के लिए आ खडा हुआ. साहित्य भवन के निर्माण में भी ठाकुर साहब की महती भूमिका रही थी. ठाकुर साहब के प्रयासों से नगर की कला और साहित्यिक संस्थाओं को लगातार सहयोग मिलता रहा था. उनके कहने भर से स्मारिकाओं और फोल्डरों के लिए विज्ञापनों और प्रायोजकों की व्यवस्था बड़ी आसानी से हो जाया करती थी. अनियतकालीक तथा अव्यावसायिक लघु मगर महवपूर्ण साहित्य पत्रिका ‘साहित्य ऋतु’ के वे अवैतनिक व आजीवन प्रधान सम्पादक भी थे. बाकी सम्पादन का जहां तक सवाल है कवि ‘निडर’ जी सब देख लेते थे. निडर जी उनके महकमें के हिन्दी अधिकारी थे.
‘ठाकुर साहब जैसे मर्मज्ञों के कारण ही साहित्य और कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है.’ इस एक वाक्य के निरंतर उपयोग से नगर को ‘साहित्य भवन’ उपलब्ध हुआ था. जिसमें साहित्य और कला का सरंक्षण हो रहा था.गोष्ठियां हो रही थी, बेशक अध्यक्षता करना ठाकुर साहब की एक बड़ी जिम्मेदारी हुआ करती थी.

बारिश फिर तेज हो गयी थी. साहित्य भवन पर रहमान अब ज्यादा रुक नहीं सकता था. वह सड़क पर आ गया. सूमो होता तो आज बारिश में कितना मजा करता वह.. रहमान को भी भीगते हुए दौड़ लगानी पड़ती उसके पीछे-पीछे. उसके ही बस में था सूमो. बहुत प्यार करते थे साहब सूमो से. यों अफसरों के कुत्ता-प्रेम के अनेक किस्से प्रचलित हैं मगर सूमो और ठाकुर साहब की बात ही कुछ और थी. नगर के लोग भी सूमो से बहुत प्यार करते थे. जितना साहब से करते उतना सूमो से भी करते. ठाकुर साहब लोगों की कमजोरी थे और सूमो ठाकुर साहब की कमजोरी था. कहा जाता है ठाकुर साहब के सूमो से अनुराग के बड़े गहरे कारण थे. दरअसल सूमो के पूर्वज ठाकुर साहब के ससुराल पक्ष के थे. जब ठाकुर साहब का प्रेम विवाह हुआ था तब मैडम अपने साथ एक गर्भवती कुतिया भी लेती आईं थी. कालान्तर में इधर बाबा का जन्म हुआ उधर सूमो धरती पर अवतरित हो गए. एक संयोग और घटित हुआ, सूमों के जन्म के तेरह दिन पहले मैडम के पिताजी हृदयाघात से चल बसे. मैडम के मन में कुछ ऐसी बात जम गयी कि वे सूमो में अपने डैडी की छवि देखने लगीं. मैडम की खुशी साहब की खुशी. ठाकुर साहब अपने और कुतिया के पिल्ले से सामान रूप स्नेह करने लगे.

नगर के लोग साहब और सूमो के जरिये नगर को संवारने में लगे हुए थे. कुत्ता शहर में साहब की तरह ही लोकप्रिय हो गया था. जैसे शहर की जान उस कुत्ते में आ बसी थी. कला और साहित्य जैसी विधाओं का विकास हो ही रहा था कि अचानक नगर को गहरे आघात का सामना करना पड़ा. एक सुबह सूमों अपने घर में मरा हुआ पाया गया. यह रहस्य ही था कि उसने आत्महत्या की या किसी दुश्मन ने उसकी हत्या कर डाली थी.

बरसात में भीगते हुए रहमान के भीतर भी संवेदनाओं की बरसात हो रही थी..कैसा ग़मगीन दिन था वह... सूमो के असामयिक निधन से न सिर्फ मैडम और साहब पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा ,मगर नगर के लोग और संस्थाएं भी उनके दुःख में उनके सहभागी बने हुए थे.
जैसे-जैसे कुत्ते के निधन की खबर फ़ैल रही थी नागरिकों की भीड़ भी कोठी में जमा होती गयी. एक-एक करके लोग शव के करीब जाते और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर कुछ ऐसे लौटते कि उनका ग़मगीन चेहरा किसी तरह मैडम और साहब की नज़रों में आ जाए. कुछ संस्थाओं ने तो सूमो पर ’पुष्प-चक्र’ भी अर्पित किये, ज्यादातर ने फूल मालाएं चढ़ाई. दुख की घड़ी में बहुत देर तक किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि शव का अंतिम संस्कार भी किया जाना है. शव को इस तरह तो रखा नहीं जा सकता. साहब से बात की गयी ,उन्होंने मैडम को रेफर किया. पहले तो मैडम सूमो को अपनी आँखों के सामने से हटाने को तैयार ही नहीं हुईं, लेकिन जब उन्हें लगा कि कब तक ऐसी ही बैठी रहेंगी, किटी पार्टी और शापिंग के लिए भी देर हो रही है सो वे अंतत: राजी हो गई.

सूमो को पूरे सम्मान के साथ कोठी परिसर में दफना दिया गया. दो मिनट के मौन के बाद श्रद्धांजलि दी गई. दुखी मन से लोग अपने-अपने घर लौट गए थे. मगर साहब के मन में भावनाओं का ज्वार बहुत देर तक उठता रहा.

रहमान कोठी पहुँच गया था. गेट पार कर वह अब सूमों की समाधि के सम्मुख था. उसे याद है सूमों की तेरहवी के दिन मार्वल और ग्रेनाईट पत्थरों से निर्मित उसकी समाधि का लोकार्पण साहब के करकमलों से ही हुआ था. आज तेज बरसात में वह भीग रही थी.

कोठी के पोर्च में साहब खड़े थे, रहमान को देखा तो बोले. ‘रहमान, ये कुछ चद्दरें मंगवाईं हैं, इन्हें सूमो की समाधि पर लगाना है... बरसात से बेहाल हो रही है..हो सके तो आज ही लगा दो.’
‘जी,साहब’ कहकर वह अपने काम में जुट गया. बारिश अब कम हो गयी थी.

कोई चार घंटों में अपना काम ख़त्म करके वह घर पहुंचा तो उसकी आँखें फटी रह गईं. नाले के किनारे बनी उसकी झोपडी तेज बहाव में बह गई थी. यास्मिन किसी तरह नाले के बीचों बीच मलबे पर खडी ठिठुरती बकरी को बचाने के प्रयास में जुटी थी.

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर-452018
मो.न.09893944294          
 


पिछली खिडकी

पिछली खिडकी

दूरदर्शन पर अपना कविता पाठ करके लौट रहा था। राजधानी से प्रकाशित होने वाला राष्ट्रीय दैनिक मेरे हाथों में था। रेलगाडी छूटने के इंतजार में अखबार के पन्ने पलटता हुआ अंतिम पृष्ठ तक पहुंच गया। आचार्यजी कला प्रदर्शनी का उद्घाटन करते नजर आए। साथ में आचार्यजी की चित्रकार की तारीफ और चित्रों पर उनकी टिप्पणी भी प्रकाशित हुई थी। समाचारों में ऐसा डूब गया कि पता ही नही चला कब गाडी ने सीटी दी  और कब स्टेशन पीछे छूट गया।
 बहुत दिनों से प्रयास में था कि किसी तरह दूरदर्शन पर रचना पाठ कर आऊँ। इधर देख रहा था हर ऐरा-गैरा रंगीन बूशर्ट पहन कर अपने चुटकुले छोटे पर्दे की कवि गोष्ठी सुनाकर ऐंठ रहा था। ऐसा नही है कि ऐसे जुगाडू कवियों के प्रति कोई द्वेष भाव रहा था किंतु यह शायद मेरी ही कमजोरी या मेरी कविता में कोई कमी थी जिस वजह से मैं ऐसा नही कर पा रहा था। हाँलाकि रेडियो पर कई बार अपनी लम्बी-लम्बी कविताएँ सुना आया था लेकिन रेडियो का स्वांत: सुखाय प्रसारण वह सुख नही दे रहा था जो टीवी का रंगीन स्क्रीन दे पाता है। ऐसी हताशा के समय आचार्यजी का सहयोग मुझे मिला। हालांकि आचार्यजी से मेरा कोई सीधा परिचय कभी नही रहा। मेरा मित्र मुकेश माथुर राजधानी के महाविद्यालय में प्रोफेसर था जिसने किसी तरह आचार्यजी के माध्यम से दूरदर्शन केन्द्र से मेरा कांट्रेक्ट लेटर निकलवाया था। दरअसल आचार्यजी महानगर के विशिष्ठ व्यक्तियों में से एक हैं। राजधानी आनेवाला शायद ही कोई बुद्धिजीवी ऐसा रहा हो जो आचार्यजी का आशीर्वाद लिए लौट गया हो।
मैं मुकेश के घर ही ठहरा था। उसकी बहुत इच्छा थी कि जब यहाँ आया हूँ तो आचार्यजी से अवश्य मिलता जाऊँ। आचार्यजी देश के जाने-माने विचारक,संस्कृति मर्मज्ञ और प्रतिष्ठित साहित्यकार तो थे ही,राजनीतिक क्षेत्रों में भी उनकी खासी पूछ-परख और घुसपैठ थी। नए रचनाकार के लिए उनसे मिलना लगभग किसी साहित्यिक तीर्थ पर होकर आने जैसा था। उन्होने कई नवोदित रचनाकारों की पुस्तकों के फ्लेप लिखकर उपकृत किया था। साहित्य के क्षेत्र में यह गहरी मान्यता रही है कि उनके लिखे फ्लेप और ब्लर्व के बाद पुस्तक की आधी समालोचना सम्पन्न हो जाती है और पुरस्कार प्राप्ति की सम्भावनाएँ बड जाया करती हैं। पिछले दिनों लेखक संघ की एक गोष्ठी में युवा कवियत्री की नितांत अचर्चित कविताओं पर उसकी प्रतिभा पर अपनी बात कही तभी लोगों को विश्वास हो गया था कि सेठ वैभवदास की स्मृति में दिया जाने वाला अगला साहित्य सम्मान उसे ही प्राप्त होगा। और यह हुआ भी। आचार्यजी के आशीर्वाद से कई रचनाकारों को अपनी सही दिशा प्राप्त हुई थी। उनसे मिलना मेरे लिए सचमुच सौभाग्य की बात थी।
दूरदर्शन की कवि गोष्ठी मे भाग लेने के बाद अगले दिन हम आचार्यजी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने हम उनके निवास पर जा पहुंचे थे। उनके भवन के आगे छोटा-सा खूबसूरत उद्यान था। उसमे अधिकांश वे पेड-पौधे लगे हुए थे जिनका उल्लेख अक्सर प्रेम गीतों और फिल्मी नगमों में बहुतायत से होता रहा है। ऐसा आभास होता था जैसे उनके हिस्से की धरती ने गुलमोहर और पलाश के रंगों की चुनरी ओढ रखी हो। उनके आँगन में इन पेड-पौधों के सौन्दर्यपूर्ण उपस्थिति से आचार्यजी की सुरुचि और उनके दिव्य व्यक्तित्व का अनुमान लगाते हुए हमने चौकीदार से अपने आने का प्रयोजन कहा। उसने हमें भवन की ऊपरी मंजिल पर बने उस कक्ष तक पहुंचा दिया जहाँ आचार्यजी अगंतुकों से भेंट किया करते थे।  आचार्यजी का वह कक्ष बहुत ही तरतीब से संवारा गया था। जिस ओर से हमने प्रवेश किया था,अर्थात मुख्य द्वार की ओर दो खिडकियाँ थीं। एक दरवाजा बाहर की ओर खुलता था,जहाँ छत थी। सामनेवाली दीवार पर मकबूल फिदा हुसैन द्वारा माधुरी दीक्षित की तस्वीर लगी थी, जिसमें वह किसी आदिवासी औरत की तरह अपने खूबसूरत दांतों का प्रदर्शन करते दिखाई दे रही थी। कक्ष के एक कोने में तिपाही पर एक सितार रखा हुआ था, हालांकि किसी ने आचार्यजी को सितार बजाते कभी रूबरू देखा नही था।
कुछ देर बाद आचार्यजी ने कक्ष में प्रवेश किया। उनके साथ जैसे कोई प्रभामंडल चल रहा था, उसी के तिलस्म से हमारे हाथ बरबस नमस्कार की मुद्रा में जुड गए। सफेद ढीला कुर्ता और चुस्त पायजामा धारण किए आचार्यजी ने मैदानी क्षेत्र में पैदा होने बावजूद सिर पर हिमाचली टोपी लगाई हुई थी। आचार्यजी की उपस्थिति वातावरण में विशिष्ठ गरिमा घोल रही थी। अनके आते ही जैसे केवडे की मीठी खुशबू बिखर गई थी। ध्यान से सुनने पर भीतर वाले कक्ष से आती बाँसुरी की मद्दिम-मद्दिम धुन सुनाई पड रही थी। उनके ललाट पर अद्भुत तेज दिखाई दे रहा था। लगता था उनकी आँखें छलछला रही हों। जैसे प्रेम का कोई सागर उन आँखों में लहरा रहा  हो। आत्मीय मुस्कान और महर्षि की धीर-गम्भीर वाणी लिए उनके मुख से शब्दों की गंगा प्रवाहित हुई- बैठिए! बैठिए!!,परिचय चाहूंगा मैं आपका!

मुकेश को वे थोडा-बहुत जानते थे, लेकिन वे इतने विराट थे कि छोटी पहचान को याद रखा जाना उनके लिए सहज नही था।
जी, मैं ब्रजकिशोर यादव, मध्यप्रदेश की कन्नौद तहसील के स्कूल में अध्यापक हूँ। दूरदर्शन पर कविता पढने आया था,सोचा आपके दर्शन भी करता चलूँ।किसी तरह मैं तिलस्म से बाहर आने का प्रयास करके बोला।
 वे मुस्कुराए,जैसे आशीर्वाद दे रहे हों।
आपका लेख क्रांतिवीर में पढा था, बहुत सटीक टिप्पणी की है आपने नई पीढी पर।मैने बातचीत का सिलसिला शुरू करने की गरज से कहा। मैं जानता था विद्वानों के समक्ष एक बार प्रश्न रखकर चुप हो जाना ही उचित होता है। उसके बाद तो वे स्वयं ही हमें उपकृत करने लगते हैं। हुआ भी यही। आचार्यजी ने हमें सम्बोधित करना शुरू कर दिया था।
आराम कुर्सी को पिछली खिडकी के पास खींचकर बैठते हुए वे बोले-आज का युवा भटकाव के रास्ते पर है, हमारे संस्कार, हमारे आदर्श मूल्यहीन हो रहे हैं।आचार्यजी ने अपनी कुर्सी पिछली खिडकी के और नजदीक खिसकाते हुए आगे कहा-देश और समाज की चिंता छोड युवा पीढी पतन की राह पर दौड रही है..।आचार्यजी ने हमारी ओर से नजरें पूरी तरह हटा कर खिडकी के बाहर देखते हुए कहा- नशा उनकी रगों मे समाता जा रहा है..पश्चिम की गन्दगी उनके भविष्य को चौपट कर रही है...कहते कहते आचार्यजी खडे हो गए, ‘ पोर्न फिल्मों और घटिया साहित्य उन्हे जकडता जा रहा है..कहते कहते आचार्यजी खिडकी के बाहर एकटक देखने लगे। हमने महसूस किया, आचार्यजी हमसे ज्यादा पिछली खिडकी के बाहर देखने में अधिक दिलचस्पी ले रहे थे। बातचीत करते समय उनके वाक्य जैसे टूट रहे थे। तभी पास वाले कमरे में टेलीफोन की घंटी घनघनाई। बेमन से वे फोन सुनने भीतर चले गए।
उत्सुकतावश मैने उठकर पिछली खिडकी से बाहर देखा। सामने से बेहद खूबसूरत दिखाई देने वाले आचार्यजी के प्रासाद के पिछ्वाडे झुग्गी-झोपडियों का घना जंगल था। पिछली दीवार के समीप कुछ सार्वजनिक नल लगे थे, जहाँ गरीब बस्ती की औरतें अपनी देह और कपडों का मैल बहाने में व्यस्त थीं।

मैं पुन: सोफे पर आ बैठा। अन्दर वाले कमरे से आचार्यजी की आवाज सुनाई दे रही थी। शायद किसी कला प्रदर्शनी के उद्घाटन करने का निमंत्रण उन्होने स्वीकार कर लिया था।
हम लौट आए थे। उनके भवन की तरह ही उनके व्यक्तित्व की भी कुछ खिडकियाँ पीछे की ओर खुलती थीं।
मैने रेलगाडी की खिडकी से बाहर देखा, दृश्य बदल चुका था। कांक्रीट के विराट जंगल बहुत पीछे छूट चुके थे। नीले आकाश के तले काम करती औरतों की रंग बिरंगी औडनियाँ हरे भरे खेतों की पृष्ठभूमि में लहरा रही थीं। यह वह चित्र था जिसे किसी आचार्य की समीक्षा की कोई दरकार नही थी।





भिंडी का भाव

भिंडी का भाव   

रामदीन के घर आखिर वह घडी आ ही गई थी जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। उसके घर शहनाई क्या बजी जैसे पूरे गाँव में उत्सव मनने लगा। जानकीदास हलवाई ने पूरे ग्यारह सेर पेडे बनवाकर रामदीन के घर भिजवाए। भला क्यों न भेजता, रामदीन जैसे भले इंसान की आखिर भगवान ने सुन ही ली थी। उसके यहाँ देर जरूर है पर अन्धेर नहीं, गाँव के हर व्यक्ति की जुबान पर बस यही बात थी।  रामदीन ने पूरे दस बरस अपने आँगन में बच्चे की किलकारी सुनने का इंतजार किया था। छोटे से गाँव में शादी के बाद इतने लम्बे समय तक बच्चे का जन्म न हो तो लोग तरह तरह की बातें उछालने लगते हैं। वह तो रामदीन का भला व्यवहार ही था जिसके कारण उस पर छींटाकशी करने की बजाए लोग दुआएँ करते रहे कि रामदीन के घर एक नन्हे-मुन्ने के रूप में खुशियाँ आएँ।

किसी काम से पास के शहर में गई करीमा चाची ने जब अपने फूफा के यहाँ रामदीन के घर बच्चे के जन्म की खबर सुनी तो दौडी-दौडी बाजार गई, सवा सेर पेडे और एक झुनझुना खरीद कर शाम की रेल से ही गाँव कौट आई। रामदीन के यहाँ गाना-बजाना जारी था। करीमा चाची ने नन्हे की बलाइयाँ लीं और बहुरानी की गोद भरी। नन्हे से बच्चे को जब चाची ने गोद में लिया तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू छलछला आए। बोलीं- ‘बडा होके अपने अब्बा पर जाना,बडा नेक इंसान बनेगा हमारा नन्हा रामदीन।’

आदमी के पहचान हर व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से करता है। रामदीन भला आदमी है यह बात करीमा चाची भी कहतीं थीं और जानकीदास हलवाई भी। जहाँ जानकीदास उसकी खुशमिजाजी से प्रभावित था, वहीं करीमा चाची रामदीन की दरियादिली से। करीमा चाची को शौक था तो बस अच्छा खाने का। बाजार में जो नई सब्जी आती,सबसे पहले करीमा चाची के घर ही बनती थी। कारण-रामदीन की इकलौती सब्जी की दुकान जो थी गाँव में। शहर से जो ताजी सब्जी वह लेकर आता करीमा के घर पहले पहुंचाता था। अगर करीमा स्वयं उसकी दुकान पर आती तो बडे ही प्रेम से ताजी सब्जियाँ तोलता और तोलने के बाद कुछ सब्जी ऊपर से और थैली में डाल देता।

बाद में करीमा चाची तो गाँव में ही रह गई, लेकिन रामदीन का परिवार शहर चला आया। रामदीन की खबरें आते-जाते लोगों से करीमा को मिलती रहतीं। किसी ने बताया था कि शहर में रामदीन ने ‘कारपोरेशन’ के सब्जी बाजार में अपनी दुकान ले ली है और उसका धन्धा खूब अच्छा चल निकला है। फुटकर के साथ-साथ उसने थोक व्यवसाय भी शुरू कर दिया है। कुछ दिनों बाद चाची को पता चला कि रामदीन ने एक मकान भी शहर में खरीद लिया है और उसका बेटा भी उसके करोबार में हाथ बंटाने लगा है। करीमा चाची को यह सब सुनकर बहुत खुशी होती, ईश्वर से यही दुआ करती- ‘रामदीन और उसका बेटा खूब फलें-फूलें।’
समय बीतता रहा। खबर मिली रामदीन नही रहा। करीमा चाची बूढी हो गईं और फूफा के लडके के पास रहने शहर चली आईं। चाची बूढी जरूर हो गई थी पर खाने-पीने का शौक पहले जैसा ही अब भी बरकरार था।  फूफा के लडके की बहू लाख बढिया खाना पकाती पर चाची को तृप्ति नही होती थी। ‘यह क्या बेकार कूढा बना डाला है, तुम्हे तो सब्जी लाना- बनाना ही नही आता, कितनी सडी-गली गिलकियाँ लाई हो, बैंगन में कितने छेद हैं।’ ऐसे जुमले तो बेचारी बहू को रोज ही सुनने को मिलते थे।
परेशान हो कर बहू ने एक दिन थैली चाची को थमाई और बोल दिया-‘पास ही बाजार है- जा कर खुद ही ले आओ।’

और चाची बाजार के लिए निकल पडी। सोचने लगी रामदीन की भी सब्जी की दुकान है इसी शहर में, अब उसका बेटा बैठता होगा। शक्ल तो जरूर मिलती होगी रामदीन से, बचपन में तो उसके जैसा ही दिखता था। खुदा ने चाहा तो उसी की दुकान से सब्जियाँ खरीदूंगी।

और वास्तव में चाची की खुदा ने सुन ली। सब्जी की दुकान पर जैसे हूबहू रामदीन ही बैठा था। चाची की चाल खुशी से तेज हो गई। दुकान पर पहुंची और रामदीन के बेटे की और देख मुस्कुराई तो रामदीन के बेटे ने उन्हे ऊपर से नीचे तक निहारा। चाची की खस्ता माली हालत उनके पहने कपडों से बयान हो रही थी। चाची ने सब्जियों की टोकरियों पर नजर दौडाई। उनकी मनपसन्द सब्जियों से टोकरियाँ भरी हुईं थीं। मनपसन्द भिंडी की टोकरी से भिंडियाँ छांटने के लिए जैसे ही उन्होने हाथ आगे बढाया चार भिंडियाँ अलग से देने वाले बाप के बेटे ने झुंझलाकर चाची का हाथ पकड लिया- ‘हाथ मत लगाओ माई, तुम्हारे बस की नही है।’

चाची की आँखों के सामने कभी रामदीन आ रहा था, तो कभी ताजी भिंडियों की टोकरी, तो कभी फूफा के बेटे की बहू का बुझा-बुझा सा चेहरा। इस बीच चाची को पता ही नही चला कि नए ग्राहकों की भीड ने उन्हे दुकान से बहुत दूर ढकेल दिया था।



घूँसा

घूँसा

जब घर छोड़ा था तब सारे बाल काले थे . लगभग बीस बरस का अंतराल कम नहीं होता, जिस प्रकार मेरी देह और जुल्फों में बदलाव आया था वैसा ही कुछ अपने शहर को देखने पर महसूस हो रहा था. बरसों बाद मैं अपने शहर में पैदल भटक  रहा था. बहुत ढूँढने के बाद भी मुझे अपने बचपन का वह प्यारा कस्बा कहीं नजर नहीं आ रहा था. सब कुछ जैसे बदल सा गया था. कई मॉल खुल गए थे,शहर का औद्योगीकरण भी हो गया था. आई टी पार्क स्थापित होने की तैयारियां शुरू हो गईं थी. नई-नई कॉलोनियां दिखाई दे रहीं थीं. पुराने रहवासियों ने अपने बड़े मकानों में या तो किराएदारों के लिए चालें बनवा ली थीं या फिर उन्हें छोटे-मोटे बाजार में बदल डाला था. नगर पालिका परिषद नगर निगम में बदल चुकी थी.  महानगर निगम बनने में शायद कुछ ही समय बचा होगा ऐसा स्पष्ट दिखाई दे रहा था,  नगर की सीमा वहाँ तक बढ़ गई थी जहाँ पहले गाँव और लहलहाते खेत हुआ करते थे.   'फिकर नाट पान भण्डार 'या 'क्या चाहिए मिठाई के लिए सीधे चले आइए ' जैसे बोर्डों के स्थान पर 'गुप्ता कंस्ट्रक्शन' अथवा 'कृष्ण कॉलोनी' जैसे बड़े-बड़े बोर्ड लटके नजर आ रहे थे.

पत्नी का आग्रह था कि बिटिया का विवाह अपने शहर से ही किया जाए. रिश्तेदार और परिचित सब इधर ही हैं . उधर हैदराबाद तो कोई आने से रहा. अपना घर है ही यहाँ . छोटा भाई यहीं रहता है.अगर अपनो के बीच कार्यक्रम होता है तो बहुत अच्छा रहेगा. और हम यहाँ आ गए थे. अपने शहर.

शहर जरूर बदल गया था ,मगर हमारा घर वैसा ही आज तक था जैसा हम छोडकर गए थे.मैंने महसूस किया था वे सब घर वैसे ही थे जहाँ संपत्ति का बटवारा नहीं हुआ था. हालांकि ऐसे घरों की संख्या कम ही थी. हम बाहर थे भाई यहाँ नौकरी में था ,स्थानीय नौकरी थी , इसलिए ट्रांसफर आदि का झमेला नहीं था. अगर बटवारा हो जाता तो अभी तक हमारे घर में भी चार दुकानें निकल आतीं. भला पांच-छः हजार की मासिक आमदनी कौन छोडता है इस जमाने में. फिर बढता शहर था यह,  लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाए थे. दुनियादार लोग भले ही मूर्ख समझते रहे ,लेकिन शायद हमने बटवारे की बजाए  घाटा उठाते हुए रिश्तों की रक्षा करने को अधिक महत्त्व दे डाला था. मुझे मालूम था शहर में फ़ैली यह महामारी अब हमारे घर को भी नहीं छोडेगी.लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता था कि यह सब बिटिया के विवाह के बाद ही होगा.

हमारे घर के अलावा नहीं बदला था तो मेरा स्कूल-आनंद भवन प्राथमिक पाठशाला . स्कूल का  यह भवन आज चालीस बरस बाद भी वैसा ही नजर आ रहा था जैसा पहले नजर आता था. भवन को अब  गोबर और पीली मिट्टी से तो नहीं लीपा जाता होगा  लेकिन  देखकर लगता था कि गुरुकुल परम्परा का पालन हमारे वक्त की तरह ही हो रहा है . जब टाटपट्टी बिछाने पर धूल उडती थी. ज्ञान गंगा में नहाने से पहले बच्चे धूल गंगा में स्नान कर लेते थे.अब भी ऐसा ही दिखाई देता  था. अब तो हमारे  स्कूल में  कुछ गरीब बस्ती के बच्चों को ही जाते देख रहा था ,जबकि उस समय शाला में हर वर्ग और हर स्तर के परिवार के बच्चे साथ-साथ बैठकर पढा करते थे. सेठ धर्मदास का सुपुत्र टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ता था, तो ठेलागाड़ी चलानेवाले निसार का बेटा अब्दुल भी हमारे पास बैठता था. पुरोहित वृंदावनलाल का बेटा वंशी भी उसी स्कूल में पढ़ता था वहीं मै भी नंगे पैर, कपडे का बना बस्ता लटकाए ,स्कूल की ओर दौड पडता था. स्कूल प्रवेश  के समय पिताजी के   एक चांटे के प्रसाद के कारण कभी स्कूल न जाने का विचार मन में नहीं आया. बस्ते का बोझ दौडने में कभी बाधक नहीं बना , उस समय बहुत सारी पुस्तकें कंधे पर लादकर भी नहीं ले जाना पडती थीं.  मेरा बस्ता मेरी माँ द्वारा हर वर्ष नया सिल कर दिया जाता था. पिताजी का पुराना पैंट पूरी तरह घिसकर जब रिटायर्ड हो जाता तब उसकी तीन चीजें बनती थी . बाजार से सब्जियां,सामान वगैरह लाने के लिए एक थैला,दादी माँ के लिए ठण्ड में पहनने के लिए पूरी आस्तिनों वाला पोलका और मेरे लिए एक बस्ता,जिसे पाकर मैं बहुत खुश हो जाता था.

हर शनिवार को हमारे स्कूल में 'बाल सभा' होती थी. बाल सभा होने के पहले साप्ताहिक टेस्ट होता था. जो लडके फेल हो जाते थे ,उन्हें उस दिन कक्षा की लिपाई करनी होती थी और जो पास हो जाते थे वे 'बाल सभा' में कवितायें, कहानियां  और चुटकुलों का आनंद उठाते थे. अब्दुल और वंशी को कभी बालसभा में रूचि नहीं रही,वे अक्सर कक्षा की लिपाई ही करते थे. 'बाल सभा' समाप्त होती तो सब बच्चे रविवार की छुट्टी के आकर्षण में दौड़ते हुए स्कूल से बाहर निकलते . नीली आँखों वाला बद्री प्रसाद मुझसे पूछता-'कल क्या है ?' मैं खुशी से चहकता 'कल छुट्टी है.' तब बद्रीप्रसाद तुक मिलाते हुए मुझे चिढाता-'तेरी दादी बुड्ढी है.' मुझे बहुत दुःख होता. घर पहुंचकर रोता और दादी को यह बात बताता तो वे मुस्करा देतीं.उनके कुल तीन दाँत थे,वे भी अपनी पकड़ छोड़ बैठे थे.वे मुस्करातीं तो उनमे से एक दाँत लटककर और बाहर निकल आता. वे इस रूप में मुझे और भी ममतामयी लगतीं थीं. वे कहतीं-'बद्री ठीक ही तो कहता है,मैं बुढिया ही तो हूँ..' मैं उनकी गोद में सर रखकर सब कुछ भूल जाता.
कक्षा में बद्रीप्रसाद और मै पास-पास ही बैठते थे. बद्री मुझसे ढाई गुना मोटा था.बद्री के पिताजी शहर के जाने-माने पहलवान थे.उनके साथ बद्री भी कसरत वगैरह किया करता था. बद्री की नीली आँखें उसके कसरती बदन में चार चाँद लगाती थीं. बद्री हमेशा दूसरे सहपाठियों से मेरी रक्षा किया करता था. वह मेरा बहुत अच्छा मित्र था. लेकिन एक छोटी सी घटना ने हमारी मित्रता पर पानी फेर  दिया. मास्टरजी ने हमें कुछ शब्दार्थ याद करके लाने को कहा था. वे एक के बाद एक बच्चे से अर्थ पूछते जा रहे थे.जो बच्चा गलत जवाब देता ,उसे सजा मिलती. उसे पास बैठे सहपाठी का घूँसा खाना पडता था. हालांकि मास्टरजी इसे धौल ज़माना ही कहते थे लेकिन बच्चे पडौसी की पिटाई बड़े जोरदार ढंग से ही किया करते थे. बल्कि हरेक को इंतज़ार रहता था कि कब अपना पड़ोसी गलती करे. जब एक बार मेरी बारी आई तो मास्टर जी ने पूछा-'बताओ रघुवीर 'शक्तिशाली' यानी क्या?' और मैं बगलें झांकने लगा. पास में ही बद्री पहलवान बैठे थे. इशारा होते ही मुझे लगा कि मेरी पीठ से कोई वजनदार चीज टकराई है, और पेट में जैसे कोई गड्ढा सा गहराता जा रहा है.   आँखों के सामने सितारे उभर आए. मै गिर पढ़ा.मास्टर साहब मेरे पास आए, बद्री खुद दौडकर पानी लाया  और मुझ पर छींटे मारे,मुझे पानी पिलाया गया. मै तो ठीक हो गया ,लेकिन इसके साथ ही  मास्टर जी की उस पिटाई परम्परा का भी अंत हो गया. बाद में मैंने बद्री प्रसाद से सदा के लिए बोलचाल बंद कर दी  .फिर कभी हम एक दूसरे से नहीं बोले.मैं उससे दूर इस्माइल के पास बैठने लग गया.

बचपन की यादों में डूबा मै हमारे स्कूल से लगे बाजार में जहाँ खडा  था,उसके ठीक सामने बर्तनों की दूकान थी. मेहमानों को  बिदाई में उपहार स्वरूप स्टील की प्लेंटे देने की योजना थी.मैं दूकान में चढ गया.'भैया ज़रा स्टील की प्लेंटे दिखाना.' मैंने कहा. 'जरूर देखिए साहब.' दुकानदार ने पलटकर कहा. हमारी आँखें मिली. दुकानदार की शक्ल मेरी जानी-पहचानी सी लग रही थी.बरबस मेरा हाथ मेरी पीठ की तरफ गया.दुकानदार ने मुझे पहचान लिया था.-'तुम रघुवीर ही हो ना.' वह काउंटर छोडकर बाहर आ गया था और मेरे गले में उसकी बाहें हार बनकर अपने शहर में मेरा स्वागत कर रहीं थीं.  आंसुओं से धुंधलाती दृष्टि के बावजूद मै बद्री की नीली आँखों में झिलमिलाता हुआ अपना प्यारा शहर स्पष्ट देख रहा था.





रोशनी के पंख

रोशनी के पंख

ननकू की गुमटी पर थोडी देर गपशप करके सुखीराम अपनी झोपडी मे लौटा तो देखा कि चिमनी की रोशनी मे काशी अब तक पढ रहा था।
‘सो जा बेटा काशी, बहुत रात हो गई है।’ सुखीराम ने बेटे के कन्धे पर हाथ रखते हुए कहा ।
‘दादा, थोडा सा और पढना बचा है, कल तिमाही टेस्ट है, गुरूजी ने कहा है,इस परीक्षा के नम्बर भी वार्षिक परीक्षा के रिजल्ट मे जुडेंगे।’ चिमनी के उजाले मे अपनी किताब के पन्ने पर नजर गडाए-गडाए ही काशी ने कहा।
तभी हवा का तेज झोंका आया और चिमनी की लौ फडफ़डाने लगी। किसी तरह काशी अपने हाथो एवम किताब की आड करके चिमनी को बुझने से रोकने की कोशिश करने लगा।
सुखीराम को मन मे इस बात का बडा दुख रहता था कि काशी पढना चाहता है लेकिन  स्थिति ऐसी नही है कि उसे रोशनी भी उपलब्ध करा सके। कौनसा सुख मिला है उसे अपने जीवन में। लोग ठीक ही कहते हैं न जाने क्या सोंचकर माँ बाप ने उसका नाम सुखीराम रखा होगा।  हाँ, सुखीराम को थोडी खुशी तब जरूर मिली थी जब काशी परीक्षाएँ पास करते हुए पाँचवी कक्षा मे पहुँच गया था।

सागवान के घने जंगलों के बीच से घाटियों वाला हाइवे गुजरता था। सडक से लगकर कुल जमा सात झोपडियों की बस्ती ही सुखीराम का गाँव थी। पत्नी कुसुमा और वह जंगलों के ठेकेदारों के घरों और खेतों मे हाड-तोड मेहनत करके किसी तरह अपना खर्चा पानी चला पा रहे थे। ठेकेदार के परिवार और उनके रहन सहन को देखकर सुखीराम ने इतना तो समझ ही लिया था कि अपने बेटे काशी को वह स्कूल मे जरूर डालेगा। पढ लिख गया और लिखा-पढी का साफ-सुथरा काम-धन्दा मिल जाए तो उसकी तरह खून तो नही जलाना पडेगा।
जब सरकार ने उसकी बस्ती से थोडी दूर स्कूल खोला तो सुखीराम ने आगे रहकर काशी को दाखिल करा दिया। आदिवासी बच्चों को पंचायत और जिले का शिक्षा विभाग भी सहयोग कर रहा था। काशी की लगन और चिमनी की रोशनी मे उसे पढता देखकर माँ बाप की तो जैसे आत्मा तृप्त हो जाती थी। ऐसे मे यह हवा.... न जाने कब उसकी बस्ती मे बिजली आएगी। न जाने कब काशी बल्ब की तेज रोशनी मे पढाई कर सकेगा।

उस दिन बस्ती से लगी हुई पहाडी के आस-पास गहमागहमी दिखाई दे रही थी। बडे-बडे पंखों के आकार के कुछ यंत्र तथा विशालकाय खम्बों के हिस्से ट्रकों पर लादकर पहाडी के ऊपर पहुँचाए जा रहे थे। एक ट्रकवाले से सुखीराम ने जानना चाहा तो पता चला कि पहाडी पर हवा से बिजली बनाने की मशीनें लगाई जा रहीं हैं। एक बार फिर सुखीराम को खुश होने का अवसर मिल गया। चलो अच्छा रहा... अब अपनी ही पहाडी पर हवा से बिजली बनेगी...अपना काशी बिजली के बल्ब की रोशनी मे पढ सकेगा।


थोडे दिन बाद एकबार फिर पहाडी पर हलचल दिखाई दे रही थी। ऊपर तक जाने वाले रास्ते को रंग बिरंगी झंडियों से सजाया गया था। पहाडी पर अनेक दैत्याकार पंखे रावण के पुतलों की तरह खडे हो गए थे। सयंत्र का उदघाटन विदेशी कम्पनी का कोई बडा अफसर कर रहा था, प्रदेश के कोई मंत्री भी इस अवसर पर मौजूद रहने वाले थे।  ननकू की गुमटी पर खडे सुखीराम और उसकी बस्ती के लोग बडे कौतुहल से सारा नजारा देख रहे थे। पटाखों की गूँज  और रंगीन गुब्बारों के आकाश मे उडते ही विशालकाय पंखे हवा के प्रवाह से घूमने लगे और शायद मशीनों ने बिजली बनाना शुरू कर दी थी।

सुखीराम की बस्ती से होकर गुजरने वाली हवा के प्रवाह से पहाडी के पंखों को घूमते हुए दो साल बीत गए । सुखीराम समझ ही नही पा रहा था कि उसकी हवा, उसकी पहाडी की मदद से बनने वाली बिजली आखिर उसकी बस्ती और उसकी झोपडी तक क्यों नही पहुँच पा रही है। कहाँ उड गई पवन ऊर्जा पंख लगा कर...।

कल काशी की आठवीं कक्षा का इम्तिहान है। हवा का झोंका एकाएक फिर आया, चिमनी की लौ फिर लहराई, लेकिन काशी ने अपने दोनो हाथों से बुझने से उसे बचा लिया था ।












मॉस्किटो बाइट

मॉस्किटो बाइट

धुकर जी के घर के सामने स्टेडियम बनना प्रस्तावित था। देखते देखते दस साल हो गए थे लेकिन मैदान खाली पडा था। अपने घर को फार्म हाउस जैसा हो जाने का अनायास लाभ जरूर इससे मधुकर जी को मिल गया था। बरसात होते ही मैदान हरा भरा हो जाता था। गैलरी में आरामकुर्सी मे बैठकर कई नई कविताओं का सृजन यहीं सम्भव हुआ था। घास के बीच बरसाती पानी के पोखर से बन गए थे जिनमे कुछ बगुले अपनी चोंच गडाकर भोजन तलाश रहे थे। अचानक मधुकर जी को गरदन  के पास कुछ होने का अहसास हुआ। जब तक उनका हाथ वहाँ तक पहुँचता मच्छर अपना काम कर चुका था। ठीक कान के नीचे ‘मॉस्किटो बाइट’ हुआ था। मधुकर जी के चेहरे पर अनायास मुस्कुराहट तैर गई। रूपम यहाँ होता तो जरूर चिंतित हो उठता, कहता ‘दादाजी आपको मॉस्किटो ने बाइट कर लिया है, सॉरी सॉरी मच्छर ने काट लिया है ,मै क्रीम लगा देता हूँ,जलन कम हो जाएगी।’

गैलरी मे बैठे बैठे जब शाम घिर आती तो अक्सर मच्छरों का प्रकोप बढ जाता था। कभी काटते,कभी नही भी काटते लेकिन रूपम के लिए यह नित्य का खेल हो गया था।
उस दिन मधुकर जी थोडे खुश जरूर हुए थे जब उन्हे पता चला था कि बेटे को कम्पनी के किसी प्रोजेक्ट की वजह से दो साल के लिए अमेरिका जाने का मौका मिल रहा है। बेटे के परिवार को लेकर चिंता भी उन्हे सता रही थी। कई प्रश्न सामने थे, क्या बहू भी अपना जॉब छोडकर अमेरिका जाएगी? रूपम की पढाई का क्या होगा? बैंगलौर मे सब अच्छे से जम गया था। बेटा साफ्ट्वेयर इंजीनियर था। बहू मल्टी नेशनल में वित्तीय सलाहकार की अच्छी पोजीशन पर काम कर रही थी। सब कुछ गडबडा जाएगा। देश मे ही होने से पोते से जब चाहे मिला जा सकता था,बैंगलौर जाकर थोडा चेंज भी मधुकर जी का हो जाया करता था।

सप्ताह भर मे बात साफ हो गई थी। बेटा अकेला ही अमेरिका जा रहा था। बहू ने अपने कैरियर से समझौता नही करने का फैसला कर लिया था। बेटा विदेश चला गया, बहू विमेन होस्टल मे शिफ्ट कर गई, रूपम को दादा दादी के पास भेज दिया गया।

रूपम को अच्छे स्कूल मे दाखिल कराने मे कोई खास परेशानी नही उठानी पडी। मधुकर जी शहर के प्रतिष्ठित साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता थे।साहित्य,संसकृति तथा लोक कल्याण की गतिविधियों मे स्थानीय प्रशासन एवम लोगों द्वारा सबसे पहले मधुकर जी को ही याद किया जाता था। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होने अपना जीवन पूरी तरह साहित्य एवम समाज को समर्पित कर रखा था। यही कारण था कि उनके कहते ही लम्बी प्रतीक्षा सूची के बावजूद रूपम को एड्मिशन आसानी से  मिल गया था। रूपम के आने से पत्नी की बीमारी के बाद मधुकर जी के जीवन मे खुशियों का इन्द्रधनुष सा छा गया।

अपने मम्मी डैडी के समकालीन पालन पौषण तथा बैंगलौर के मँहगे प्लेस्कूल के वातावरण के फलस्वरूप रूपम अन्य बच्चों की तुलना में होशियार था। बैंगलौर मे तो सब कुछ वैसे ही अंगरेजीमय होता था,यहाँ भी स्कूल ने रूपम को अंगरेजी सिखाने मे कोई कसर नही छोड रखी थी। इधर आकर रूपम द्विभाषी हो गया था। अंगरेजी और हिन्दी दोनो शब्द वह साथ साथ बोलता था। स्कूल मे उसे मॉस्किटो बाइट करते थे तो घर पर वह मच्छरों से परेशान हो जाता था।

दीपावली पर बेटा तो नही आ सका पर बहू घर जरूर आई। माँ को पाकर रूपम खुशी से भर सा गया। पूरे समय वह चहकता रहा। दादा तथा स्कूल मे बिताए समय की बातें बताते हुए वह थकता नही था। इतना बोल रहा था कि जैसे सब कुछ कह डालना चाहता हो अपनी मम्मी से।
छुट्टियाँ समाप्त हुईं तो बहू वापिस बैंगलौर लौट गई। दादा दादी और पोता फिर अपनी मस्ती मे लीन हो गए।

उस दिन बहुत दिनों के बाद बेटे का अमेरिका से फोन आया था । कह रहा था ‘पापा अपने और माँ के स्वास्थ्य का ध्यान रखना। रूपम भी आप लोगों को तंग करता होगा, उसका काम भी आपके लिए बढ गया है। मुझे चिंता हो रही है। हमारा विचार है रूपम को होस्टल मे डाल देना चाहिए। घर पर रह कर वह अपनी अंगरेजी भी भूलता जा रहा है। वैसे भी उधर के स्कूलों की अंगरेजी ठीक नही है। ऐसा न हो कि रूपम का भविष्य बिगड जाए। घर पर रहकर हिन्दी की आदत पड जाएगी तो बाद मे बहुत दिक्कत आएगी।’

मधुकर जी अपना बाँया कान सहला ही रहे थे कि ठीक ललाट पर किसी मॉस्किटो ने जोरदार बाइट किया। काफी अन्धेरा घिर आया था। आरामकुर्सी छोड वे अन्दर कमरे मे चले आए।




रिंगटोन

रिंगटोन

समीर पुणे मे प्रबंधन की पढ़ाई कर रहा था। तब हमारे यहाँ टेलीफोन नही था। मोबाइल फोन भी किसी किसी के पास ही होता था। ले दे कर सार्वजनिक टेलीफोन बूथ पर एसटीडी सुविधा होती थी।फिर जब घर बदला तो पड़ौसी के यहाँ जरूर टेलीफोन कनेकशन था।शर्माजी भले आदमी थे,समीर को उनका टेलीफोन नम्बर दे रखा था।अक्सर वह रविवार को शर्माजी के यहाँ फोन लगाकर हमसे बातचीत कर लिया करता था।

जब भी रविवार आता माँ सुबह से ही समीर के फोन का इंतजार करने लगती।हम उनकी इस अधीरता का मजा लिया करते। वह कहती-'हाँ इंतजार तो रहता ही है,मूल से प्यारा जो होता है ब्याज।'

शर्माजी के घर में रविवार को सुबह जब टेलीफोन की घंटी बजती थी तो पत्नी रसोई में गैस पर रखे कुकर को नीचे उतार लेती थी,माँ के कान चौकन्ने हो जाते थे।हम सब शर्माजी की आवाज का बेसब्री से इंतजार करने लगते,थोडी देर ही में वहाँ से कोई कहता-'फोन आया है पूना से,बात कर लीजिए।'
माँ सबसे पहले दौड़ पडती थी पोते के हालचाल जानने के लिये । वह रविवार मुझे अब तक याद है जब माँ की बैचेनी मुझ से देखी न गई थी। शर्माजी किसी शादी में गए हुए थे,उनके घर के दरवाजे पर ताला पड़ा हुआ था,अंदर टेलीफोन की घंटी घनघना रही थी।बंद दरवाजों के पीछे से समीर जैसे बहुत देर तक पुकारता रहा था हमें।

फिर एकाएक समय बहुत तेजी से बदल गया।देश में संचार क्रांति हो गई। मोबाइल फोन तो जैसे शरीर का हिस्सा हो गये।बैंक की नौकरी के चलते हर तीसरे साल तबादला हो जाता था।माँ भी नए शहर और नए घर में हमारे साथ ही होती थी।कोर्स पूरा होते ही समीर का भी कैम्पस सिलेवक्शन हो गया। अब वह नौकरी के कारण दिल्ली पहुँच गया था।उसके पास अपना मोबाइल था,जब चाहता हमसे बात कर लिया करता ।लेकिन बात करने में अब वह बात नहीं रही जो शर्माजी के लेंडलाइन फोन में होती थी।

हर तीन साल में बैंक से मुझे नया हेंडसेट मिलता था। पुराने हेंडसेट पत्नी बेटी को हस्तान्तरित होते गए। बाद में एक और नया हेंडसेट मिला , कुछ दिनों तक तो वैसे ही पड़ा रहा फिर नई सिम डलवाकर माँ को दे दिया।बेटी ने माँ के बहुत से परिचितों रिश्तेदारों के नंबर उनके सेट मे सेव कर दिए तथा डाइलिंग के लिए सरलीकृत  व्यवस्था कर दी।  एक नम्बर दबाने पर मामाजी का,दो पर मेरा,तीन से समीर का ,चार से बुआजी का नम्बर आसानी से डायल हो जाता था।अपना फोन मिल जाने से माँ में विशेष आत्मविश्वास दिखाई देने लगा।अपने फोन को वह बड़े जतन से सम्भाल कर रखतीँ ।अंपने हाथों से उन्होने फोन का एक कवर भी बनाया। मिलने जुलने वालों को वे बड़े गर्व से बतातीं कि अंब उनके पास भी अपना मोबाइल फोन है,वे उन्हे सीधे फोन लगा सकते हैं।शुरु शुरु मे तो माँ को बहुत फोन आए। वह भी अपने मोबाइल से भाइयों,देवरानी आदि से बातें कर लिया करतीं।हालचाल जाननें के साथ-साथ उनका समय भी कट जाता,मन बहल जाता और उसके बाद स्मृतियों के संसार मे वे घंटों खोई रहतीं।महीने दो महिनों तक ही चल सका यह सिलसिला। फिर कम हो गए माँ को फोन आना। माँ का मोबाइल ज्यादातर खामोश रहने लगा।

पिताजी की तस्वीर के पास अक्सर माँ का चश्मा और मोबाइल रखा होता था।कभी रिंगटोन बजती तो माँ फोन कान से लगाती हुई गुडहल के पेड़ के समीप आकर सुनने लगती। बहुत देर तक फोन चलता रहता। बात समाप्त होने पर मोबाइल पिताजी की तस्वीर के पास रखकर फिर अपने कामकाज में जुट जाती।

बहुत दिनों तक तो हम यही समझते रहे कि समीर माँ को फोन करता होगा,लेकिन फोन सुनने के बाद उनके  चेहरे के भावों से ऐसा नही लगता था कि पोते से बात हुई है। मैं उनसे पूछता कि किससे बात हुई है तो वे अक्स टाल जातीं,बताती नहीं कि किसका फोन था। पत्नी-बेटी ने भी पूछकर देख लिया,लेकिन सफलता नही मिली।अब हमारे लिए यह जिज्ञासा नही रही बल्कि माँ को आनेवाला फोन काल हमारे लिए चिन्ता की बात हो गई थी। बुजुर्गों को ठगने लूटने की घटनाएँ आम हो गर्ईं हैं,हमारी परेशानी स्वाभाविक थी।कहीं कोई बदमाश माँ को परेशान तो नहीं कर रहा इसलिए थोड़ा गुस्सा जताते हुए मैने जब इस बारे में जोर देकर पूछा तो माँ ने चिढ़कर कहा-'रतन टाटा का फोन आता है मेरे पास,बोल क्या कहना है।'


माँ के इस तरह चिढ़ जाने से मैं चुप हो गया और घूमने के लिए घर से बाहर निकल गया।उस दिन बात यहीं समाप्त हो गई।

माँ के मोबाइल पर कभी दो बार फोन आता फिर दिन मे एकबार ही आने लगा। हाँ,मेसेजेस तो बहुत आते थे जिन्हे बेटी डिलिट कर दिया करती थी।हर दिन आनेवाले फोन को माँ हमेशा सुनती। फोन सुनकर फिर पिताजी के चित्र के पास रख देती।भागवत कथा आदि में जब जातीं तो अपना मोबाइल ले जाना नहीं भूलतीं। हम लोगों ने भी कह रखा था कि अपना मोबाइल सदैव पास रखे ताकि जरूरत पड़ने पर हमसे संपर्क हो सके

उस दिन वे अपना मोबाइल वहीं पिताजी की तस्वीर के पास ही भूलकर पडौस में हो रहे भजन-कीर्तन में चली गर्ईं थीं। मैं बैंक से लौटा ही था।नब्वे साल पुराने हमारे बैंक का बड़े बैंक में विलय हो गया था इसलिए मन में खिन्नता और उदासी थी,अखबार सामनें फैला रखा था लेकिन दिमाग कहीं और लगा था।तभी माँ के मोबाइल की रिंगटोन गूंज उठी-'भूल न जाना तुम से कहूँ तो- - -।' माँ को फोन तो दे दिया था लेकिन रिंगटोन वही पुरानी बजती थी। पत्नी ने कई बार कहा था कि इसे बदलकर कोई भजन या आरती की टोन डाल दूँ लेकिन मैं अब तक यह नहीं कर पाया था। मैंने माँ का मोबाइल फोन उठाया,कान से लगाया,देखें माँ के रतन टाटा क्या कह रहे हैं। सामने से आवाज आ रही थी-' इस गाने को रिंगटोन बनाने के लिए कृपया एक दबाएँ , मैंने एक गाना सुना फिर दूसरा सुना,--कुल आठ लोकप्रिय गीतों के मुखड़े रतन टाटा ने सुनाए।

माँ के मित्र ने मेरी उदासी भी  कुछ  देर के लिए दूर कर दी थी।