लकड़ी की घंटी
फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर दिल्ली से आए पत्रकार को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी। मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से वह मुखातिब हो रहा था।
जब एक डिलीवरी बॉय के पास वह अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया।
'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा।'
'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'। रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी।
'चलिए यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?'
'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में। नौकरी नहीं मिली है अब तक। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए। परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं।'
'क्या परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' रंजन ने पूछा।
युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है।' युवक ने संकोच से बताया।
'आप निराश न हों, इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'।
रिकॉर्डिंग का अपना काम समाप्त कर रंजन ने एक टैक्सी बुक की और महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में स्थित बचपन के मित्र अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया।
ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे। स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी अभिज्ञान से ही घंटी बजवाया करते थे। वह जब मुस्कुराता हुआ लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते थे। रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।
'कैसे हो अभिज्ञान भाई! क्या हाल-चाल हैं?' गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की।
'सब बहुत बढ़िया है भाई! बड़े मजे से कट रही है जिंदगी। बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है। बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है।'
रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था। उसकी बातों में खुशी की वैसी खनक नहीं थी। एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था। स्मृति में जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो।
बातों बातों में रात के दस बज गए। तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया।
'शांतनु भी आ गया है कॉलेज से। लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया।
अभिज्ञान ने फिर कोई घंटी बजाई थी। मधुर स्मृतियों को बेसुरा बनाती खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई।
ब्रजेश कानूनगो
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