Sunday, June 23, 2024

लकड़ी की घंटी

लकड़ी की घंटी 

दिल्ली का टीवी रिपोर्टर रंजन इस शहर में रिपोर्टिंग के लिए आकर बहुत ज्यादा उत्साहित था.  खुशी इस बात की भी थी कि अपने स्कूल के दिनों का उसका खास दोस्त अभिज्ञान भी इसी शहर में रहता था. मित्र से मिलने का सुख उसकी यात्रा को और अधिक उमंग और कौतूहल से भर रहा था. दिन में अपना कार्य निपटा कर शाम को अभिज्ञान के साथ पुराने दिनों को दोबारा से अनुभव करने की कल्पना उसे रोमांचित कर रही थी. छोटे से कस्बे के सरकारी स्कूल में रंजन और अभिज्ञान ने अपनी प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई की थी. फेसबुक पर पुराने साथी से मुलाकात के बाद संयोग से आज मिलने का प्रत्यक्ष अवसर भी अनायास ही मिल रहा था.

नाइट कल्चर और मेट्रो में बदलते शहरों में युवाओं की स्थिति को लेकर रंजन को एक स्टोरी करनी थी, जिसके तहत फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर रंजन को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी.

खानपान के मामले में इस शहर को बड़ी ख्याति प्राप्त थी. दुनियाभर के लोग यहां के जायके का मजा लेने देश विदेश से खिंचे चले आते थे. सोशल मीडिया के दौर में फूड ब्लॉगर्स ने इस विशेषता को और अधिक व्यापक और चर्चित बना दिया था. स्ट्रीट फूड के बड़े बड़े बाजार दिन रात गहमा गहमी और रौनक से भरे होते थे. रंजन ऐसे ही एक बाजार में अपनी मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से मुखातिब हो रहा था, बतिया रहा था.  कई लड़कों से डिलीवरी सिस्टम , कठिनाइयों और ग्राहकों के व्यवहार आदि जैसे विषयों पर बातचीत की और अपने कैमरे में रिकॉर्ड करता रहा. 

जब एक डिलीवरी बॉय के पास अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया. 

'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा.' 

'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'.रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी. 

'चलिए नाम मत बताइए, यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?' 

'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में. नौकरी नहीं मिली है अब तक. कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए. परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं. व्यस्त भी रहता हूं और नौकरी नहीं मिल पाने की थोड़ी हताशा से भी उभर जाता हूं.' 

'परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' 

रंजन ने पूछा तो युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है, जमीन जायदाद है, पर सब केवल नाम भर की ही रह गई है अब. इसीलिए कैमरे पर आने से मना किया है सर'.  युवक ने बहुत संकोच से  रंजन से कहा.

'नहीं नहीं, आप आश्वस्त रहिए. हम केवल बातचीत ही करेंगे और अपनी रिपोर्ट बनाने में इससे हमें काफी मदद मिलेगी. वैसे कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता. इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'. रंजन ने कहा और अन्य युवकों से चर्चा करने लगा.  रंजन ने बाजार में बहुत से लोगों से देर तक गुफ्तगू की.  

काम समाप्त कर रंजन अपना सामान, कैमेरा आदि होटल में छोड़ एक टैक्सी से महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया.   

ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे. अभिज्ञान और वह एक साथ बैठकर कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ा करते थे. अभिज्ञान बहुत मधुर आवाज में फिल्मी गीत गाया करता था, उसकी आवाज बहुत अच्छी थी. स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी उसी से घंटी बजवाया करते थे. वह जब मुस्कुराता हुआ बड़ी लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते.

रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

'कैसे हो अभिज्ञान भाई! कारोबार और परिवार के क्या हाल-चाल हैं?'  गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की.

'सब बहुत बढ़िया है भाई!  बड़े मजे से कट रही है जिंदगी. बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी  कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है. और बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है.' 

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था. उसकी बातों में खुशी की खनक नहीं थी. एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था. जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो. 

दोनों मित्र काफी देर तक बातचीत करते रहे,बातों बातों में रात के दस बज गए. तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया. 

'शायद शांतनु भी आ गया है कॉलेज से. लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया.

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान ने फिर घंटी बजाई थी. लकड़ी की घंटी से निकली खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई. 


ब्रजेश कानूनगो

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