नैतिक समर्थन
भाई साहब का विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए। इसी सोच के साथ सत्ताधारी दल की बजाए वे मुख्य विपक्षी पार्टी को ही हर बार अपना वोट देते रहे।
इस बार चुनाव के वक्त देश में घटी घटनाओं से वे काफी दुखी और निराश थे। कुछ संसदीय क्षेत्रों में ऐसा दूषित वातावरण बना कि विपक्षी दल और निर्दलीय प्रत्याशियों ने एन मतदान के पहले ही अपने नाम वापिस ले लिए। इसके चलते कहीं सत्ताधारी पार्टी का उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गया तो कहीं एकतरफा मुकाबले से चुनाव का सारा आकर्षण और महत्व ही समाप्त हो गया। भाई साहब का क्षेत्र भी इसी राजनीतिक संकट का शिकार हो गया था।
भाई साहब, अब आप किसको वोट देंगे? आपके समर्थन वाली मुख्य राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार ने तो अंतिम समय पर अपना नामांकन ही वापिस ले लिया है। ऊपर से वह प्रमुख विरोधी पार्टी में जा मिला है। लड़ाई में अब कुछ वे निर्दलीय प्रत्याशी ही रह गए हैं जिन्होंने षड्यंत्र और दबावों के बावजूद अपने नाम वापिस नहीं लिए। मित्र ने पूछा।
बंधु, संसदीय चुनावों में यह घटना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मतदाता ही नहीं इससे हमारा लोकतंत्र भी शर्मसार हुआ है। मतदान के लिए जरूरी समान लेवल फील्ड के अधिकार की अनिवार्यता का भी हनन हुआ है। लोकतंत्र में राजनीति कलंकित हुई है। वे बोले।
फिर भी भाई साहब वोट तो आपको डालना ही पड़ेगा। क्या करेंगे ? नोटा का भी एक विकल्प है मशीन में। विपक्षी दल ने नोटा का बटन दबाने का आग्रह भी किया है अपने अभियान में। मित्र भाई साहब के अगले कदम के प्रति उत्सुक था।
हां, चुनाव निर्विरोध तो शायद नहीं हो सकेगा। मुकाबला तो नोटा से भी हो सकता है। भाई साहब ने कहा।
ये तो है। विपक्ष तो पहले ही कमजोर है, जीतने वाला तो वैसे भी लाखों मतों के अंतर से जीतता लेकिन अब तो और अधिक वोटों से जीतेगा। शायद रिकॉर्ड भी बन जाएगा किंतु मुकाबला तो एकतरफा ही होगा। नोटा में डालना भी उसे विजयी होने से रोक नहीं सकता। हां यदि विपक्षी पार्टी का प्रतिद्वंदी मैदान में होता तो अवश्य ही उनका जीतना, हारना भी सम्मानजनक होता। मित्र ने कहा।
बंधु, मैं तो अपने तरीके से इस गलत प्रवृत्ति का विरोध करूंगा। भाई साहब ने बताया।
याने आप नोटा को वोट करेंगे? मित्र ने पूछा।
भाई साहब आगे कुछ बोले नहीं। मतदान वाले दिन एक निर्दलीय प्रत्याशी को वोट कर आए जिसने षड्यंत्रकारियों के नामांकन वापिस लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। जिससे चुनाव निर्विरोध नही हो पाया था। मतदाता के अधिकार को छीना नही जा सका था।
चुनाव परिणाम तो पहले से ही वे जानते थे, वर्तमान सांसद का बहुमत से जीत जाना निश्चित था किंतु भाई साहब के भीतर बड़ा संतोष था। मतदान के बाद लोकतांत्रिक प्रतिरोध का एक नैतिक नागरिक बोध उन्हे अधिक शक्ति और संबल प्रदान कर रहा था।
ब्रजेश कानूनगो
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