अनोखा प्रेम
दा साहब का पूरे इलाके में बड़ा रौब था. इसका मतलब यह नहीं कि उनके रुतबे और संपत्ति के कारण उनकी पूछ परख थी. वे कोई जागीरदार ,जमींदार भी नही थे, किसान परिवार में जन्म जरूर लिया था लेकिन उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र और अपने गांव में सबका स्नेह सम्मान अपने स्वभाव और मिलनसारिता से खुद अर्जित किया था.
उनका परिवार बहुत बड़ा था. परिवार में स्वजनों की संख्या तो बहुत कम थी परंतु पशुओं की संख्या उनसे भी अधिक थी. ज्यादातर गाय, बैल, भैंस के अलावा कुछ बकरियां भी उनके परिवार का हिस्सा थीं. जितना वे अपने रक्त संबंधियों से प्यार करते थे उतना ही प्रेम अपनी गायों और पशुओं से करते. अपने पशुओं को भी वे नाम से पुकारते थे.
दो गायों के नाम तो उन्होंने रमकुडी और झमकुडी रख छोड़े थे. जब भी वे चारागाह में चरती इन गायों को नाम देकर पुकारते वे दौड़ती हुई उनके पास चली आती थीं. इन गौ माताओं को दा साहब का विशेष स्नेह प्राप्त था. अपने बाड़े (तबेले) में जब दा साहब रमकुडी, झमकुडी की गरदन प्यार से सहलाते वह जैसे प्रफुल्लित हो जाती थी. दा साहब की उपस्थिति मात्र से तबेले के पशुओं में अनोखी खुशी की लहर दौड़ जाती थी. चारागाह और खेतों से लौटकर जैसे सारे पशु दा साहब का इंतजार ही करते रहते थे. ये एक ऐसा अलग प्रेम संबंध था जब दा साहब रात को भी एक दो बार बाड़े में जाकर पशुओं को देख आते, चारा पानी की व्यवस्था कर देते, स्नेह से दुलार आते.
दीपावली का समय था. गांव के घर आंगन पशु आदि सज संवर रहे थे. लिपाई,पुताई के बाद दीवारें और आंगन मांडनो से भर गए थे. पशुओं के सींगों को रंगीन पेंट से रंगा गया था. गायों और अन्य गौधन की देह पर रंग बिरंगी फूल पत्तियां बनाई गईं थीं. उनके गलों में कोडियों की मालाएं पहनाई जा रही थीं. पूरा वातावरण उल्लास से भर गया था. लेकिन दा साहब के बाड़े के पशु बहुत उदास नजर आ रहे थे. हालियों और अन्य सेवकों ने रमकुडी झमकुडी सहित सभी पशुओं को सजाया संवारा था लेकिन पशु उदास से लग रहे थे. कारण स्पष्ट था, एक सप्ताह से दा साहब के स्नेहमयी हाथों का स्पर्श उनकी देह से हो नहीं पाया था. कहां थे दा साहब? शायद यह प्रश्न उन पशुओं के मन में अवश्य रहा होगा.
हर दिन रमकुडी तबेले में जाने से पहले दा साहब के घर के आंगन से होकर गुजरती और ठिठक जाती थी. आंगन के आसपास दा साहब के घर का औसारा होता था, वहीं से पत्थर की खुली सीढ़ियां दा साहब की बैठक और उनके शयन कक्ष तक दूसरी मंजिल तक पहुंचती थी. वहीं से रमकुडी दा साहब की उपस्थिति या हलचल को महसूस करने की कोशिश करती थी. यह उसका दुर्भाग्य था कि अस्पताल में भरती दा साहब को वह कैसे महसूस कर पाती.
दीपावली की रात दा साहब को अस्पताल से छुट्टी मिली तो उन्हे घर ले आया गया. डॉक्टर ने अभी एक सप्ताह और आराम की सलाह दी थी. दा साहब भी अपने पशुओं, गायों विशेषकर रमकुड़ी झमकुडी की खैर खबर लेने को बैचेन थे.
गोरधन पूजा के दिन सुबह सुबह जब दा साहब की बहू उन्हें चाय देने गई तो दंग रह गई. दा साहब के पलंग के पास उनकी दुलारी रमकुडी आराम से बैठी थी और दा साहब उसकी गर्दन को अपने हाथों से सहला रहे थे. पिछली रात रमकुडी ने तबेले की ओर जाते हुए दा साहब की उपस्थिति को शायद उनकी खांसी की आवाज से महसूस कर लिया था और वह सीढ़ियां चढ़कर उनके पास पहुंच गई थी.
गोरधन पूजा के वक्त दा साहब ने गायों और बैलों की पूजा की, प्यार से उन्हें दुलारा तो गले में पड़ी सैकड़ों घंटियों की गूंज के साथ अनोखे प्रेम के दीप सबकी आंखों में झिलमिलाने लगे।
ब्रजेश कानूनगो
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