पुण्य पथ
कुसुम को एक तरह से मन में खुशी भी थी और थोड़ा दुख भी हो रहा था कि बेटे बहू को विदेश गए अभी छह माह भी नहीं हुए थे और वापिस लौटना पड़ा था।
कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के आने से थोड़ा पहले ही प्रभात का विवाह बहुत धूमधाम से किया था कुसुम ने। तनिष्का जैसी सुंदर और गुणवान बहू को पाकर जैसे ढेर सारी खुशियां परिवार को मिल गई थीं।
बहू के शुभ पांव घर में पड़े तो बेटे को भी नौकरी में तरक्की मिल गई। दुख इस बात का था कि कम्पनी ने नई नियुक्ति सात समंदर पार विदेश में कर दी थी।
शादी को एक माह भी नहीं बीता होगा कि नव विवाहित बेटे बहू को परदेस जाना पड़ा। तनिष्का के साथ रहने की कुसुम की सारी इच्छाएं मन में ही दब कर रह गईं। जैसे तैसे भारी मन से बेटे बहू को विदा किया था उसने।
महीने भर में ही अचानक दुनिया भर में फैल गई संक्रामक महामारी ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया था। सब लोग घरों में कैद हो गए थे। देश हो या परदेश सभी जगह एक सी स्थिति, एक सा भय का वातावरण। प्रभात और तनिष्का भारत में अकेली रह गई माँ कुसुम की चिंता में परेशान हो गए। एयर लाइंस भी सब बन्द हो गईं थीं।
कंपनी ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधाएं अपने कर्मचारियों को उपलब्ध करा दीं। इस बीच सरकार ने राहत अभियान के तहत विशेष विमान सेवाएं शुरू कीं तो प्रभात और तनिष्का को भी इसका लाभ मिल गया। वे लोग भारत लौट कर घर से ही अब कंपनी का काम कर रहे थे। हालांकि प्रभात ज्यादातर कामकाज रात को ऑनलाइन ही करता। दिन में आराम करता।
तनिष्का ने भी घर का काम संभाल लिया। काम वाली बाइयों को अभी भी काम के लिए बुलाना शुरू नहीं किया गया था। सब काम कुसुम और तनिष्का मिल जुल कर कर लेतीं थीं।
भारतीय संस्कारों वाली कुसुम ने तनिष्का को कह रखा था कि वह एक रोटी कुत्ते और गाय को देने के लिए भी अतिरिक्त बनाया करे। उनका घर नए विकसित बायपास के पास बनी कॉलोनी में होने से ग्रामीण परिवेश और भारतीय संस्कारों से अब भी जुड़ा हुआ था। बहू तनिष्का दो रोटियां ज्यादा बनाकर नियमित रूप से चौकीदार के कुत्ते शेरू को और दूध वाले भैया की गाय को खिला आती।
कुछ दिनों से कुसुम महसूस करने लगी थी कि तनिष्का अब जरूरत से कुछ ज्यादा ही संख्या में रोटियां बनाने लगी है और गाय कुत्ते के लिए ले जाने लगी है। सास तो आखिर सास ही होती है। तनिष्का द्वारा किया जा रहा यह अपव्यय थोड़ा बर्दास्त से अधिक हो गया उसके लिए। पुण्य कमाने की भी एक सीमा होती है।
आखिर एक दिन कुसुम ने तनिष्का को टोक ही दिया- 'ये इतनी सारी रोटियाँ क्यों ले जाती हो? एक दो ही ठीक हैं!'
लेकिन जो उत्तर तनिष्का ने दिया वह बहुत चौंकाने वाला था। तनिष्का ने बताया कि वह जो अतिरिक्त भोजन बनाकर ले जाती है उसे वह एक ऐसे युवक को देकर आती है जिसकी नौकरी कोरोना काल में आई मंदी की वजह से चली गई है। परेशानी में वह अर्धविक्षिप्त सा हो गया है और मंदिर के ओटले पर बरगद की छांव में बेसुध सा दिनभर पड़ा रहता है।
उसने आगे कहा- 'मम्मी जी मैं ठीक कर रही हूँ न! हम तो फिर भी बेहतर हैं जो हमें बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने घर से काम करने को कह दिया। सोचकर ही डर लगता है उन छोटे कारोबारियों और उन लोगों के बारे में जिनकी नौकरी चली गई,धंधा चौपट हो गया है। बुरा वक्त कब किसका आ जाए कोई नहीं जानता, शायद इसीलिए तो पुण्य कमाने हेतु गौ माता और श्वान को हम प्रतिदिन भोजन देते हैं।'
नए जमाने में पुण्य कमाने का जो नवोन्मेषी रास्ता तनिष्का के उदार विचारों से निकल कर आया था सुनकर कुसुम ने प्यार से बहू को गले से लगा लिया।
000
ब्रजेश कानूनगो
No comments:
Post a Comment