अभिमत
उनकी कविताओं का नया संग्रह आया तो साधुरामजी बधाई देते हुए बोले- ' बढ़िया है किताब आपकी।'
'धन्यवाद, कुछ सामग्री पर भी कहिए!' उन्होंने खुश होकर कहा।
'सामग्री भी बढ़िया है, कागज की क्वालिटी बेहतर है।' साधुरामजी बोले।
'मेरा मतलब है, कविताओं पर अपना अभिमत व्यक्त कीजिये।'
'मेरे कुछ कहने से क्या होगा? फ्लैप पर जो वरिष्ठ कवि ने व्यक्त कर दिया है उससे बेहतर भला मैं और आगे क्या कुछ कह पाऊंगा!' साधुरामजी ने कहा।
'अरे ,नहीं मित्र! आप मेरी कविताओं पर अपने विचार रखेंगे तो वह मौलिक होंगे।'
'ऐसा क्यों? क्या फ्लैप पर वरिष्ठ कवि का लिखा ब्लर्ब मौलिक नहीं है?'
'जी, वह मैंने स्वयं ही लिख लिया था,उनके नाम से।'
'अरे भाई तो जो पिछले दिनों अखबार में समीक्षा आई है,उसमें भी तो वरिष्ठ आलोचक ने बड़ी प्रशंसा की है, तुम्हारी कविताओं की।'
'अब जाने दीजिए!' उन्होंने निराश होकर कहा 'आपसे नहीं होगा, मैं ही लिख लेता हूँ आपका अभिमत।'
ब्रजेश कानूनगो
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