Monday, October 10, 2022

शब्दशक्ति का निष्कासन

शब्दशक्ति का निष्कासन 

उस दिन हमारी एक व्यंग्य रचना अखबार में छपी थी। तारीफ़ में बहुत से बधाई फोन भी सुबह से आ रहे थे। लेकिन इससे उलट मित्र साधुरामजी स्वयं अखबार पकडे साक्षात पधार गए। आते ही शुरू हो गए-

'आज चड्डी-बनियान गिरोह पर आपने जो लेख लिखा है उसमें चोरों के  प्रति आप का रवैया सहानुभूतिपूर्ण लग रहा है। आप अपराधी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।साधुरामजी ने आपत्ति जताई।
'वह व्यंग्य लेख है मित्रउन फटेहाल चोरों के पक्ष में नहीं है जो रात में छोटी मोटी चोरियां करते हैं। बल्कि पूरी टीम वर्क के साथ दिन के उजाले में देश को लूटने वाले सफेदपोश बड़े अपराधियों पर व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्तियों में प्रहार करने की कोशिश की गई है उस रचना में।हमने सफाई देते हुए कहा।

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किंतु ऐसा स्पष्टतः समझ में आता नहीं लेख पढ़कर।साधुरामजी बोले।
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वह तो समझना पड़ता है मित्र। साहित्य में बहुत से अव्यक्त को पढ़ना आना चाहिए।व्यंग्यकार ने कहा।
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फिर भी, आपको स्पष्ट लिखना चाहिए कि आप सफेदपोश लुटेरों पर प्रहार कर रहे हैं।साधुरामजी अपनी बात पर अड़े रहे।
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साहित्यिक विधा में ऐसा नहीं होता मित्रपत्थर फेंकने और लाठी चलाने से अलग होता है रचनात्मक प्रहार। और अभिधा में लिखी रचना तो फिर एक रिपोर्टिंग में बदल जाती है। व्यंजनालक्षणा शक्तियां व्यंग्य के खास औजार होते हैं।हमने तनिक ज्ञान बांटा।

'
नहींयह तो ठीक नहीं है बिल्कुल। स्वीकार्य नहीं हमें। ये शक्तियां तो  बहुत अराजक और आतंकी लगती हैं अपने आचरण से। इन्हें तुरंत निष्काषित करिये साहित्य से। अन्यथा हमें कोई कानून लाना पड़ेगा।कहते हुए  साधुरामजी नें अभिधा शक्ति में  देशभक्ति से परिपूर्ण एक जोशीले नारे का उद्घोष किया और  निकल लिए। 

ब्रजेश कानूनगो 

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