लोकतंत्र का दुख
बुजुर्ग 'लोकतंत्र' बहुत दुखी नजर आ रहा था।
'क्या बात है भाई,चेहरा क्यों लटकाए बैठे हो? साधुरामजी ने पूछ लिया।
'बहुत पीड़ा होती है भाई, जब देखता हूँ कि मेरे युवा बच्चों का कुछ नासमझ लोग मखौल उड़ाते हैं, भद्दी टिप्पणियां करते हैं!' लोकतंत्र ने दुखी मन से कहा।
'मैं कुछ समझा नहीं हुजूर!' साधुरामजी बोले।
'राहुल,अरविंद,तेजस्वी,अखिलेश..ये सब मेरी उम्मीदें हैं। 'लोकतंत्र कुल' का युवा भविष्य हैं। अब तुम्ही बताओ कोई भी पिता अपने जीते जी ऐसा अपमान कैसे सहन कर सकता है।सभी बेटे खराब तो नहीं हो सकते। सब में मेरा ही तो खून दौड़ता है। सत्ता हो या विपक्ष दोनों संताने मेरी अपनी ही तो हैं। इतना जहर कौन भर रहा इनमें,समझ नहीं पा रहा।'
साधुरामजी दुखी लोकतंत्र का चेहरा तकते रह गए।
ब्रजेश कानूनगो
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