Monday, June 24, 2024

लकड़ी की घंटी

लकड़ी की घंटी 

फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर दिल्ली से आए पत्रकार को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी। मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से वह मुखातिब हो रहा था। 

जब एक डिलीवरी बॉय के पास वह अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया।

'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा।' 

'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'। रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी। 

'चलिए यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?' 

'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में। नौकरी नहीं मिली है अब तक।  प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए। परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं।' 

'क्या परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' रंजन ने पूछा।

युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है।'  युवक ने संकोच से बताया।

'आप निराश न हों, इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'। 

रिकॉर्डिंग का अपना काम समाप्त कर रंजन ने एक टैक्सी बुक की और महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में स्थित बचपन के मित्र अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया।   

ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे। स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी अभिज्ञान से ही घंटी बजवाया करते थे। वह जब मुस्कुराता हुआ लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते थे। रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।

'कैसे हो अभिज्ञान भाई! क्या हाल-चाल हैं?'  गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की।

'सब बहुत बढ़िया है भाई!  बड़े मजे से कट रही है जिंदगी। बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी  कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है। बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है।' 

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था। उसकी बातों में खुशी की वैसी खनक नहीं थी। एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था। स्मृति में जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो। 

बातों बातों में रात के दस बज गए। तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया। 

'शांतनु भी आ गया है कॉलेज से। लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया।

अभिज्ञान ने फिर कोई घंटी बजाई थी। मधुर स्मृतियों को बेसुरा बनाती खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई। 

ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 23, 2024

लकड़ी की घंटी

लकड़ी की घंटी 

दिल्ली का टीवी रिपोर्टर रंजन इस शहर में रिपोर्टिंग के लिए आकर बहुत ज्यादा उत्साहित था.  खुशी इस बात की भी थी कि अपने स्कूल के दिनों का उसका खास दोस्त अभिज्ञान भी इसी शहर में रहता था. मित्र से मिलने का सुख उसकी यात्रा को और अधिक उमंग और कौतूहल से भर रहा था. दिन में अपना कार्य निपटा कर शाम को अभिज्ञान के साथ पुराने दिनों को दोबारा से अनुभव करने की कल्पना उसे रोमांचित कर रही थी. छोटे से कस्बे के सरकारी स्कूल में रंजन और अभिज्ञान ने अपनी प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई की थी. फेसबुक पर पुराने साथी से मुलाकात के बाद संयोग से आज मिलने का प्रत्यक्ष अवसर भी अनायास ही मिल रहा था.

नाइट कल्चर और मेट्रो में बदलते शहरों में युवाओं की स्थिति को लेकर रंजन को एक स्टोरी करनी थी, जिसके तहत फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर रंजन को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी.

खानपान के मामले में इस शहर को बड़ी ख्याति प्राप्त थी. दुनियाभर के लोग यहां के जायके का मजा लेने देश विदेश से खिंचे चले आते थे. सोशल मीडिया के दौर में फूड ब्लॉगर्स ने इस विशेषता को और अधिक व्यापक और चर्चित बना दिया था. स्ट्रीट फूड के बड़े बड़े बाजार दिन रात गहमा गहमी और रौनक से भरे होते थे. रंजन ऐसे ही एक बाजार में अपनी मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से मुखातिब हो रहा था, बतिया रहा था.  कई लड़कों से डिलीवरी सिस्टम , कठिनाइयों और ग्राहकों के व्यवहार आदि जैसे विषयों पर बातचीत की और अपने कैमरे में रिकॉर्ड करता रहा. 

जब एक डिलीवरी बॉय के पास अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया. 

'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा.' 

'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'.रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी. 

'चलिए नाम मत बताइए, यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?' 

'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में. नौकरी नहीं मिली है अब तक. कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए. परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं. व्यस्त भी रहता हूं और नौकरी नहीं मिल पाने की थोड़ी हताशा से भी उभर जाता हूं.' 

'परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' 

रंजन ने पूछा तो युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है, जमीन जायदाद है, पर सब केवल नाम भर की ही रह गई है अब. इसीलिए कैमरे पर आने से मना किया है सर'.  युवक ने बहुत संकोच से  रंजन से कहा.

'नहीं नहीं, आप आश्वस्त रहिए. हम केवल बातचीत ही करेंगे और अपनी रिपोर्ट बनाने में इससे हमें काफी मदद मिलेगी. वैसे कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता. इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'. रंजन ने कहा और अन्य युवकों से चर्चा करने लगा.  रंजन ने बाजार में बहुत से लोगों से देर तक गुफ्तगू की.  

काम समाप्त कर रंजन अपना सामान, कैमेरा आदि होटल में छोड़ एक टैक्सी से महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया.   

ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे. अभिज्ञान और वह एक साथ बैठकर कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ा करते थे. अभिज्ञान बहुत मधुर आवाज में फिल्मी गीत गाया करता था, उसकी आवाज बहुत अच्छी थी. स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी उसी से घंटी बजवाया करते थे. वह जब मुस्कुराता हुआ बड़ी लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते.

रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

'कैसे हो अभिज्ञान भाई! कारोबार और परिवार के क्या हाल-चाल हैं?'  गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की.

'सब बहुत बढ़िया है भाई!  बड़े मजे से कट रही है जिंदगी. बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी  कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है. और बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है.' 

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था. उसकी बातों में खुशी की खनक नहीं थी. एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था. जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो. 

दोनों मित्र काफी देर तक बातचीत करते रहे,बातों बातों में रात के दस बज गए. तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया. 

'शायद शांतनु भी आ गया है कॉलेज से. लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया.

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान ने फिर घंटी बजाई थी. लकड़ी की घंटी से निकली खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई. 


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, June 18, 2024

अनोखा प्रेम

अनोखा प्रेम



दा साहब का पूरे इलाके में बड़ा रौब था. इसका मतलब यह नहीं कि उनके रुतबे और संपत्ति के कारण उनकी पूछ परख थी. वे कोई जागीरदार ,जमींदार भी नही थे, किसान परिवार में जन्म जरूर लिया था लेकिन उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र और अपने गांव में सबका स्नेह सम्मान अपने स्वभाव और मिलनसारिता  से खुद अर्जित किया था.
उनका परिवार बहुत बड़ा था. परिवार में स्वजनों की संख्या तो बहुत कम थी परंतु पशुओं की संख्या उनसे भी अधिक थी. ज्यादातर गाय, बैल, भैंस के अलावा कुछ बकरियां भी उनके परिवार का हिस्सा थीं. जितना वे अपने रक्त संबंधियों से प्यार करते थे उतना ही प्रेम अपनी गायों और पशुओं से करते. अपने पशुओं को भी वे नाम से पुकारते थे.

दो गायों के नाम तो उन्होंने रमकुडी और झमकुडी रख छोड़े थे. जब भी वे चारागाह में चरती इन गायों को नाम देकर पुकारते वे दौड़ती हुई उनके पास चली आती थीं. इन गौ माताओं को दा साहब का विशेष स्नेह प्राप्त था. अपने बाड़े (तबेले) में जब दा साहब रमकुडी, झमकुडी की गरदन प्यार से सहलाते वह जैसे प्रफुल्लित हो जाती थी. दा साहब की उपस्थिति मात्र से तबेले के पशुओं में अनोखी खुशी की लहर दौड़ जाती थी. चारागाह और खेतों से लौटकर जैसे सारे पशु दा साहब का इंतजार ही करते रहते थे. ये एक ऐसा अलग प्रेम संबंध था जब दा साहब रात को भी एक दो बार बाड़े में जाकर पशुओं को देख आते, चारा पानी की व्यवस्था कर देते, स्नेह से दुलार आते.

दीपावली का समय था. गांव के घर आंगन पशु आदि सज संवर रहे थे. लिपाई,पुताई के बाद दीवारें और आंगन मांडनो से भर गए थे. पशुओं के सींगों को रंगीन पेंट से रंगा गया था. गायों और अन्य गौधन की देह पर रंग बिरंगी फूल पत्तियां बनाई गईं थीं. उनके गलों में कोडियों की मालाएं पहनाई जा रही थीं.  पूरा वातावरण उल्लास से भर गया था. लेकिन दा साहब के बाड़े के पशु बहुत उदास नजर आ रहे थे. हालियों और अन्य सेवकों ने रमकुडी झमकुडी सहित सभी पशुओं को सजाया संवारा था लेकिन पशु उदास से लग रहे थे. कारण स्पष्ट था, एक सप्ताह से दा साहब के स्नेहमयी हाथों का स्पर्श उनकी देह से हो नहीं पाया था. कहां थे दा साहब? शायद यह प्रश्न उन पशुओं के मन में अवश्य रहा होगा.

हर दिन रमकुडी तबेले में जाने से पहले दा साहब के घर के आंगन से होकर गुजरती और ठिठक जाती थी. आंगन के आसपास दा साहब के घर का औसारा होता था, वहीं से पत्थर की खुली सीढ़ियां दा साहब की बैठक और उनके शयन कक्ष तक दूसरी मंजिल तक पहुंचती थी. वहीं से रमकुडी दा साहब की उपस्थिति या हलचल को महसूस करने की कोशिश करती थी. यह उसका दुर्भाग्य था कि अस्पताल में भरती दा साहब को वह कैसे महसूस कर पाती.

दीपावली की रात दा साहब को अस्पताल से छुट्टी मिली तो उन्हे घर ले आया गया. डॉक्टर ने अभी एक सप्ताह और आराम की सलाह दी थी.  दा साहब भी अपने पशुओं, गायों विशेषकर रमकुड़ी झमकुडी की खैर खबर लेने को बैचेन थे. 

गोरधन पूजा के दिन सुबह सुबह जब दा साहब की बहू उन्हें चाय देने गई तो दंग रह गई. दा साहब के पलंग के पास उनकी दुलारी रमकुडी आराम से बैठी थी और दा साहब उसकी गर्दन को अपने हाथों से सहला रहे थे. पिछली रात रमकुडी ने तबेले की ओर जाते हुए दा साहब की उपस्थिति को शायद उनकी खांसी की आवाज से महसूस कर लिया था और वह सीढ़ियां चढ़कर उनके पास पहुंच गई थी.

गोरधन पूजा के वक्त दा साहब ने गायों और बैलों की पूजा की, प्यार से उन्हें दुलारा तो गले में पड़ी सैकड़ों घंटियों की गूंज के साथ अनोखे प्रेम के दीप सबकी आंखों में झिलमिलाने लगे।



ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 16, 2024

पुण्य पथ

पुण्य पथ

कुसुम को एक तरह से मन में खुशी भी थी और थोड़ा दुख भी हो रहा था कि बेटे बहू को विदेश गए अभी छह माह भी नहीं हुए थे और वापिस लौटना पड़ा था।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के आने से थोड़ा पहले ही प्रभात का विवाह बहुत धूमधाम से किया था कुसुम ने। तनिष्का जैसी सुंदर और गुणवान बहू को पाकर जैसे ढेर सारी खुशियां परिवार को मिल गई थीं।

बहू के शुभ पांव घर में पड़े तो बेटे को भी नौकरी में तरक्की मिल गई। दुख इस बात का था कि कम्पनी ने नई नियुक्ति सात समंदर पार विदेश में कर दी थी।

शादी को एक माह भी नहीं बीता होगा कि नव विवाहित बेटे बहू को परदेस जाना पड़ा।    तनिष्का के साथ रहने की कुसुम की सारी इच्छाएं मन में ही दब कर रह गईं। जैसे तैसे भारी मन से बेटे बहू को विदा किया था उसने।

महीने भर में ही अचानक दुनिया भर में फैल गई संक्रामक महामारी ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया था। सब लोग घरों में कैद हो गए थे। देश हो या परदेश सभी जगह एक सी स्थिति, एक सा भय का वातावरण। प्रभात और तनिष्का भारत में अकेली रह गई माँ कुसुम की चिंता में परेशान हो गए। एयर लाइंस भी सब बन्द हो गईं थीं।

कंपनी ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधाएं अपने कर्मचारियों को उपलब्ध करा दीं। इस बीच सरकार ने राहत अभियान के तहत विशेष विमान सेवाएं शुरू कीं तो प्रभात और तनिष्का को भी इसका लाभ मिल गया। वे लोग भारत लौट कर घर से ही अब कंपनी का काम कर रहे थे। हालांकि प्रभात ज्यादातर कामकाज रात को ऑनलाइन ही करता। दिन में आराम करता।

तनिष्का ने भी घर का काम संभाल लिया। काम वाली बाइयों को अभी भी काम के लिए बुलाना शुरू नहीं किया गया था। सब काम कुसुम और तनिष्का मिल जुल कर कर लेतीं थीं।

भारतीय संस्कारों वाली कुसुम ने तनिष्का को कह रखा था कि वह एक रोटी कुत्ते और गाय को देने के लिए भी अतिरिक्त बनाया करे। उनका घर नए विकसित बायपास के पास बनी कॉलोनी में होने से ग्रामीण परिवेश और भारतीय संस्कारों से अब भी जुड़ा हुआ था। बहू तनिष्का दो रोटियां ज्यादा बनाकर नियमित रूप से चौकीदार के कुत्ते शेरू को और दूध वाले भैया की गाय को खिला आती।

कुछ दिनों से कुसुम महसूस करने लगी थी कि तनिष्का अब जरूरत से कुछ ज्यादा ही संख्या में रोटियां बनाने लगी है और गाय कुत्ते के लिए ले जाने लगी है। सास तो आखिर सास ही होती है। तनिष्का द्वारा किया जा रहा यह अपव्यय थोड़ा बर्दास्त से अधिक हो गया उसके लिए। पुण्य कमाने की भी एक सीमा होती है।

आखिर एक दिन कुसुम ने तनिष्का को टोक ही दिया- 'ये इतनी सारी रोटियाँ क्यों ले जाती हो? एक दो ही ठीक हैं!'

लेकिन जो उत्तर तनिष्का ने  दिया वह बहुत चौंकाने वाला था। तनिष्का ने बताया  कि वह जो अतिरिक्त भोजन बनाकर ले जाती है उसे वह एक ऐसे युवक को देकर आती है जिसकी नौकरी कोरोना काल में आई मंदी की वजह से चली गई है। परेशानी में वह अर्धविक्षिप्त सा हो गया है और मंदिर के ओटले पर बरगद की छांव में बेसुध सा दिनभर पड़ा रहता है।

उसने आगे कहा- 'मम्मी जी मैं ठीक कर रही हूँ न! हम तो फिर भी बेहतर हैं जो हमें बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने घर से काम करने को कह दिया। सोचकर ही डर लगता है उन छोटे कारोबारियों और उन लोगों के बारे में जिनकी नौकरी चली गई,धंधा चौपट हो गया है। बुरा वक्त कब किसका आ जाए कोई नहीं जानता, शायद इसीलिए तो पुण्य कमाने हेतु गौ माता और श्वान को हम प्रतिदिन भोजन देते हैं।' 

नए जमाने में पुण्य कमाने का जो नवोन्मेषी रास्ता तनिष्का के उदार विचारों से निकल कर आया था सुनकर कुसुम ने प्यार से बहू को गले से लगा लिया।


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ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 9, 2024

नैतिक समर्थन

नैतिक समर्थन

भाई साहब का विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए। इसी सोच के साथ सत्ताधारी दल की बजाए वे मुख्य विपक्षी पार्टी को ही हर बार अपना वोट देते रहे।

इस बार चुनाव के वक्त देश में घटी घटनाओं से वे काफी दुखी और निराश थे। कुछ संसदीय क्षेत्रों में ऐसा दूषित वातावरण बना कि विपक्षी दल और निर्दलीय प्रत्याशियों ने एन मतदान के पहले ही अपने नाम वापिस ले लिए। इसके चलते कहीं सत्ताधारी पार्टी का उम्मीदवार  निर्विरोध निर्वाचित हो गया तो कहीं एकतरफा मुकाबले से चुनाव का सारा आकर्षण और महत्व ही समाप्त हो गया। भाई साहब का क्षेत्र भी इसी राजनीतिक संकट का शिकार हो गया था।

भाई साहब, अब आप किसको वोट देंगे? आपके समर्थन वाली मुख्य राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार ने तो अंतिम समय पर अपना नामांकन ही वापिस ले लिया है। ऊपर से वह प्रमुख विरोधी पार्टी में जा मिला है। लड़ाई में अब  कुछ वे निर्दलीय प्रत्याशी ही रह गए हैं जिन्होंने षड्यंत्र और दबावों के बावजूद अपने नाम वापिस नहीं लिए। मित्र ने पूछा।

बंधु, संसदीय चुनावों में यह घटना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मतदाता ही नहीं इससे हमारा लोकतंत्र भी शर्मसार हुआ है। मतदान के लिए जरूरी समान लेवल फील्ड के अधिकार की अनिवार्यता का भी हनन हुआ है। लोकतंत्र में राजनीति कलंकित हुई है। वे बोले।

फिर भी भाई साहब वोट तो आपको डालना ही पड़ेगा। क्या करेंगे ? नोटा का भी एक विकल्प है मशीन में। विपक्षी दल ने नोटा का बटन दबाने का आग्रह भी किया है अपने अभियान में। मित्र भाई साहब के अगले कदम के प्रति उत्सुक था।

हां, चुनाव निर्विरोध तो शायद नहीं हो सकेगा। मुकाबला तो नोटा से भी हो सकता है। भाई साहब ने कहा।

ये तो है। विपक्ष तो पहले ही कमजोर है, जीतने वाला तो वैसे भी लाखों मतों के अंतर से जीतता लेकिन अब तो और अधिक वोटों से जीतेगा। शायद रिकॉर्ड भी बन जाएगा किंतु मुकाबला तो एकतरफा ही होगा।  नोटा में डालना भी उसे विजयी होने से रोक नहीं सकता। हां यदि विपक्षी पार्टी का प्रतिद्वंदी मैदान में होता तो अवश्य ही उनका जीतना, हारना भी सम्मानजनक होता। मित्र ने कहा।

बंधु, मैं तो अपने तरीके से इस गलत प्रवृत्ति का विरोध करूंगा। भाई साहब ने बताया।

याने आप नोटा को वोट करेंगे? मित्र ने पूछा।

भाई साहब आगे कुछ बोले नहीं। मतदान वाले दिन एक निर्दलीय प्रत्याशी को वोट कर आए जिसने षड्यंत्रकारियों के नामांकन वापिस लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। जिससे चुनाव निर्विरोध नही हो पाया था। मतदाता के अधिकार को छीना नही जा सका था।

चुनाव परिणाम तो पहले से ही वे जानते थे, वर्तमान सांसद का बहुमत से जीत जाना निश्चित था किंतु भाई साहब के भीतर बड़ा संतोष था। मतदान के बाद लोकतांत्रिक प्रतिरोध का एक नैतिक नागरिक बोध उन्हे अधिक शक्ति और संबल प्रदान कर रहा था। 

ब्रजेश कानूनगो