Tuesday, January 7, 2025

ब्रजेश कानूनगो : रचनात्मक पृष्ठभूमि और रचना प्रक्रिया

 ब्रजेश कानूनगो : रचनात्मक पृष्ठभूमि और रचना प्रक्रिया


यह मेरा सौभाग्य रहा कि जो वातावरण किसी संवेदनशील व्यक्ति को सृजन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करता है वह मुझे अपने बचपन में ही मिल सका. घर में पढ़ने लिखने का वातावरण था.काका श्री यतीश कानूनगो  विज्ञान, गणित के शिक्षक थे लेकिन साहित्य,चित्रकला आदि में उनकी गहरी रुचि थी। मैं उनका शिष्य भी था तो उनसे खूब सीखने-समझने को मिला । उस जमाने में स्कूलों में लेखन की प्रतियोगिताएं बहुत हुआ करती थीं। भरपूर प्रोत्साहन मिलता, खूब  भाग लेता। विजेता रहा तो हौसला बढ़ता गया. इसी पारिवारिक प्रोत्साहन से लिखने पढ़ने के संस्कारों के बीज शायद मेरे भीतर तभी से अंकुरित होने लगे थे. 

 

प्रारम्भ में छोटी-छोटी बाल कविताएँ, कहानियां अपने आसपास की घटनाओं को देख-देख कर लिखता और उन्हें नईदुनिया अखबार के ख़ास पन्ने ‘बच्चों की दुनिया’ में भेज देता. वे छपने लगीं तो और और अधिक उत्साह से लिखने लगा. थोड़ा विचार संपन्न हुआ तो पढी हुई सामग्री और समाज में होने वाली घटनाओं, कठिनाइयों पर अपनी प्रतिक्रिया लिख डालता और ‘संपादक के नाम पत्र’ स्तम्भ में भेजने लगा. लगभग प्रति सप्ताह ही कोई न कोई पत्र प्रकाशित हो ही जाता था. उन दिनों अखबारों में सम्पादक के नाम लिखे पाठकों के पत्रों का बहुत महत्व हुआ करता था. विशेषकर नईदुनिया में छपे पत्रों का बड़ा वैचारिक और बौद्धिक महत्व होता था. पत्रों  पर भी प्रतिक्रियात्मक पत्र छापते. कई लम्बी-लम्बी बहसें हुआ करती थीं. मेरा कुछ छप जाता तो मुहल्ले, स्कूल और कस्बें में बहुत प्यार और सम्मान मिलता।


मेरे लिखे प्रतिक्रियात्मक पत्रों में कभी-कभी थोड़ा हास्य और कटाक्ष का भाव रहा करता था. उन दिनों नईदुनिया में विख्यात पत्रकार श्री राजेन्द्र माथुर सम्पादक हुआ करते थे. नईदुनिया के पत्र स्तम्भ में अक्सर मेरे व्यंग्यात्मक लघु पत्र भी प्रकाशित होते रहते थे. मुझे एक दिन यह देखकर बहुत आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई कि मेरे एक लघु व्यंग्य पत्र को उन्होंने ‘अंतिम-पत्र’ उपशीर्षक देते हुए ख्यात कार्टूनिस्ट श्री देवेन्द्र शर्मा के बनाए कार्टून के साथ बॉक्स में प्रकाशित कर नई शुरुआत कर दी. इसके बाद एक बार फिर चकित होने का मौक़ा उन्होंने मुझे दिया. उन्होंने मेरे एक पत्र को लौटाते हुए टिप्पणी लिखी कि इसे आप थोड़ा विस्तार दें. मैंने उनके निर्देश के अनुसार अपने पत्र को विस्तार दिया. और उस रचना को उन्होंने नईदुनिया में पत्र से अलग स्वतन्त्र व्यंग्य लेख के रूप में प्रकाशित किया. यहाँ मैं इतना अवश्य बता देना चाहता हूँ कि श्री राजेन्द्र माथुर जी से मेरी कभी कोई मुलाक़ात नहीं हुई थी. इस बीच मेरी रचनाएँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सन्डे मेल , रविवार, वामा आदि में भी प्रकाशित होने लगी थीं. 

     

नईदुनिया और अन्य अखबारों के स्तंभों में नियमित व्यंग्य लेखन में मेरी थोड़ी-थोड़ी पहचान बन रही थी. नईदुनिया में ‘अधबीच’ जैसे दिलचस्प और लोकप्रिय कॉलम की शूरुआत हो चुकी थी. परसाई जी के ‘सुनो भाई साधू’ और शरद जी के ‘..और शरद जोशी’ के कॉलमों के विराम के बाद राजेन्द्र माथुर जी ने इस स्तम्भ की विवेकपूर्ण शुरुआत करके नए व्यंग्य रचनाकारों को प्रोत्साहित करने का काम किया था. इस कॉलम की शुरुआत के पहले दिन ही इसमे मेरा आलेख ‘एटनबरो का गांधी और सफलता के देसी नुस्खे’ दिनांक 21 अप्रैल 1981 को प्रकाशित हुआ . इसके बाद नवभारत टाइम्स के ‘चौखट’. दैनिक हिन्दुस्तान के ‘कुल्हड़ में हुल्हड़’, जनसत्ता के रविवारीय आदि में नियमित व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित होती गईं. पहला व्यंग्य संग्रह वरिष्ठ कथाकार, व्यंग्यकार श्री सूर्यकांत नागर जी के प्रोत्साहन से दिशा प्रकाशन दिल्ली से ‘पुनः पधारें’ शीर्षक से सन 1995 में आया. यह संग्रह मैंने स्व. शरद जोशी और स्व राजेन्द्र माथुर जी को समर्पित किया है. नईदुनिया में श्री सूर्यकांत नागर जी जब व्यंग्य के साप्ताहिक कॉलम ‘खुला खाता’ का सम्पादन किया करते थे तब उनकी प्रेरणा से लम्बे कथात्मक व्यंग्य लेख लिखने में बहुत संतुष्टि का अहसास होने लगा था. मेरे लेखकीय विकास में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है. 


जिन्हें पढ़-पढ़ कर व्यंग्य विधा में लिखने की मुझे सच्ची प्रेरणा मिली उनमें स्व शरद जोशी और श्री हरिशंकर परसाई सबसे आगे हैं. जिन दिनों व्यंग्य के महापुरुष स्व शरद जोशी जी को पद्मश्री घोषित हुई थी तब विख्यात नवगीतकार प्रो नईम जी की कृपा से मैं भी एक ऐसे कार्यक्रम में था जहां शरद जी का सम्मान किया गया था. शाजापुर में लायंस क्लब के एक कार्यक्रम में चूंकि शरद जी से रचनाएं सुनी जानी थी सो डग्गे-मग्गे की तरह मुझे और उस समय शाजापुर महाविद्यालय में पदस्थ आलोचक एवं व्यंग्यकार  प्रो.बी एल आच्छा जी को भी रचना पाठ का अवसर मिल गया. यह मेरा पहला मौक़ा था जब मैंने किसी मंच से रचना पाठ किया था. देर रात शरद जी ने मुझे अपनी कार से देवास के मेरे घर छोड़ा था. यात्रा में मंच पर प्रभावी रचना पाठ के जो सूत्र उन्होंने मुझे समझाए थे वे मेरी अमूल्य निधि हैं।  

‘इंदौर बैंक’(अब स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया) में सहकर्मी के रूप में कुमार अम्बुज जैसे दोस्त मिल गए तो अपनी बातें कविता में कहने लग गया। वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता श्री आलोक खरे का सानिध्य मिला तो प्रतिबद्धता और समाज सेवा में रचनाकार की भूमिका के सही अर्थ समझ में आये. रचना शिविरों में सर्वश्री भगवत रावत, चंद्रकांत देवताले जी और कमला प्रसाद जी का मार्ग दर्शन रचना शिविरों में मिला तो कविताओं को संवारने लग गया। समकालीन कविताओं का खूब अध्ययन किया. चार कविता संग्रह भी आये. लेकिन व्यंग्य लेखन भी साथ-साथ चलता रहा. पुनः पधारें (1995 ) के बाद क्रमशः सूत्रों के हवाले से (2014),मेथी की भाजी और लोकतंत्र(2017),पाषाणपुष्प का किस्सा (2021) आए. एक उपन्यास के साथ साथ एक यात्रा वृतांत तथा एक संस्मरणों का संग्रह भी पाठकों ने पसंद किया है. यही सब रचनात्मक रूप से सक्रीय रहने की ऊर्जा प्रदान करता रहता  है.

 

पत्नी कुमुद जी का सहयोग और अग्रज,एकता,अभिरुचि,संकल्प जैसे पुत्र,पुत्री,पुत्रवधू,बेटे जैसे दामाद और पौत्र अक्ष बाबू की रचनात्मक समझ और सक्रियता जीवन में संतोष की वजह बन जाता है. खुशी देता है.  

रचना शिविरों में जो सीखा वह कार्यशालाओं में खुद  सिखाने लग गया। इसलिए लिखते हुए सीखा, सिखाते  हुए..सीखता रहा...अब भी सीख रहा हूँ। लेकिन एक बात जो मैं अपने लिखने में हमेशा बनाये रखने की कोशिश करता हूँ उनमें आदर्श जीवन मूल्य, समाजवादी और प्रगतिशील विचारधारा और मनुष्य के प्रति प्रतिबद्धता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए अपने आग्रह। इसी लेखकीय दृष्टि से मैं अपनी दुनिया और समाज को अभिव्यक्त करने की कोशिश में लगा रहता हूँ।


अपनी रचना प्रक्रिया को साफ साफ अभिव्यक्त करना मेरे लिए ही नहीं किसी भी रचनाकार के लिए रचना लिखने से भी ज्यादा कठिन काम होता है।

मेरे भीतर रचनात्मकता के बीज जो पहुंचे वे मेरी रचनात्मक पृष्ठभूमि में विस्तार से व्यक्त करने की कोशिश की है। घर में साहित्यिक वातावरण का बने रहना मेरी रचनात्मक मनःस्थिति के लिए उत्प्रेरक का कार्य अभी भी करता है। मेरी नव सृजित कृति में परिवार और दोस्तों की रुचि भी मेरे अगले लेखन के लिए प्रोत्साहित करती है। प्रशंसा और आलोचना को मैं समानरूप से ग्रहण करता हूं। किसी भी एक व्यक्ति द्वारा भी कोई संदेह व्यक्त किया जाता है तो मैं उस पर विचार करता हूं, संभव हुआ तो संशोधित भी करने की कोशिश अवश्य करता हूं। हरेक रचना अपने अगले प्रारूप में बेहतर होती जाती ही है। अनेक प्रारंभिक रचनाओं के प्रकाशन के उपरांत भी कई बार मैं उनका पुनर्लेखन करता रहा हूं, मैने पाया कि जो बाद में स्वरूप सामने आया वह मुझे चमत्कृत कर गया है।


मेरा प्रयास रहता है कि तात्कालिक या मांग पर लिखी गई रचना यहां तक कि वाट्सएप समूहों में लिखी चंद पंक्तियों को भी मैं बेकार न जानें दूं। मैं उन्हें सहेज कर रखता हूं और उन पर पुनः पुनः काम करते हुए उन्हें संवारता रहता हूं। सार्वकालिक लंबी रचनाओं में रूपांतरित करने के प्रयास करता रहता हूं।


जब नौकरी में था तब कोई विचार, विषय या सूत्र ध्यान में आता मैं अपने बैंक के लेज़रों में रखे जाने वाले फ्लैग पर नोट कर जेब में रख लेता। ऐसे कई फ्लैग मेरी रचनाओं के लिखे जाने में सहायक बनते रहे। शुरुआती स्तंभीय व्यंग्य लेख इसी तरह अखबारों में छप जाते तो उत्साह बढ़ जाता था। इन्हीं बीज लेखों पर मैने पुनः पुनः काम किया और वे मेरे संग्रहों में सार्वकालिक रचनाओं के रूप में पाठकों तक पहुंचे।


मैं कभी भी यह सोचकर बैठता नहीं कि अभी लिखना है। लिखने का कोई खास समय निर्धारित नहीं है। यह जरूर है कि ज्यादातर रचनाओं का पहला प्रारूप गुसलखाने अथवा देर रात सोने के पहले भीतर उथलपुथल मचाने लगता है। तब उसी वक्त बगैर देरी किए लिख डालता हूं। इसके बाद ही अन्य कामों में मेरा मन लगता है। यह अवश्य है रचना को संवारने का काम बाद में चलता ही रहता है।  रहा काम रावण से भी नहीं होता, इस उक्ति में मेरा संपूर्ण विश्वास है। किसी भी रचनात्मक अवसर को जहां तक संभव होता है उसे मैं गंवाने की भूल नहीं करता। मैं जानता हूं कि इससे कहीं न कहीं मेरा ही रचनात्मक विकास ही जुड़ा होता है।


जिस विषय या विचार पर मैं लिखना चाहता हूं ज्यादातर वे अपनी विधा स्वयं चुन लेते हैं। ज्यादातर लेखक कविता से गद्य की ओर आगे बढ़ते हैं , मैने गद्य पहले लिखा, बाद में कविता की ओर आया हूं। हर विधा में पूरी क्षमता और उसके अनुशासन को समझकर लिखने की कोशिश रहती है। पत्र लेखन,बाल साहित्य और व्यंग्य लेखन ने मुझे कविता लेखन में भी मदद की है। मेरा मानना है जब कविता में व्यंग्य के तत्व शामिल होते हैं, वह प्रभावी और सार्थक हो जाती है। ऐसा ही जब कोई गद्य, कविता की तरह होता जाता है वह अधिक बेहतर प्रभाव छोड़ जाता है। सभी विधाएं एक दूसरे की पूरक होती है। सभी विधाओं में अच्छी रचना का सृजन समान रूप से मुश्किल होता है। जब किसी विधा में मैं अपने आप को दोहराने लगता हूं, कदमताल करने लगता हूं, तब अन्य विधा में सक्रिय हो जाता हूं, कुछ नया करने लगता हूं। कविता के बाद यह गैप मुझे कविता में बेहतर करता है, ऐसा ही गद्य रचनाओं में भी मेरे साथ होता है। इसी जरूरी ब्रेक में मैने संस्मरण लिखे, किताबों पर चर्चाएं लिखीं, यूट्यूब वीडियो बनाए। अपने आपको किसी तरह नए सृजन के लिए सक्रिय रखने की कोशिश की।


पिछले दस बारह वर्षों से कागज पर कलम से नहीं लिखा है। मोबाइल और टेबलेट पर लिखता हूं। लैपटॉप पर पांडुलिपि बनाता हूं। हर रचना अपने विभिन्न ब्लॉगों में पोस्ट कर सहेज लेता हूं।  यही कारण है कि मेरे लिए कोई भी रचना को संशोधित करना आसान हो जाता है।


मेरी रचना प्रक्रिया तो लगभग यही रहती आई है।  विषय चयन, विचारधारा, सरोकारों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर कभी अलग से बात की जा सकती है। इनका भी सार्थक समकालीन लेखन में बड़ा महत्व होता है।


*ब्रजेश कानूनगो*

Sunday, September 8, 2024

लघुकथा पर वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजेश कानूनगो से नेतराम भारती का साक्षात्कार

लघुकथा पर वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजेश कानूनगो से नेतराम भारती का साक्षात्कार


प्रश्न :- सर! लघुकथा आपकी नजर में क्या है लघुकथा को लेकर बहुत सारी बातें जितने स्कूल उतने पाठ्यक्रम वाली स्थिति है यदि नव लघुकथाकार के लिए सरल शब्दों में आपसे पूछा जाए तो आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे ?

ब्रजेश कानूनगो : लघुकथा जीवन की संवेदनाओं, प्रसंगों, प्रतिक्रियाओं, संभावनाओं, कामनाओं, आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक साहित्यिक माध्यम है,जो रचनाकार द्वारा संक्षिप्त कथात्मक प्रारूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें लेखक अपनी अभिव्यक्ति को कई शैलियों में पाठको तक पहुंचाता है। नए प्रयोग भी करता है। लघुकथा का एक तरह से यह विकास क्रम भी कहा जा सकता है।

प्रश्न :- सर! आपकी दृष्टि में साहित्य क्या है ?

ब्रजेश कानूनगो :  साहित्य को प्रारंभ से ही समाज का दर्पण कहा जाता रहा है। यह एक तरफा नही है, समाज का प्रतिबिंब यदि साहित्य में दिख रहा हो तो दूसरी तरफ साहित्य भी समाज पर अच्छे बुरे प्रभाव के लिए उत्तरदायी हो सकता है। इसीलिए अच्छे साहित्य की पहचान बहुत जरूरी है। हर लिखा साहित्य नहीं होता। शब्दों को क्रमबद्ध रूप से पिरो देने भर से खूबसूरत साहित्यिक रचना नहीं बन जाती। साहित्य एक स्वीकार्य अनुशासन में लिखी अभिव्यक्ति है, हर विधा का एक सौंदर्य शास्त्र क्रमशः विकसित होता चला जाता है। अंततः साहित्य मनुष्य, समाज और संसार को सुंदर बनाने का एक रचनात्मक प्रयास है। साहित्य का काम ही है बोध कराना। विधा को कुछ भी नाम दें दें। सच का बोध या सृजन का प्रयोजन हासिल न हो तो उस साहित्य का क्या मोल?

प्रश्न :- सर! आपके लिए लेखन का क्या महत्व है?

ब्रजेश कानूनगो : लेखन सुंदर समाज, मनुष्य और दुनिया के विकास की आकांक्षा का परिणाम है। यदि रचना में यह सब लेखक कर पाता है तो वह अपना महत्व प्रमाणित करता है। रचना महत्वपूर्ण कही जा सकती है।

प्रश्न :- समकालीन लघुकथाकारों के सामने आप क्या चुनौतियाँ देखते हैं?

ब्रजेश कानूनगो :  लघुकथाकार ही नहीं हर विधा के लेखक के सामने अनेक चुनौतियां रहती हैं। लघुकथाओं की बाढ़ में कितने सचमुच के जवाहरात बहकर साहित्य के मैदान में चमकते हैं यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।  अधिकांश में साहित्य विवेक बहुत कम नजर आता है। बहुत सी आज लिखी,कल समाप्त की श्रेणी की होती हैं। बहुत कम लघुकथाएं ऐसी हैं जिनमे विचारधारा, सरोकार और प्रतिबद्धता की झलक दिखाई देती हों। मेरा मानना है जिन लघुकथाओं में समय के सवालों और चुनौतियों पर कलम चलाई गई होती हैं वही साहित्य की स्थायी धरोहर बनती हैं, वरना अन्य का हाल भी अखबार या पत्रिका के अस्तित्व की तरह ही बहुत लघु ही होता है, जिन्हें कोई याद नहीं रख पाता। कई में अनेक तरह के दुहराव भी नजर आते हैं लेकिन इनमें से ही श्रेष्ठ लघुकथाएं निकलकर आने की संभावनाएं भी पैदा होती है।

जिस दौर में टेक्नोलॉजी का व्यापक विकास हो गया हो, स्त्रियों की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में बदलाव आया हो। तब लघुकथाओं में भी इनका नजर आना स्वाभाविक रूप से अपेक्षित है।   भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद समाज में कई बदलाव हुए है। पाखण्ड,धूर्तताओं ,चालाकियां और सांस्कृतिक प्रदूषण के आगमन के साथ समाज का  नैतिक अवमूल्यन हुआ है। बाजारवाद ने हरेक वस्तु को बिकाऊ, यहां तक कि देह, आत्मा और मूल्यों तक की बोलियां लग जाने को अभिशप्त किया है। परिवारों में रिश्तों की मधुरता और सम्मान के साथ छोटे-बड़ों के बीच का कोमल और संवेदन सूत्र टूटने लगा है। घर के बुजुर्ग हाशिये पर हैं।

दुनिया को जीत लेने की किसी शहंशाह की ख्वाहिश की तरह राजनीति के नायक-महानायक किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई देते हैं। सत्ता सुख की खातिर अपने पितृ दलों को डूबते जहाज की तरह कभी भी त्याग देने में नेताओं, प्रतिनिधियों को कोई परहेज नहीं होता। असहमति किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं। आश्वासन और विश्वास जुमलों की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। हिंदीभाषा और देवनागरी लिपि को नष्ट भ्रष्ट करने में उन्ही संस्थानों और अखबारों की मुख्य भूमिका दिखाई देती है जिन पर उनके संरक्षण की उम्मीद लगी रही हो। नए समय के बहुत से नए सवाल हैं,जिन पर गंभीरता से लघुकथाएं ही नहीं अन्य विधाओं में भी रचनाएँ लिखी जाना चाहिए।  इस मामले में अभी संतोष कर लेने की स्थिति नहीं कही जा सकती..लेकिन भरोसा जरूर किया जा सकता है कि ऐसा अवश्य होगा। अच्छी और सार्थक लघुकथा व लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही अक्सर सामने आकर खड़ी हो जाती है।

प्रश्न :- लघुकथा विधा में आपकी विशेष रुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई?

ब्रजेश कानूनगो :  लघुकथा में रुचि तो इसे लघुकथा विधा माने जाने के संघर्ष के काफी पूर्व ही हो चुकी होगी। पंचतंत्र और अन्य अनेक लोककथाएं पढ़ते हुए भी परोक्ष रूप से रुचि हो ही जाती है। अपने बचपन में ऐसी अनेक प्रेरक और संदेश परक कथाओं से गुजरते गुजरते ही आधुनिक लघुकथा में अकस्मात हम प्रवेश कर लेते हैं। अपने समय की दीन दुनिया की सच्चाइयों, विडंबनाओं ,जीवन दर्शन की उतनी बात शायद नहीं करती थीं बोधकथाएँ, जितनी समकालीन लघुकथाएं करती हैं।

बोधकथाओं में कोई सीख और उपदेश का भाव जरूर होता रहा है। यदा-कदा बोध कथाएं कठिनाइयों से उबरने का कोई रास्ता सुझाने का प्रयास भी करती हैं।

वर्तमान में अब समाज और साहित्य का जब पर्याप्त विकास हुआ है, सच्ची और अच्छी लघुकथाएं  सार्थक टिप्पणी के साथ अपने समय की सच्चाइयों का बोध कराने का प्रभावी प्रयास करती हैं। यही कारण है कि लघुकथा में इस तरह रुचि बढ़ती गई।

प्रश्न :- लघुकथा,कहानी और उपन्यास के बीच क्या अंतर है,आपके दृष्टिकोण से?

ब्रजेश कानूनगो : ये तीनों विधाएं किसी न किसी कहानी की अभिव्यक्ति के अलग प्रारूप हैं। इनमे आप नाटक, एकांकी, नौटंकी, पंडवानी, माच, सिनेमा जैसे माध्यमों को भी जोड़ सकते हैं। ये सभी कहानियां ही कह रहे हैं। विषय, प्रसंग, संवेदनाएं, घटनाक्रम आदि सभी अपना विस्तार चुन लेते हैं। जिस विधा में जो बात अपनी श्रेष्ठता में संभव हो जाती है वही लेखक से चुनाव करवा ले जाती है। जैसा मैंने पूर्व में कहा सभी विधाओं का अपना सौंदर्य शास्त्र विकसित हो जाता है। कहानी, उपन्यास और लघुकथा का भी। देशकाल और समय के साथ इसमें बदलाव होते रहते हैं। उपन्यास, कहानी और लघुकथा में अंतर की अकादमिक बहस को प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करना बेमानी होगा। मैं किसी विधा के विकास के आंदोलन के झंडाबरदार की बजाए एक लेखक के तौर पर अपनी बात कहना चाहता हूं।

प्रश्न :- एक लघुकथा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व आप किसे मानते हैं ?

ब्रजेश कानूनगो :  जैसा मैंने पूर्व में कहा है, लघुकथा में समकालीन यथार्थ को विषय बनाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। इससे रचना अपने समय की साक्षी बन जाती है।  भविष्य में जब इतिहास बदल दिया जाता है तब भविष्य के पाठक अपने भूतकाल को सही परिप्रेक्ष्य में साहित्य में तलाश पाते हैं।

प्रश्न :- आजकल देखने में आ रहा है कि लघुकथा की शब्द सीमा को लेकर पूर्व की भांति सीमांकन नहीं है बल्कि एक लचीलापन देखने में आ रहा है । अब आकार की अपेक्षा कथ्य की संप्रेषणीयता पर अधिक बल है । मैं छोटी बनाम लंबी लघुकथाओं की बात कर रहा हूंँ । आप इसे किस रूप में देखते हैं ?

ब्रजेश कानूनगो :  मैं कहानी को कहानी की तरह ही लिखता रहता हूं। मित्र कुछ में लघुकथा के तत्व पा लेते हैं तो खुशी होती है। मेरे कथासंग्रह ' रिंगटोन ' को मैने छोटी बड़ी कहानियां ही कहा है। विषय और संप्रेषण मेरे लिए महत्वपूर्ण है। विस्तार और विधा का चयन रचना स्वयं करती जाती है। जब बात बनती नहीं तो अन्य माध्यम चुन लेता हूं। हरेक लेखक को इस मामले में पूर्ण स्वतंत्रता देना शायद उचित ही होगा।

प्रश्न :- क्या लघुकथा साहित्य में वह बात है कि वह एक जन आंदोलन बन जाए अथवा क्या वह समाज को बदल सकने में सक्षम है?

ब्रजेश कानूनगो : एक लेखक का सही काम अपने समय की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करना होता है। साहित्यकार का काम इशारा भर करना है। दूसरी ओर विचारक, चिंतक और विशेषज्ञ उचित अध्ययन के बाद समाधान का रास्ता खोजने का उपाय करते हैं। इसके आगे की जिम्मेदारी प्रायः नीति निर्धारकों की योजना बनाने और प्रशासन को लागू करने की होती है। लेखक हमेशा गलत के विरोध में होता है। लेखक के तौर पर वह लिखता है, उसका लिखा यदि जन गीत बनकर कार्यकर्ताओं की सभा में गाया जाता है तो उसका परोक्ष योगदान तो बदलाव या आंदोलन की दिशा में हो ही सकता है। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे स्वर्णिम अतीत में खोजे जा सकते हैं जब साहित्यकारों ने क्रांति की मशालें भी थामी और उनकी कलम ने शब्दों की जगह जागरण की ज्वाला प्रज्जवलित हुई है।

हरेक व्यक्ति की सीमा है। साहित्यकार की भी। वह अपना काम निष्ठा और ईमानदारी से करता है तो वह भी काफी होगा। जो इससे अधिक कर सकता है तो वह कुछ अधिक दे रहा साहित्य और समाज को। लेकिन हरेक की अपनी क्षमता और सीमाएं भी होती हैं। हर व्यक्ति प्रेमचंद या परसाई नहीं होता। और न ही हर लेखक जवाहरलाल नेहरू जिसके अपनी बेटी को लिखे पत्र भी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान बना लेते हैं। लघुकथाकर के संदर्भ में भी यह बात कही जा सकती है।

प्रश्न :- क्या आपको लगता है कि समकालीन लघुकथाएं समाज के वास्तविक मुद्दों को प्रतिबिंबित करती हैं?

ब्रजेश कानूनगो :  इस प्रश्न का उत्तर कुछ हद तक पूर्व में विस्तार से दे चुका हूं। बहुत सी लघुकथाएं वास्तविक मुद्दों का चित्रण करती हैं किंतु इससे अभी संतोष नहीं किया जा सकता।

प्रश्न :- लघुकथा आज एक सर्वप्रिय विधा है बावजूद इसके, पाठकों तक लघुकथा की अधिकाधिक पहुंँच और उनमें इसके प्रति और जुड़ाव और जिज्ञासा को बढ़ाने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

ब्रजेश कानूनगो :  सबसे बड़ी चिंता तो पाठकों का ही छपे साहित्य से दूर होते जाना है। पाठको को पुस्तकों से जोड़ना होगा। पत्र पत्रिकाओं में फिलर की तरह साहित्य कॉलमों में लघुकथाओं के प्रकाशन की जगह श्रेष्ठ और सार्थक रचनाओं का चयन करना होगा। अच्छी लघुकथाओं के मंचन और फिल्मांकन पर भी जोर देना होगा। पुरस्कारों की अतिवृष्टि से बचा जाना चाहिए। पुरस्कारों की संख्या कम से कम हो, जो श्रेष्ठता के नवोन्मेष प्रयासों और गुणवत्ता पर ही प्रदान किए जाएं। पुरस्कार प्राप्ति की वास्तविक लालसा लेखकों में पैदा हो सके, ऐसे प्रयास होने चाहिए।

प्रश्न :-  सर ! लघुकथा के ऐसे कौन- से क्षेत्र हैं जिन्हें देखकर आपको लगता है कि अभी भी इनपर और काम करने की आवश्यकता है ?

ब्रजेश कानूनगो :  इस प्रश्न पर मेरे लिए अलग से कुछ कह पाना कठिन होगा। लघुकथा के सौंदर्य शास्त्र के विकास पर काम कर रहे वरिष्ठ विद्वजन प्रकाश डाल पाएंगे।

प्रश्न :- एक और प्रश्न । यह शायद सभी लघुकथाकार मित्रों के जहन में घुमड़ता होगा कि आमतौर पर पत्र-पत्रिकाओं और लघुकथा आधारित प्रतियोगिताओं में एक शर्त होती है कि लघुकथा अप्रकाशित , मौलिक व अप्रसारित ही होनी चाहिए । इस आलोक में प्रश्न यह उठता है कि क्या एक बार रचना प्रकाशित हो जाने के बाद,अपनी उपयोगिता बड़े पाठक वर्ग , बड़े मंचों या अन्य पत्र-पत्रिकाओं या आलोचकों- समीक्षकों की प्रशंसा- आलोचना को प्राप्त करने का हक खो देती है ? क्या उस लघुकथा का पुनः प्रयोग नहीं किया जा सकता है ? इस पर आप क्या कहेंगे ?

ब्रजेश कानूनगो : अब न तो पहले जैसा व्यापक पाठक वर्ग है न पहले की तरह याद रह जाने वाली बहुत सी रचनाएं और महत्वपूर्ण पत्रिकाएं रह गईं हैं। मानदेय देने वाले प्रकाशन संस्थान भी नहीं रहे। सबके अपने पाठक, अपनी पत्रिका, अपने सदस्य हैं। अलग अलग पाठक वर्ग में यदि श्रेष्ठ रचनाएं पहुंचती हैं तो कोई बुराई भी नहीं। श्रेष्ठ तो बार बार पढ़ा जाए तो अपना काम करेगा ही। समीक्षा और आलोचना की बजाए अब तो किसी प्रतिभावान नए लेखक को लिखते रहने देने को प्रोत्साहित करना ज्यादा जरूरी है। नए लेखक को बचाने की हम सबकी जिम्मेदारी है।  पढ़ते पढ़ते संवेदनशील लेखक खुद ही अपना आलोचक बनकर श्रेष्ठता की ओर बढ़ता जाता है।

प्रश्न :- सर! वर्तमान लघुकथा में आप क्या बदलाव महसूस करते हैं ?

ब्रजेश कानूनगो :  पाठक,लेखक और रचना अपना रास्ता स्वयं चुनते रहते हैं। यह स्वाभाविक रूप से होता है, हम कुछ सुझा नहीं सकते।

प्रश्न :- आपको अपनी लघुकथाओं के लिए प्रेरणा कहाँ से मिलती है?

ब्रजेश कानूनगो :  जीवन से।

प्रश्न :- सर एक प्रश्न और सिद्ध लघुकथाकारों को पढ़ना नए लघुकथाकारों के लिए कितना जरूरी है जरूरी है भी या नहीं क्योंकि कुछ विद्वान कहते हैं कि यदि आप पुराने लेखकों को पढ़ते हैं तो आप उनके लेखन शैली से प्रभावित हो सकते हैं और आपके लेखन में उनकी शैली के प्रतिबिंब उभर सकता है जो आपकी मौलिकता को प्रभावित कर सकती है इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?

ब्रजेश कानूनगो :  केवल वरिष्ठ लघुकथाकारों को ही नही, हर विधा के वरिष्ठों को पढ़ना चाहिए। साहित्य ही नहीं इतिहास, भूगोल, विज्ञान,राजनीति,  समाज विज्ञान, दर्शन और आधुनिक विषयों को भी पढ़ना चाहिए। पत्रकारिता और अन्य भाषा के अनुवादों को भी। मौलिक तो कुछ नहीं होता, हर चीज एक परंपरा का हिस्सा होती है। आज की कविता में जो कुछ है उसमें कालीदास, सूरदास, कबीर से लेकर निराला, मुक्तिबोध की परंपरा शामिल है। मूल्य वही हैं, नीति, अनीति वही है, अच्छा बुरा वही है, बस शैली और शब्द बदलते हैं, सुख, दुख और संवेदनाएं भी वही रहती हैं।

प्रश्न :- आपके अनुसार, एक अच्छी लघुकथा की विशेषताएं क्या होती हैं?

ब्रजेश कानूनगो :  वही जो वरिष्ठ लघुकथालोचक कहते हैं, संक्षिप्तता, सटीकता, संप्रेषणीयता और अंततः सार्थक कथ्य।

प्रश्न :- लघुकथा लिखने की प्रक्रिया के दौरान आप किन चुनौतियों का सामना करते हैं?

ब्रजेश कानूनगो : लिखने की मनःस्थिति बन पाने की चुनौती सबसे बड़ी होती है।

प्रश्न :- आपके पसंदीदा लघुकथाकार कौन-कौन हैं और क्यों? 

ब्रजेश कानूनगो :  कभी इस तरह विचार नहीं किया। विष्णुनागर जी और चैतन्य त्रिवेदी जी की दो लघुकथाओं पर जरूर सुकेश साहनी जी ने लिखवा लिया था। समकालीन विसंगतियों पर उनकी व्यंग्यात्मक राजनीतिक टिप्पणियां इन लघुकथाएं में की गईं हैं। वैसे आज के सभी चर्चित लेखकों की कुछ लघुकथाएं बहुत अच्छी लगती रही हैं।

प्रश्न :- क्या आपको लगता है कि समकालीन लघुकथाएं आने वाले समय में लघुकथा साहित्य का भविष्य निर्धारित करेंगी अथवा आपके अनुसार लघुकथा का क्या भविष्य है ?

ब्रजेश कानूनगो :  भविष्य तो उजला है। यही कामना भी है। केवल लघुकथा को इसका श्रेय देना ठीक नहीं। साहित्य के भविष्य में सारी विधाओं को शामिल किया जाना चाहिए।

प्रश्न :- अगर आपसे पूछा जाए कि उभरते हुए अथवा लघुकथा में उतरने की सोचने वाले लेखक को कुछ टिप्स या सुझाव दीजिए, तो एक नव-लघुकथाकार को आप क्या या क्या-क्या सुझाव देना चाहेंगे ?

ब्रजेश कानूनगो :  हर लेखक लिखते समय अपने सर्वश्रेष्ठ को ही देने का प्रयास करता है किंतु अपनी कमियों और अपनी क्षमताओं से प्रायः परिचित नहीं होता। उसकी प्रतिभा का विकास भी धीरे धीरे ही होता है। श्रेष्ठता के भ्रम से निकलकर उसे अपने लिखे से ही अपना मुकाबला करना चाहिए। पहले से और बेहतर होते जाना ही एक रास्ता है। बाकी चीजे पूरक की तरह हमारी मदद करती हैं। खूब पढ़ें, थोड़ा लिखें, खुद समीक्षक बनें, पाठक की तरह पढ़ें। वरिष्ठों और क्लासिक रचनाओं को पढ़ते रहने को आदत बना लें। बस इतना ही कहना चाहता हूं।

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Monday, June 24, 2024

लकड़ी की घंटी

लकड़ी की घंटी 

फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर दिल्ली से आए पत्रकार को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी। मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से वह मुखातिब हो रहा था। 

जब एक डिलीवरी बॉय के पास वह अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया।

'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा।' 

'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'। रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी। 

'चलिए यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?' 

'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में। नौकरी नहीं मिली है अब तक।  प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए। परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं।' 

'क्या परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' रंजन ने पूछा।

युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है।'  युवक ने संकोच से बताया।

'आप निराश न हों, इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'। 

रिकॉर्डिंग का अपना काम समाप्त कर रंजन ने एक टैक्सी बुक की और महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में स्थित बचपन के मित्र अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया।   

ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे। स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी अभिज्ञान से ही घंटी बजवाया करते थे। वह जब मुस्कुराता हुआ लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते थे। रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था।

'कैसे हो अभिज्ञान भाई! क्या हाल-चाल हैं?'  गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की।

'सब बहुत बढ़िया है भाई!  बड़े मजे से कट रही है जिंदगी। बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी  कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है। बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है।' 

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था। उसकी बातों में खुशी की वैसी खनक नहीं थी। एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था। स्मृति में जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो। 

बातों बातों में रात के दस बज गए। तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया। 

'शांतनु भी आ गया है कॉलेज से। लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया।

अभिज्ञान ने फिर कोई घंटी बजाई थी। मधुर स्मृतियों को बेसुरा बनाती खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई। 

ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 23, 2024

लकड़ी की घंटी

लकड़ी की घंटी 

दिल्ली का टीवी रिपोर्टर रंजन इस शहर में रिपोर्टिंग के लिए आकर बहुत ज्यादा उत्साहित था.  खुशी इस बात की भी थी कि अपने स्कूल के दिनों का उसका खास दोस्त अभिज्ञान भी इसी शहर में रहता था. मित्र से मिलने का सुख उसकी यात्रा को और अधिक उमंग और कौतूहल से भर रहा था. दिन में अपना कार्य निपटा कर शाम को अभिज्ञान के साथ पुराने दिनों को दोबारा से अनुभव करने की कल्पना उसे रोमांचित कर रही थी. छोटे से कस्बे के सरकारी स्कूल में रंजन और अभिज्ञान ने अपनी प्राथमिक कक्षाओं की पढ़ाई की थी. फेसबुक पर पुराने साथी से मुलाकात के बाद संयोग से आज मिलने का प्रत्यक्ष अवसर भी अनायास ही मिल रहा था.

नाइट कल्चर और मेट्रो में बदलते शहरों में युवाओं की स्थिति को लेकर रंजन को एक स्टोरी करनी थी, जिसके तहत फूड डिलीवरी और डिलीवरी बॉयज को लेकर रंजन को एक खास वीडियो रिपोर्ट अपने चैनल के लिए तैयार करनी थी.

खानपान के मामले में इस शहर को बड़ी ख्याति प्राप्त थी. दुनियाभर के लोग यहां के जायके का मजा लेने देश विदेश से खिंचे चले आते थे. सोशल मीडिया के दौर में फूड ब्लॉगर्स ने इस विशेषता को और अधिक व्यापक और चर्चित बना दिया था. स्ट्रीट फूड के बड़े बड़े बाजार दिन रात गहमा गहमी और रौनक से भरे होते थे. रंजन ऐसे ही एक बाजार में अपनी मोटर साइकिलों पर बैठे फूड डिलीवरी कंपनी के आदेश का इंतजार करते लड़कों के समूह से मुखातिब हो रहा था, बतिया रहा था.  कई लड़कों से डिलीवरी सिस्टम , कठिनाइयों और ग्राहकों के व्यवहार आदि जैसे विषयों पर बातचीत की और अपने कैमरे में रिकॉर्ड करता रहा. 

जब एक डिलीवरी बॉय के पास अपना कैमरा लेकर पहुंचा तो वह युवक थोड़ा सकपका सा गया. 

'क्या नाम है तुम्हारा?' रंजन ने पूछा तो वह थोड़ा पीछे हट गया और बोला, ' सर प्लीज! शूट मत कीजिए, मैं कैमरे पर बात नहीं करूंगा.' 

'छोड़िए, हम ऐसे ही बात करते हैं'.रंजन ने कैमेरा हटाते हुए बातचीत जारी रखी. 

'चलिए नाम मत बताइए, यह तो बताइए क्या पढ़ाई की है आपने?' 

'मैंने एमएससी किया है सर बॉटनी में. नौकरी नहीं मिली है अब तक. कुछ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी की थी लेकिन पर्चे लीक हो गए. परीक्षाएं रद्द हो गई, कुछ तो करना ही था इसलिए डिलीवरी बॉय का काम कर लेता हूं. व्यस्त भी रहता हूं और नौकरी नहीं मिल पाने की थोड़ी हताशा से भी उभर जाता हूं.' 

'परिवार वाले जानते हैं कि आप विज्ञान की बड़ी डिग्री लेने के बावजूद घर घर फूड पैकेट पहुंचाते हैं?' 

रंजन ने पूछा तो युवक बोला, 'घर वालों को बताया नहीं है सर, उनकी समाज में थोड़ी अलग प्रतिष्ठा है, जमीन जायदाद है, पर सब केवल नाम भर की ही रह गई है अब. इसीलिए कैमरे पर आने से मना किया है सर'.  युवक ने बहुत संकोच से  रंजन से कहा.

'नहीं नहीं, आप आश्वस्त रहिए. हम केवल बातचीत ही करेंगे और अपनी रिपोर्ट बनाने में इससे हमें काफी मदद मिलेगी. वैसे कोई काम छोटा बड़ा नहीं होता. इन स्थितियों के लिए आप कदापि दोषी नहीं हैं'. रंजन ने कहा और अन्य युवकों से चर्चा करने लगा.  रंजन ने बाजार में बहुत से लोगों से देर तक गुफ्तगू की.  

काम समाप्त कर रंजन अपना सामान, कैमेरा आदि होटल में छोड़ एक टैक्सी से महानगर सीमा में नए-नए शामिल हुए ग्रामीण इलाके में अभिज्ञान के घर की ओर रवाना हो गया.   

ख्यालों में डूबे रंजन को स्कूल के दिन याद आ रहे थे. अभिज्ञान और वह एक साथ बैठकर कस्बे के सरकारी स्कूल में पढ़ा करते थे. अभिज्ञान बहुत मधुर आवाज में फिल्मी गीत गाया करता था, उसकी आवाज बहुत अच्छी थी. स्कूल की छुट्टी होने पर गुरुजी उसी से घंटी बजवाया करते थे. वह जब मुस्कुराता हुआ बड़ी लय में धातु की घंटी पर लकड़ी का हथौड़ा पीटता तो सारे बच्चे अपना बस्ता उठा चहकते हुए अपने घरों की ओर दौड़ पड़ते.

रंजन अभिज्ञान के घर पहुंचा तो वह उसी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था.

'कैसे हो अभिज्ञान भाई! कारोबार और परिवार के क्या हाल-चाल हैं?'  गले मिलते हुए रंजन ने बातचीत की शुरुआत की.

'सब बहुत बढ़िया है भाई!  बड़े मजे से कट रही है जिंदगी. बच्चे भी अच्छा पढ़ लिख गए हैं, बेटी  कनाडा में अपने पति के साथ जॉब कर रही है. और बेटा यहीं एक कॉलेज में प्रोफेसर हो गया है.' 

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान जैसे यह सब बहुत उत्साह से नहीं बता रहा था. उसकी बातों में खुशी की खनक नहीं थी. एक खोखलापन साफ महसूस हो रहा था. जैसे बचपन के स्कूल की घंटी धातु की नहीं बल्कि वहां लकड़ी का कोई फट्टा लटका दिया गया हो. 

दोनों मित्र काफी देर तक बातचीत करते रहे,बातों बातों में रात के दस बज गए. तभी एक बाइक घर के सामने रुकी और एक जाना पहचाना युवक लगभग दौड़ता हुआ ऊपर की मंजिल की ओर सीढ़ियां चढ़ गया. 

'शायद शांतनु भी आ गया है कॉलेज से. लगता है आज उसकी क्लासेस देर तक चली होंगी!' अभिज्ञान बुदबुदाया.

रंजन ने महसूस किया अभिज्ञान ने फिर घंटी बजाई थी. लकड़ी की घंटी से निकली खोखली आवाज रंजन को उदास कर गई. 


ब्रजेश कानूनगो

Tuesday, June 18, 2024

अनोखा प्रेम

अनोखा प्रेम



दा साहब का पूरे इलाके में बड़ा रौब था. इसका मतलब यह नहीं कि उनके रुतबे और संपत्ति के कारण उनकी पूछ परख थी. वे कोई जागीरदार ,जमींदार भी नही थे, किसान परिवार में जन्म जरूर लिया था लेकिन उन्होंने ग्रामीण क्षेत्र और अपने गांव में सबका स्नेह सम्मान अपने स्वभाव और मिलनसारिता  से खुद अर्जित किया था.
उनका परिवार बहुत बड़ा था. परिवार में स्वजनों की संख्या तो बहुत कम थी परंतु पशुओं की संख्या उनसे भी अधिक थी. ज्यादातर गाय, बैल, भैंस के अलावा कुछ बकरियां भी उनके परिवार का हिस्सा थीं. जितना वे अपने रक्त संबंधियों से प्यार करते थे उतना ही प्रेम अपनी गायों और पशुओं से करते. अपने पशुओं को भी वे नाम से पुकारते थे.

दो गायों के नाम तो उन्होंने रमकुडी और झमकुडी रख छोड़े थे. जब भी वे चारागाह में चरती इन गायों को नाम देकर पुकारते वे दौड़ती हुई उनके पास चली आती थीं. इन गौ माताओं को दा साहब का विशेष स्नेह प्राप्त था. अपने बाड़े (तबेले) में जब दा साहब रमकुडी, झमकुडी की गरदन प्यार से सहलाते वह जैसे प्रफुल्लित हो जाती थी. दा साहब की उपस्थिति मात्र से तबेले के पशुओं में अनोखी खुशी की लहर दौड़ जाती थी. चारागाह और खेतों से लौटकर जैसे सारे पशु दा साहब का इंतजार ही करते रहते थे. ये एक ऐसा अलग प्रेम संबंध था जब दा साहब रात को भी एक दो बार बाड़े में जाकर पशुओं को देख आते, चारा पानी की व्यवस्था कर देते, स्नेह से दुलार आते.

दीपावली का समय था. गांव के घर आंगन पशु आदि सज संवर रहे थे. लिपाई,पुताई के बाद दीवारें और आंगन मांडनो से भर गए थे. पशुओं के सींगों को रंगीन पेंट से रंगा गया था. गायों और अन्य गौधन की देह पर रंग बिरंगी फूल पत्तियां बनाई गईं थीं. उनके गलों में कोडियों की मालाएं पहनाई जा रही थीं.  पूरा वातावरण उल्लास से भर गया था. लेकिन दा साहब के बाड़े के पशु बहुत उदास नजर आ रहे थे. हालियों और अन्य सेवकों ने रमकुडी झमकुडी सहित सभी पशुओं को सजाया संवारा था लेकिन पशु उदास से लग रहे थे. कारण स्पष्ट था, एक सप्ताह से दा साहब के स्नेहमयी हाथों का स्पर्श उनकी देह से हो नहीं पाया था. कहां थे दा साहब? शायद यह प्रश्न उन पशुओं के मन में अवश्य रहा होगा.

हर दिन रमकुडी तबेले में जाने से पहले दा साहब के घर के आंगन से होकर गुजरती और ठिठक जाती थी. आंगन के आसपास दा साहब के घर का औसारा होता था, वहीं से पत्थर की खुली सीढ़ियां दा साहब की बैठक और उनके शयन कक्ष तक दूसरी मंजिल तक पहुंचती थी. वहीं से रमकुडी दा साहब की उपस्थिति या हलचल को महसूस करने की कोशिश करती थी. यह उसका दुर्भाग्य था कि अस्पताल में भरती दा साहब को वह कैसे महसूस कर पाती.

दीपावली की रात दा साहब को अस्पताल से छुट्टी मिली तो उन्हे घर ले आया गया. डॉक्टर ने अभी एक सप्ताह और आराम की सलाह दी थी.  दा साहब भी अपने पशुओं, गायों विशेषकर रमकुड़ी झमकुडी की खैर खबर लेने को बैचेन थे. 

गोरधन पूजा के दिन सुबह सुबह जब दा साहब की बहू उन्हें चाय देने गई तो दंग रह गई. दा साहब के पलंग के पास उनकी दुलारी रमकुडी आराम से बैठी थी और दा साहब उसकी गर्दन को अपने हाथों से सहला रहे थे. पिछली रात रमकुडी ने तबेले की ओर जाते हुए दा साहब की उपस्थिति को शायद उनकी खांसी की आवाज से महसूस कर लिया था और वह सीढ़ियां चढ़कर उनके पास पहुंच गई थी.

गोरधन पूजा के वक्त दा साहब ने गायों और बैलों की पूजा की, प्यार से उन्हें दुलारा तो गले में पड़ी सैकड़ों घंटियों की गूंज के साथ अनोखे प्रेम के दीप सबकी आंखों में झिलमिलाने लगे।



ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 16, 2024

पुण्य पथ

पुण्य पथ

कुसुम को एक तरह से मन में खुशी भी थी और थोड़ा दुख भी हो रहा था कि बेटे बहू को विदेश गए अभी छह माह भी नहीं हुए थे और वापिस लौटना पड़ा था।

कोरोना जैसी वैश्विक महामारी के आने से थोड़ा पहले ही प्रभात का विवाह बहुत धूमधाम से किया था कुसुम ने। तनिष्का जैसी सुंदर और गुणवान बहू को पाकर जैसे ढेर सारी खुशियां परिवार को मिल गई थीं।

बहू के शुभ पांव घर में पड़े तो बेटे को भी नौकरी में तरक्की मिल गई। दुख इस बात का था कि कम्पनी ने नई नियुक्ति सात समंदर पार विदेश में कर दी थी।

शादी को एक माह भी नहीं बीता होगा कि नव विवाहित बेटे बहू को परदेस जाना पड़ा।    तनिष्का के साथ रहने की कुसुम की सारी इच्छाएं मन में ही दब कर रह गईं। जैसे तैसे भारी मन से बेटे बहू को विदा किया था उसने।

महीने भर में ही अचानक दुनिया भर में फैल गई संक्रामक महामारी ने जैसे सब कुछ बदल कर रख दिया था। सब लोग घरों में कैद हो गए थे। देश हो या परदेश सभी जगह एक सी स्थिति, एक सा भय का वातावरण। प्रभात और तनिष्का भारत में अकेली रह गई माँ कुसुम की चिंता में परेशान हो गए। एयर लाइंस भी सब बन्द हो गईं थीं।

कंपनी ने वर्क फ्रॉम होम की सुविधाएं अपने कर्मचारियों को उपलब्ध करा दीं। इस बीच सरकार ने राहत अभियान के तहत विशेष विमान सेवाएं शुरू कीं तो प्रभात और तनिष्का को भी इसका लाभ मिल गया। वे लोग भारत लौट कर घर से ही अब कंपनी का काम कर रहे थे। हालांकि प्रभात ज्यादातर कामकाज रात को ऑनलाइन ही करता। दिन में आराम करता।

तनिष्का ने भी घर का काम संभाल लिया। काम वाली बाइयों को अभी भी काम के लिए बुलाना शुरू नहीं किया गया था। सब काम कुसुम और तनिष्का मिल जुल कर कर लेतीं थीं।

भारतीय संस्कारों वाली कुसुम ने तनिष्का को कह रखा था कि वह एक रोटी कुत्ते और गाय को देने के लिए भी अतिरिक्त बनाया करे। उनका घर नए विकसित बायपास के पास बनी कॉलोनी में होने से ग्रामीण परिवेश और भारतीय संस्कारों से अब भी जुड़ा हुआ था। बहू तनिष्का दो रोटियां ज्यादा बनाकर नियमित रूप से चौकीदार के कुत्ते शेरू को और दूध वाले भैया की गाय को खिला आती।

कुछ दिनों से कुसुम महसूस करने लगी थी कि तनिष्का अब जरूरत से कुछ ज्यादा ही संख्या में रोटियां बनाने लगी है और गाय कुत्ते के लिए ले जाने लगी है। सास तो आखिर सास ही होती है। तनिष्का द्वारा किया जा रहा यह अपव्यय थोड़ा बर्दास्त से अधिक हो गया उसके लिए। पुण्य कमाने की भी एक सीमा होती है।

आखिर एक दिन कुसुम ने तनिष्का को टोक ही दिया- 'ये इतनी सारी रोटियाँ क्यों ले जाती हो? एक दो ही ठीक हैं!'

लेकिन जो उत्तर तनिष्का ने  दिया वह बहुत चौंकाने वाला था। तनिष्का ने बताया  कि वह जो अतिरिक्त भोजन बनाकर ले जाती है उसे वह एक ऐसे युवक को देकर आती है जिसकी नौकरी कोरोना काल में आई मंदी की वजह से चली गई है। परेशानी में वह अर्धविक्षिप्त सा हो गया है और मंदिर के ओटले पर बरगद की छांव में बेसुध सा दिनभर पड़ा रहता है।

उसने आगे कहा- 'मम्मी जी मैं ठीक कर रही हूँ न! हम तो फिर भी बेहतर हैं जो हमें बहुराष्ट्रीय कम्पनी ने घर से काम करने को कह दिया। सोचकर ही डर लगता है उन छोटे कारोबारियों और उन लोगों के बारे में जिनकी नौकरी चली गई,धंधा चौपट हो गया है। बुरा वक्त कब किसका आ जाए कोई नहीं जानता, शायद इसीलिए तो पुण्य कमाने हेतु गौ माता और श्वान को हम प्रतिदिन भोजन देते हैं।' 

नए जमाने में पुण्य कमाने का जो नवोन्मेषी रास्ता तनिष्का के उदार विचारों से निकल कर आया था सुनकर कुसुम ने प्यार से बहू को गले से लगा लिया।


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ब्रजेश कानूनगो

Sunday, June 9, 2024

नैतिक समर्थन

नैतिक समर्थन

भाई साहब का विश्वास था कि मजबूत लोकतंत्र के लिए विपक्ष भी मजबूत होना चाहिए। इसी सोच के साथ सत्ताधारी दल की बजाए वे मुख्य विपक्षी पार्टी को ही हर बार अपना वोट देते रहे।

इस बार चुनाव के वक्त देश में घटी घटनाओं से वे काफी दुखी और निराश थे। कुछ संसदीय क्षेत्रों में ऐसा दूषित वातावरण बना कि विपक्षी दल और निर्दलीय प्रत्याशियों ने एन मतदान के पहले ही अपने नाम वापिस ले लिए। इसके चलते कहीं सत्ताधारी पार्टी का उम्मीदवार  निर्विरोध निर्वाचित हो गया तो कहीं एकतरफा मुकाबले से चुनाव का सारा आकर्षण और महत्व ही समाप्त हो गया। भाई साहब का क्षेत्र भी इसी राजनीतिक संकट का शिकार हो गया था।

भाई साहब, अब आप किसको वोट देंगे? आपके समर्थन वाली मुख्य राष्ट्रीय पार्टी के उम्मीदवार ने तो अंतिम समय पर अपना नामांकन ही वापिस ले लिया है। ऊपर से वह प्रमुख विरोधी पार्टी में जा मिला है। लड़ाई में अब  कुछ वे निर्दलीय प्रत्याशी ही रह गए हैं जिन्होंने षड्यंत्र और दबावों के बावजूद अपने नाम वापिस नहीं लिए। मित्र ने पूछा।

बंधु, संसदीय चुनावों में यह घटना बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। मतदाता ही नहीं इससे हमारा लोकतंत्र भी शर्मसार हुआ है। मतदान के लिए जरूरी समान लेवल फील्ड के अधिकार की अनिवार्यता का भी हनन हुआ है। लोकतंत्र में राजनीति कलंकित हुई है। वे बोले।

फिर भी भाई साहब वोट तो आपको डालना ही पड़ेगा। क्या करेंगे ? नोटा का भी एक विकल्प है मशीन में। विपक्षी दल ने नोटा का बटन दबाने का आग्रह भी किया है अपने अभियान में। मित्र भाई साहब के अगले कदम के प्रति उत्सुक था।

हां, चुनाव निर्विरोध तो शायद नहीं हो सकेगा। मुकाबला तो नोटा से भी हो सकता है। भाई साहब ने कहा।

ये तो है। विपक्ष तो पहले ही कमजोर है, जीतने वाला तो वैसे भी लाखों मतों के अंतर से जीतता लेकिन अब तो और अधिक वोटों से जीतेगा। शायद रिकॉर्ड भी बन जाएगा किंतु मुकाबला तो एकतरफा ही होगा।  नोटा में डालना भी उसे विजयी होने से रोक नहीं सकता। हां यदि विपक्षी पार्टी का प्रतिद्वंदी मैदान में होता तो अवश्य ही उनका जीतना, हारना भी सम्मानजनक होता। मित्र ने कहा।

बंधु, मैं तो अपने तरीके से इस गलत प्रवृत्ति का विरोध करूंगा। भाई साहब ने बताया।

याने आप नोटा को वोट करेंगे? मित्र ने पूछा।

भाई साहब आगे कुछ बोले नहीं। मतदान वाले दिन एक निर्दलीय प्रत्याशी को वोट कर आए जिसने षड्यंत्रकारियों के नामांकन वापिस लेने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। जिससे चुनाव निर्विरोध नही हो पाया था। मतदाता के अधिकार को छीना नही जा सका था।

चुनाव परिणाम तो पहले से ही वे जानते थे, वर्तमान सांसद का बहुमत से जीत जाना निश्चित था किंतु भाई साहब के भीतर बड़ा संतोष था। मतदान के बाद लोकतांत्रिक प्रतिरोध का एक नैतिक नागरिक बोध उन्हे अधिक शक्ति और संबल प्रदान कर रहा था। 

ब्रजेश कानूनगो