आत्म ग्लानि
दिल्ली घूमने आया एक पर्यटक खरीददारी कर रहा है और अपने यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो बनाते हुए व्लोगिंग भी कर रहा है।
हिंदी में बातचीत करने के लिए उसके पास मात्र कुछ वाक्य हैं। नमस्कार,सलाम वालेकुम,कैसे हो?आपका नाम क्या है? आप कहां से हो? इसके अलावा उसे हिंदी में कुछ समझ नहीं आता। संकेतों और मोबाइल के ट्रांसलेट एप से काम चलाने की कोशिश करता है। चाय और लस्सी जरूर पीता है बीच बीच में। बहुत आत्मीयता दिखाई देती है स्थानीय लोगों और पर्यटक के बीच। देखते हुए दर्शक भी भाव विह्वल हो उठते हैं। बड़े सुखद दृश्य होते हैं सामने, जब वह हमारी परंपराओं और खान पान में रुचि दिखाता है। मन गदगद हो उठता है।
पर्यटक जानता है कि दिल्ली के बाजारों में मोल भाव (बार्गिन) काफी होता है। पांच छह गुनी कीमत लेकर विदेशी पर्यटक को सामान बेचते हम सामने देखते हैं। फिर भी वह चीजें खरीदता है। कोशिश करता है कम कीमत पर खरीदने की। विराट कोहली जैसी जर्सी खरीदता है, रेबेन ब्रांड जैसा गॉगल और ब्रांडेड जूते भी। सभी कुछ असली नहीं होते, उनकी नकल होते हैं,उसे भी पता है लेकिन खरीदने के लिए खरीददारी करता है। पहनकर घूमता फिरता है। अन्य स्थानीय ग्राहकों से बाद में पूछता है कि इन जूतों की क्या कीमत होगी? आठ हजार रुपयों के जूते उसने मोल भाव के बाद तीन हजार में खुशी खुशी पहन लिए थे। यह जानकर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है कि जूतों की वास्तविक कीमत मात्र पंद्रह सौ रुपए है। उसके पास अपने काम की खुशी है। स्थानीयता और लोगों को जानने और उनसे संवाद करने का सुख और आनंद है।
नए खरीदे महंगे जूते उसे आरामदायक नहीं लग रहे। एक जगह रुककर फिर से पुराने जूते पहन लेता है। अब वह ठीक से घूमने का मजा ले रहा है।
सामने एक मोची दिखाई देता है। वह अपने पुराने जूतों को पॉलिश करवाता है। सौ रुपयों में बिल्कुल नए हो जाते हैं पर्यटक के जूते। हुनरमंद मोची टूटी फूटी अंग्रजी बोलता है। समझ भी लेता है। पर्यटक मजदूरी के सौ रुपए देता है उसे और अपने नए खरीदे जूतों की जोड़ी भी उसी मोची को दे देता है उपहार में। कहता है इनका जो उपयोग करना हो कर लेना।
इस बीच व्लॉगर पर्यटक के कुछ स्थानीय फोलोवर भी वहां इकट्ठा हो गए होते हैं। एक लड़की अचरज से पूछती है ये नए जूते आपने मोची को क्यों दे दिए? ये तो बहुत महंगे हैं।
वह बोलता है, ये मेरे किसी काम के नहीं हैं अब। इन्हे पहनने के बाद मैं अपना काम ही नहीं कर पा रहा। इनके काम आ जाएंगे। इन्होंने मेरे पुराने जूते सही दाम लेकर नए कर दिए हैं।
नए जूते की खरीददारी में ठगे जाने पर विदेशी पर्यटक को कोई अफसोस नहीं है। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। अपना कैमेरा थामे विडियो बनाता हुआ वह आगे बढ़ जाता है।
टीवी स्क्रीन के सामने बैठा मैं ग्लानि से पानी पानी हो रहा हूं। माथे पर तनाव की लकीरें कुछ और गहरा गईं हैं।
ब्रजेश कानूनगो
हिंदी में बातचीत करने के लिए उसके पास मात्र कुछ वाक्य हैं। नमस्कार,सलाम वालेकुम,कैसे हो?आपका नाम क्या है? आप कहां से हो? इसके अलावा उसे हिंदी में कुछ समझ नहीं आता। संकेतों और मोबाइल के ट्रांसलेट एप से काम चलाने की कोशिश करता है। चाय और लस्सी जरूर पीता है बीच बीच में। बहुत आत्मीयता दिखाई देती है स्थानीय लोगों और पर्यटक के बीच। देखते हुए दर्शक भी भाव विह्वल हो उठते हैं। बड़े सुखद दृश्य होते हैं सामने, जब वह हमारी परंपराओं और खान पान में रुचि दिखाता है। मन गदगद हो उठता है।
पर्यटक जानता है कि दिल्ली के बाजारों में मोल भाव (बार्गिन) काफी होता है। पांच छह गुनी कीमत लेकर विदेशी पर्यटक को सामान बेचते हम सामने देखते हैं। फिर भी वह चीजें खरीदता है। कोशिश करता है कम कीमत पर खरीदने की। विराट कोहली जैसी जर्सी खरीदता है, रेबेन ब्रांड जैसा गॉगल और ब्रांडेड जूते भी। सभी कुछ असली नहीं होते, उनकी नकल होते हैं,उसे भी पता है लेकिन खरीदने के लिए खरीददारी करता है। पहनकर घूमता फिरता है। अन्य स्थानीय ग्राहकों से बाद में पूछता है कि इन जूतों की क्या कीमत होगी? आठ हजार रुपयों के जूते उसने मोल भाव के बाद तीन हजार में खुशी खुशी पहन लिए थे। यह जानकर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है कि जूतों की वास्तविक कीमत मात्र पंद्रह सौ रुपए है। उसके पास अपने काम की खुशी है। स्थानीयता और लोगों को जानने और उनसे संवाद करने का सुख और आनंद है।
नए खरीदे महंगे जूते उसे आरामदायक नहीं लग रहे। एक जगह रुककर फिर से पुराने जूते पहन लेता है। अब वह ठीक से घूमने का मजा ले रहा है।
सामने एक मोची दिखाई देता है। वह अपने पुराने जूतों को पॉलिश करवाता है। सौ रुपयों में बिल्कुल नए हो जाते हैं पर्यटक के जूते। हुनरमंद मोची टूटी फूटी अंग्रजी बोलता है। समझ भी लेता है। पर्यटक मजदूरी के सौ रुपए देता है उसे और अपने नए खरीदे जूतों की जोड़ी भी उसी मोची को दे देता है उपहार में। कहता है इनका जो उपयोग करना हो कर लेना।
इस बीच व्लॉगर पर्यटक के कुछ स्थानीय फोलोवर भी वहां इकट्ठा हो गए होते हैं। एक लड़की अचरज से पूछती है ये नए जूते आपने मोची को क्यों दे दिए? ये तो बहुत महंगे हैं।
वह बोलता है, ये मेरे किसी काम के नहीं हैं अब। इन्हे पहनने के बाद मैं अपना काम ही नहीं कर पा रहा। इनके काम आ जाएंगे। इन्होंने मेरे पुराने जूते सही दाम लेकर नए कर दिए हैं।
नए जूते की खरीददारी में ठगे जाने पर विदेशी पर्यटक को कोई अफसोस नहीं है। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। अपना कैमेरा थामे विडियो बनाता हुआ वह आगे बढ़ जाता है।
टीवी स्क्रीन के सामने बैठा मैं ग्लानि से पानी पानी हो रहा हूं। माथे पर तनाव की लकीरें कुछ और गहरा गईं हैं।
ब्रजेश कानूनगो