Thursday, October 13, 2022

आत्म ग्लानि

आत्म ग्लानि 

दिल्ली घूमने आया एक पर्यटक खरीददारी कर रहा है और अपने यूट्यूब चैनल के लिए वीडियो बनाते हुए व्लोगिंग भी कर रहा है।

हिंदी में बातचीत करने के लिए उसके पास मात्र कुछ वाक्य हैं। नमस्कार,सलाम वालेकुम,कैसे हो?आपका नाम क्या है? आप कहां से हो? इसके अलावा उसे हिंदी में कुछ समझ नहीं आता। संकेतों और मोबाइल के ट्रांसलेट एप से काम चलाने की कोशिश करता है।  चाय और लस्सी जरूर पीता है बीच बीच में। बहुत आत्मीयता दिखाई देती है स्थानीय लोगों और पर्यटक के बीच। देखते हुए दर्शक भी भाव विह्वल हो उठते हैं। बड़े सुखद दृश्य होते हैं सामने, जब वह हमारी परंपराओं और खान पान में रुचि दिखाता है। मन गदगद हो उठता है।

पर्यटक जानता है कि दिल्ली के बाजारों में मोल भाव (बार्गिन) काफी होता है। पांच छह गुनी कीमत लेकर  विदेशी पर्यटक को सामान बेचते हम सामने देखते हैं। फिर भी वह चीजें खरीदता है। कोशिश करता है कम कीमत पर खरीदने की। विराट कोहली जैसी जर्सी खरीदता है, रेबेन ब्रांड जैसा गॉगल और ब्रांडेड जूते भी। सभी कुछ असली नहीं होते, उनकी नकल होते हैं,उसे भी पता है लेकिन खरीदने के लिए खरीददारी करता है। पहनकर घूमता फिरता है। अन्य स्थानीय ग्राहकों से बाद में पूछता है कि इन जूतों की क्या कीमत होगी? आठ हजार रुपयों के जूते उसने मोल भाव के बाद तीन हजार में खुशी खुशी पहन लिए थे। यह जानकर उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है कि जूतों की वास्तविक कीमत मात्र पंद्रह सौ रुपए है। उसके पास अपने काम की खुशी है। स्थानीयता और लोगों को जानने और उनसे संवाद करने का सुख और आनंद है।

नए खरीदे महंगे जूते उसे आरामदायक नहीं लग रहे। एक जगह रुककर फिर से पुराने जूते पहन लेता है। अब वह ठीक से घूमने का मजा ले रहा है।

सामने एक मोची दिखाई देता है। वह अपने पुराने जूतों को पॉलिश करवाता है। सौ रुपयों में बिल्कुल नए हो जाते हैं पर्यटक के जूते। हुनरमंद मोची टूटी फूटी अंग्रजी बोलता है। समझ भी लेता है। पर्यटक मजदूरी के सौ रुपए देता है उसे और अपने नए खरीदे जूतों की जोड़ी भी उसी मोची को दे देता है उपहार में। कहता है इनका जो उपयोग करना हो कर लेना।

इस बीच व्लॉगर पर्यटक के कुछ स्थानीय फोलोवर भी वहां इकट्ठा हो गए होते हैं। एक लड़की अचरज से पूछती है ये नए जूते आपने मोची को क्यों दे दिए? ये तो बहुत महंगे हैं।
वह बोलता है, ये मेरे किसी  काम के नहीं हैं अब। इन्हे पहनने के बाद मैं अपना काम ही नहीं कर पा रहा। इनके काम आ जाएंगे। इन्होंने मेरे पुराने जूते सही दाम लेकर नए कर दिए हैं।

नए जूते की खरीददारी में ठगे जाने पर विदेशी पर्यटक को कोई अफसोस नहीं है। उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं है। अपना कैमेरा थामे विडियो बनाता हुआ वह आगे बढ़ जाता है।

टीवी स्क्रीन के सामने बैठा मैं ग्लानि से पानी पानी हो रहा हूं। माथे पर तनाव की लकीरें कुछ और गहरा गईं हैं।

ब्रजेश कानूनगो 

Monday, October 10, 2022

लोकतंत्र का दुख

लोकतंत्र का दुख


बुजुर्ग 'लोकतंत्र' बहुत दुखी नजर आ रहा था।
'क्या बात है भाई,चेहरा क्यों लटकाए बैठे हो? साधुरामजी ने पूछ लिया।

'बहुत पीड़ा होती है भाई, जब देखता हूँ कि मेरे युवा बच्चों का कुछ नासमझ लोग मखौल उड़ाते हैं, भद्दी टिप्पणियां करते हैं!'  लोकतंत्र ने दुखी मन से कहा।

'मैं कुछ समझा नहीं हुजूर!' साधुरामजी बोले।

'राहुल,अरविंद,तेजस्वी,अखिलेश..ये सब मेरी उम्मीदें हैं। 'लोकतंत्र कुल' का युवा भविष्य हैं। अब तुम्ही बताओ कोई भी पिता अपने जीते जी ऐसा अपमान कैसे सहन कर सकता है।सभी बेटे खराब तो नहीं हो सकते। सब में मेरा ही तो खून दौड़ता है। सत्ता हो या विपक्ष दोनों संताने मेरी अपनी ही तो हैं। इतना जहर कौन भर रहा इनमें,समझ नहीं पा रहा।'

साधुरामजी दुखी लोकतंत्र का चेहरा तकते रह गए।

ब्रजेश कानूनगो

सम - असम

सम - असम


जो 'सहज' थे उन्होंने अपना 'स' छोड़ा।
जो 'महज' वहां उपस्थित हो गए थे, उन्हे अपना 'म' छोड़ने को मजबूर कर दिया गया।
दोनों 'सम' की आकांक्षा में मिले और हज के लिए निकल लिए।

दोनों तरह के लोग लगभग सौ चूहों को बलि पर चढ़ा चुके थे।

ब्रजेश कानूनगो

शब्दशक्ति का निष्कासन

शब्दशक्ति का निष्कासन 

उस दिन हमारी एक व्यंग्य रचना अखबार में छपी थी। तारीफ़ में बहुत से बधाई फोन भी सुबह से आ रहे थे। लेकिन इससे उलट मित्र साधुरामजी स्वयं अखबार पकडे साक्षात पधार गए। आते ही शुरू हो गए-

'आज चड्डी-बनियान गिरोह पर आपने जो लेख लिखा है उसमें चोरों के  प्रति आप का रवैया सहानुभूतिपूर्ण लग रहा है। आप अपराधी के पक्ष में खड़े दिखाई देते हैं।साधुरामजी ने आपत्ति जताई।
'वह व्यंग्य लेख है मित्रउन फटेहाल चोरों के पक्ष में नहीं है जो रात में छोटी मोटी चोरियां करते हैं। बल्कि पूरी टीम वर्क के साथ दिन के उजाले में देश को लूटने वाले सफेदपोश बड़े अपराधियों पर व्यंजना और लक्षणा शब्द शक्तियों में प्रहार करने की कोशिश की गई है उस रचना में।हमने सफाई देते हुए कहा।

'
किंतु ऐसा स्पष्टतः समझ में आता नहीं लेख पढ़कर।साधुरामजी बोले।
'
वह तो समझना पड़ता है मित्र। साहित्य में बहुत से अव्यक्त को पढ़ना आना चाहिए।व्यंग्यकार ने कहा।
'
फिर भी, आपको स्पष्ट लिखना चाहिए कि आप सफेदपोश लुटेरों पर प्रहार कर रहे हैं।साधुरामजी अपनी बात पर अड़े रहे।
'
साहित्यिक विधा में ऐसा नहीं होता मित्रपत्थर फेंकने और लाठी चलाने से अलग होता है रचनात्मक प्रहार। और अभिधा में लिखी रचना तो फिर एक रिपोर्टिंग में बदल जाती है। व्यंजनालक्षणा शक्तियां व्यंग्य के खास औजार होते हैं।हमने तनिक ज्ञान बांटा।

'
नहींयह तो ठीक नहीं है बिल्कुल। स्वीकार्य नहीं हमें। ये शक्तियां तो  बहुत अराजक और आतंकी लगती हैं अपने आचरण से। इन्हें तुरंत निष्काषित करिये साहित्य से। अन्यथा हमें कोई कानून लाना पड़ेगा।कहते हुए  साधुरामजी नें अभिधा शक्ति में  देशभक्ति से परिपूर्ण एक जोशीले नारे का उद्घोष किया और  निकल लिए। 

ब्रजेश कानूनगो 

अभिमत

अभिमत


उनकी कविताओं का नया संग्रह आया तो साधुरामजी बधाई देते हुए बोले- ' बढ़िया है किताब आपकी।'
'धन्यवाद, कुछ सामग्री पर भी कहिए!' उन्होंने खुश होकर कहा।
'सामग्री भी बढ़िया है, कागज की क्वालिटी बेहतर है।' साधुरामजी बोले।

'मेरा मतलब है, कविताओं पर अपना अभिमत व्यक्त कीजिये।'
'मेरे कुछ कहने से क्या होगा? फ्लैप पर जो वरिष्ठ कवि ने व्यक्त कर दिया है उससे बेहतर भला मैं और आगे क्या कुछ कह पाऊंगा!' साधुरामजी ने कहा।

'अरे ,नहीं मित्र! आप  मेरी कविताओं पर अपने विचार रखेंगे तो वह मौलिक होंगे।'
'ऐसा क्यों? क्या फ्लैप पर वरिष्ठ कवि का लिखा ब्लर्ब मौलिक नहीं है?'
'जी, वह मैंने स्वयं ही लिख लिया था,उनके नाम से।'

'अरे भाई तो जो पिछले दिनों अखबार में समीक्षा आई है,उसमें भी तो वरिष्ठ आलोचक ने बड़ी प्रशंसा की है, तुम्हारी कविताओं की।'

'अब जाने दीजिए!' उन्होंने निराश होकर कहा 'आपसे नहीं होगा, मैं ही लिख लेता हूँ आपका अभिमत।'

ब्रजेश कानूनगो

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पसंद - नापसंद

पसंद - नापसंद 


सरकार ने पुराने नोट बंद कर दिए थे। पुराने नोट बैंकों से बदलवाने का आज आखिरी दिन था। लंबी कतार में लगे लोग अपनी बारी की प्रतीक्षा करते यों ही बतिया रहे थे।

हसन - मैं अपने बच्चे का नाम 'राहुल' कभी नहीं रखूँगा।
कमल - राहुल सांस्कृतायन् तो बहुत विद्वान थे। यदि ऐसा है तो मैं भी अपने बेटे का नाम 'नरेंद्र' नहीं रखूंगा।
कमल- ये भी कोई बात हुई। विवेकानंद का नाम भी तो 'नरेंद्र' था।
तभी बैंक में अनाउंस हुआ- 'टोकन नम्बर 2016...'
कमल कतार से निकलकर चेनल गेट से भीतर चला गया।
हसन का टोकन नंबर 2017 था। वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगा।
टोकन नंबरों में पसंद नापसंद का कोई प्रश्न ही खड़ा नहीं हो सकता था।

ब्रजेश कानूनगो

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