Tuesday, December 8, 2015

केकड़ा

कहानी
केकड़ा
ब्रजेश कानूनगो  

शहर से थोड़ा दूर भले ही रहने आ गए थे हम मगर बहुत शान्ति थी इधर. मेरी तबीयत भी ठीक रहने लगी थी. कौशल कहते थे यहाँ आकर हमने शहर के ‘कैंसर’ से भी मुक्ति पा ली थी. जब भी किसी भीड़ भरे चौराहे से गुजरते, वे कहते ‘देखो वसुधा, केकड़ा आ गया’. उनके अनुसार चौराहा केकड़े का पेट और उससे जुडी गलियाँ केकड़े के पैर होते थे.

शुरू-शुरू में कुछ अकेलापन लगा यहाँ आकर लेकिन जब कुछ और परिवार आकर रहने लगे तो सब ठीक हो गया था. टाउनशिप में सब सुविधाएं थीं. किराना दूकान से लेकर क्लब हाउस और एक छोटा-सा मंदिर भी. कौशल जानते थे कि मैं सुबह-सुबह स्नान के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना और देव दर्शन के बाद ही दूसरे काम हाथ में लेती हूँ. इसीलिए उन्होंने बायपास की इस टाउनशिप में फ्लेट को प्राथमिकता दी थी. और फिर यहाँ से ‘सेंटर’ भी पास पड़ता था जहां हर तीन महीने में मुझे चेकअप के लिए जाना जरूरी था. पांच वर्षों तक निगरानी आवश्यक थी ताकि बीमारी नियंत्रण में रहे.

कई दिनों से सोच रही थी कि शहर में जा कर एक बार सराफा और राजबाड़ा घूम आऊँ. मौसम भी बड़ा सुहावना बना हुआ था. सावन के महीने में सब कुछ वैसे भी बहुत भला लगता है. मेरे जैसी किसी आस्तिक को तो फिर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करने से ही असीम संतुष्टि मिल जाती है. मैंने कौशल से जूने शहर चलने को कहा तो पहले तो वे हिचकिचाए. शहर की भीड़ में अब इस उम्र में कुछ परेशानी-सी  महसूस होती है उन्हें. मगर मेरी खुशी उनके लिए सर्वोपरि. अतः राजी हो गए.

थोड़ी ही देर में हम दोनों खुशनुमा मौसम और मारुति के सफ़र का भरपूर मजा ले रहे थे.
‘वसुधा,याद है तुम्हे आज हमारी कार की सालगिरह है!’ कौशल ने स्टीयरिंग से एक हाथ उठा कर मुस्कुराते हुए कहा.
‘अरे वाह! बधाई. मुझे तो याद ही नहीं रहा. मगर आप ज़रा आगे सड़क पर ध्यान दे कर गाडी ड्राइव करिए’. कौशल वैसे तो बहुत इतमिनान से अच्छी तरह ड्राइव करते हैं मगर मैं उन्हें टोके बगैर रहती नहीं.

रिटायरमेंट के थोड़ा पहले उन्होंने कार चलाना सीख कर बहुत अच्छा काम किया था. हालांकि इस महानगर में जब शुरू में पर्यटन के लिए आये थे तो कहते थे ’यहाँ यदि ट्रांसफर हो जाए तो मेरे लिए तो बहुत मुश्किल होगा वसुधा! मैं तो स्कूटर भी नहीं चला पाउँगा.’ और सचमुच हुआ भी यही.  जब वाकई यहाँ ट्रांसफर होकर आये तो दो महीने के भीतर ही उनके बाँए हाथ में दो  माह के लिए प्लास्टर पट्टा चढ़ गया था. फिर तो ऐसे रमें इस शहर में कि बस यहीं के हो गए. शहर की तासीर से एकरस होते गए.

बायपास को पार कर हम शहर की लिंक रोड पर आ गये थे. कौशल मजे लेकर कार ड्राइव कर रहे थे. मदन मोहन के संगीत वाले गीतों का एक कैसेट हमारी कार के प्लेयर में लगभग स्थायी रूप से बजा करता है.  बच्चे आते थे तब ही वह बदलता था. उनके जाते ही कभी मदन मोहन तो कभी कुमार गन्धर्व. बस और कुछ नहीं. नई नई नौकरी में बच्चों का बार-बार इधर आना संभव भी नहीं होता है. और इस नई टेक्नोलोजी पढ़े हुए लोगों के लिए तो इधर कोई वैसा जॉब भी नहीं कि यहाँ आकर रहें हमारे पास.

उन दिनों तो तीन चार महीने ही हुए होंगे बेटे की नौकरी को , जब मेरी बीमारी का पता चला था. यह बहुत अच्छा रहा कि बीमारी प्रारम्भिक स्टेज पर ही थी. ख्यातिप्राप्त डॉ जोसफ ने ऑपरेशन करके प्रभावित अंग को ही निकाल दिया था. बेटा कब तक पास रहता.  पंद्रह दिन सेवा करके उसे लौटना ही पडा . कौशल जानते थे कि इलाज लंबा चलेगा. कीमो थेरेपी, रेडियेशन और बाद की देखभाल. वे चिंतित तो थे ही उनके बैंक के मर्जर ने उनकी चिंता और बढ़ा दी. घर से तीन सौ किलोमीटर दूर ट्रांसफर हो गया उनका. विलयीकरण की प्रक्रिया में दोनों बैंकों के प्रबंधन में ही इतनी समस्याएँ आ रहीं थी कि कौशल के अटेचमेंट के निवेदन पर ध्यान ही नहीं दिया गया. कौशल ने बहुत सोच विचार कर आखिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुन लिया.
और यह कार ‘मारुति-800’ हमारे घर की भरोसेमंद सदस्य बन गयी. भले ही पांच साल पहले रिटायर्ड हुए अपने साथियों से भी थोड़े ज्यादा वरिष्ठ दिखाई देने लगे हैं मगर इतनी अधिक उम्र भी नहीं है कौशल की. कार बहुत इत्मीनान से चलाते हैं. मैं अच्छी तरह जानती हूँ उनके इस ढलान का कारण. शायद मेरी खुशी में अभी भी वे अपना ख़याल नहीं रख पाते. आज भी कहते ही चल दिए थे साथ में... जूने शहर की ओर.. मेरे साथ... मदन मोहन की गजलों को गुनगुनाते हुए.
‘पता है वसुधा! ये बाय पास क्यों बनाया जाता है, शहर के बाहर.’ कौशल ने मेरी तंद्रा तौडते हुए पूछा.
‘शहर के विकास के लिए और क्या. शहर बड़ा होने लगता है तो नई कोलोनिया जरूरी हो जाती है. कुछ लोग योजना की भनक लगते ही पहले से ही सस्ते दामों पर आसपास की जमीन  किसानों से खरीद लेते है. फिर विकास के साथ मुनाफ़ा कमाते हैं’ मैंने अपनी समझ से कहा.
‘ये तो है ही वसुधा, मगर असल में बायपास बनाने का मतलब शहर की सर्जरी करना है. जब शहर का दिल संकरी गलियों और पतली सडकों के कारण अवरुद्ध होने लगता है तो शहर को हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. बायपास बनाकर शहर की रक्त वाहिनियों में यातायात के संचरण को सुगम किया जाता है.’ कौशल ने जोरदार ठहाका लगाया.

हम शहर की सड़क पर आ गए थे. भीड़ और चहल पहल आज कुछ ज्यादा दिखाई दे रही थी. ‘ओह! आज तो सोमवार भी है सावन का.’ मुझे याद आया. हम प्रमुख चौराहे के नजदीक से गुजर रहे थे. हालांकि सिग्नल की बत्तियाँ अपने निर्धारित समय पर जल बुझ रही थीं मगर इसका कोई  महत्व फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा था. यातायात के सिपाही और कुछ पुलिस कर्मचारियों ने व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी थी. जिस मार्ग पर हमें आगे जाना था उधर बेरिकेट्स लगा दिए गए थे. कोई ‘शोभा यात्रा’ गुजर रही थी उधर. पीले वस्त्रों में सिर पर कलश उठाए सैकड़ों स्त्रियाँ  पेंग्विन पक्षियों के झुण्ड की तरह मंगल गीत गाते हुए मंथर गति से आगे बढ़ रहीं थीं.

चौराहे की दो तरफ स्वागत मंच बने थे जिनसे कुछ नेता टाइप व्यक्ति शोभायात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे थे. पुलिस जवान मुस्तैदी से गाड़ियों को मुख्य सडकों से जुडी गलियों की ओर डाइवर्ट कर रहे थे. इसके कारण अफरा तफरी फ़ैली थी, लंबा और घना जाम चौराहे पर लग गया था.

कौशल ने किसी तरह अपनी कार पास की गली की ओर घुमाना चाही तो साइड मिरर एक बाइक सवार के कंधे से जा टकराया. वह वहीं रुककर हमें गालियाँ देने लगा. उसके रुकने से और गाड़ियां भी रुक गईं. गाड़ियों के इंजनों और हॉर्नों की चिल्ल-पों ऐसी मची कि कौशल को घबराहट सी होने लगी. हमारी गाडी बुरी तरह फंस गयी थी. न आगे जा पा रहे थे न गाडी को पीछे ले जा पा रहे थे. एक ऑटो चालक ने खुद खड़े हो कर बीच से रास्ता बनाया और किसी तरह हमने एक गली में प्रवेश कर लिया.

यह गली भी पूरी तरह आगे से जाम थी. हुआ यों था कि उसमें भी अगले चौराहे से डायवर्ट होकर वाहन आ रहे थे. कौशल के चेहरे पर पसीने की बूंदे छलक आईं थी. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें.
‘वसुधा, मुझे घबराहट सी हो रही है..सीने में जैसे कुछ फंस गया है..’ कहते कहते कौशल का हाथ हॉर्न के स्विच पर ठहर गया. कार की चीख इतनी तेज गूँज रही थी कि उसके आगे सारा कोलाहल जैसे बे-आवाज हो गया.

कौशल को ही नहीं, शहर को भी दिल का दौरा पडा था. बड़े अस्पताल का चमचमाता बोर्ड ऊंची इमारत पर बहुत आसानी से दिखाई दे रहा था. मगर अस्पताल तक पहुँचना इतना आसान नहीं था. तगड़ा ट्रेफिक जाम लगा था. धड़कने रुकने को अभिशप्त थीं.  

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
    
        
            
     
 
      


2 comments:

  1. भाई सा, बढिया. इसे कहते हैं एक पंथ- दो काज. देखने आये थे मस्ती टाइम. लगे हाथ केकड़ा से भी मिल लिए. आप बहुत छोटी पर अच्छी कहानियां लिखते हैं. केकड़ा तो मन को भा गई./ सच में अच्छी कहानी. मजा आ गया.

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  2. बहुत सुंदर और सामयिक कथा हमारा शहर वाकई केकड़ा बनता जा रहा है

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