कहानी
संगीत सभा
ब्रजेश कानूनगो
साहित्य समिति के शिवाजी हॉल में आज सामान्य
दिनों से कुछ ज्यादा चहल-पहल दिखाई दे रही थी। आमतौर पर जो बीस-पच्चीस कुर्सियाँ
पडी रहती हैं वे भी बमुश्किल ही भर पाती थीं। साहित्य गोष्ठियों का विस्तार भी
समिति के परिसर की तरह छोटा होता गया था और शिवाजी हॉल तक ही सिमट गया था। शिवाजी
हॉल में साहित्य होता था और शेष परिसर में व्यवसाय। समाज में साहित्य के बने रहने
के लिए बाजार में प्रोफेशनल नजरिया रखना समय की मांग थी। बहरहाल, शिवाजी हॉल
में आज अतिरिक्त कुर्सियाँ लगाईं गईं थीं। कुर्सियों के आगे मंच के सामने कुछ
दरियाँ भी बिछा दी गईं थी।
हरिहर पटेल जी को पूरा विश्वास था कि टिपानिया जी
को सुनने बडी संख्या में लोग आएंगे। यों भी प्रहलाद सिंह टिपानिया के प्रशंसक
मालवा-निमाड में कम नही थे, और अब जब सरकार ने उन्हे पद्मश्री से सम्मानित कर
दिया था तब महानगरीय और एलिट वर्ग में भी उन्हे सुनना स्टेटस की बात हो गई थी। लोक
गायक के मुख से कबीर को सुनना और फिर मित्रों परिचितों को बताना कि हम टिपानिया जी
को सुनकर आये हैं अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था। टिपानियाजी भी भले ही
गाँव-देहात के आदमी थे मगर दुनिया देख चुके थे सो कबीर को गाने के पहले बता देते
थे कि पद या भजन में कबीर ने क्या कहा है। और फिर श्रोताओं को इससे कोई मतलब नही
रह जाता था कि वे क्या गा रहे हैं। लोग उनकी फक्कड ओजस्वी आवाज के जादू में खो
जाते और तानपूरा, हारमोनियम, मंजीरों,
ढोलक से निकलते लोक संगीत के साथ बहते चले जाते थे।
वैसे शिवाजी हॉल में किसी भी कार्यक्रम का होना
आयोजकों के लिये बडे सम्मान की बात होती है। संचालकगण भी यह बताना कभी नही भूलते
कि संस्था की स्थापना को सौ वर्षों से भी अधिक का समय हो गया है, और यह भी कि
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं इसकी स्थापना के समय यहाँ पधारे थे। स्टेज के ठीक
पीछे की दीवार पर गाँधीजी की तस्वीर सदैव श्रोताओं का ध्यान खींचती थी, जिसमें वे काठियावाडी पगडी पहने हुए थे।
हरिहरजी का अनुमान ठीक था। छह बजने के काफी पहले
ही बडी संख्या में लोग आने लग गए थे। माइक पर उन्हे घोषणा भी करनी पडी कि जो लोग
नीचे बैठ सकते हैं वे दरियों पर बैठ जाएं ताकि बुजुर्गों,महिलाओं को
कुर्सियों पर जगह दी जा सके। मैं स्वयं कुर्सी छोड ही रहा था कि हरिहरजी ने मेरी
पीठ पर हाथ रख दिया। मैं दरी पर आ बैठा। बहुत से लोग दरी पर आ बैठे। कार्यक्रमों
में नियमित आने वालों की संख्या इनमें अधिक थी। नए लोग कुर्सियों की जुगाड में लगे
रहे।
प्रहलाद सिंह टिपानियाजी की ठोस लेकिन लोचदार
आवाज से पूरा हॉल गूंज रहा था। संगीत के लिए शायद व्यवस्था अनुकूल नही थी फिर भी
लोक वाद्यों की थाप में सब मुग्ध थे। टिपानिया जी कबीर को गा रहे थे। मगर कबीर का
मालवीकरण भी कुछ हो गया था..फिर भी कबीर तो थे ही वहाँ।
प्रहलाद जी को सुनते हुए मुझे ओंकारजी याद आ गए।
ओंकारजी को ही सबसे पहले मैने कबीर गाते हुए सुना था। रेडियो पर। शायद छठी-सातवीं
कक्षा में रहा होंगा। ओंकारजी हमारे मुहल्ले में रहते थे अपने परिवार के साथ। बेटा
कैलाश मेरे साथ खेला करता था। बेटी बडी थी सुधा, उस वक्त शायद दसवीं-ग्यारहवीं
में पढती थी। बहुत अच्छा गाती और नाचती थी। केशव मन्दिर की काकण आरती के समय उसको
गाते-नाचते देखा था। लेकिन उसकी इस प्रतिभा के कारण वह ज्यादा चर्चित नही हुई
बल्कि जब एक युवा ठेकेदार अपनी प्रीमियर पद्मिनी कार से मुहल्ले में नियमित
मन्डराने लगा तब सुधा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। पिता तो बेचारे अपनी मिल
की बदलती पालियों की थकान को तानपुरे के साथ कबीर गाकर मिटाने का प्रयास करते रहते
थे, लेकिन सुधा की माँ लीला बाई चौकन्नी हो गई थी। खैर!
रेडियो पर गाना उन दिनों बहुत प्रतिष्ठा की बात
हुआ करती थी। लोक संगीत के भी बहुत से कार्यक्रम प्रसारित होते थे।
खेती-गृहस्थी, श्रमिक जगत आदि में गाँव-देहात से लेकर मिलों-कारखानों में काम करने वाले
किसानों,मजदूरों की प्रतिभाओं को प्रदर्शन का मौका मिला करता
था। ओंकारजी बहुत अच्छा गाते थे। एक बार मिल में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में
पंडित कुमार गन्धर्व को अतिथि के रूप में बुलाया गया था। उन्होने जब ओंकारजी को
गाते हुए सुना तो बहुत प्रभावित हुए। घर भी बुलाया उन्हे। कुमार जी को सुबह सुबह
रियाज करते भी ओंकार जी ने देखा था। फिर तो ये सिलसिला बना रहा। मालवा में कबीर
परम्परा के गीतों को खोजने और उन्हे शास्त्रीय आधार पर गाने का बहुत बडा अभियान–सा कुमार गन्धर्व जी ने उस वक्त छेड रखा था। ओंकारजी जैसे कलाकारों को
प्रोत्साहन मिलता गया।
‘गाडी धीरे-धीरे हाँको मेरे राम गाडी वाले..’
शिवाजी हॉल में प्रहलादजी गा रहे थे। स्मृति में ओंकारजी गा रहे थे
रेडियो पर, श्रमिक जगत कार्यक्रम में। मेरे घर की बैठक में
दरी पर ओंकारजी, कैलाश,सुधा,उसकी माँ,इस्माइल चाचा सहित हमारा परिवार और घर में आए
मेहमान सब मंत्र मुग्ध सुन रहे थे। आज बहुत दिनों बाद घर में रेडियो सुना गया था।
दरअसल, 11 मई को बापूसाहब का स्वर्गवास हुआ था। तेरह दिन का
शोक चल रहा था घर में। लेकिन 24 मई को पंडित नेहरू नही रहे थे। रेडियो पर समाचार
सुनने के लिए दादाजी के शोक को भुलाकर राष्ट्रीय शोक के बारे में सबकी रुचि बढ गई
थी। उसी शाम ओंकारजी का भजन प्रसारित होना था। यह भी एक विडम्बना थी कि ओंकारजी
जिस व्यक्ति को अपना गाना सुनाना चाहते थे वही दुनिया से चला गया था। बापू साहब
याने मेरे दादाजी उसी मिल के मेनेजर थे जिसमें ओंकारजी श्रमिक थे। दादाजी ने बहुत
से गरीब लोगों को अपनी मिल में नौकरियाँ दी थी। ओंकार जी भी उन्ही में से एक थे।
बापू साहब न सिर्फ नगर की शान थे बल्कि मिल का सेठ भी उनकी बहुत मानता था। मिल ने
घर से दस किलोमीटर दूर स्थित कपडा मिल तक आने-जाने के लिए उनके लिए जाफर भाई का तांगा
रखा हुआ था। यह भी बडा दिलचस्प हुआ करता था हमारे लिए कि जब सुबह बापू साहब को मिल
छोडकर आने के बाद जाफर भाई बस स्टेंड से किसी सवारी को लेकर मुहल्ले से गुजरते तो
घोडा हमारे घर के आगे जाने से इंकार कर देता था। तब जाफर भाई तांगे से उतरकर घोडे को लगाम से खींच कर थोडा आगे बढाते। घर
से आगे जाने के बाद ही घोडा सडक पर आगे बढता था।
प्रहलादजी अब कबीर की कोई उलटबासी सुना रहे थे।
ओंकारजी के जीवन में भी एकबार उलटबासी घट गई थी, एक दिन युवा
ठेकेदार की प्रीमियर पद्मिनी में सवार हो कर सुधा अचानक गायब हो गई। बाद में किसी
ने बताया प्रीमियर पद्मिनी सूरत की ओर गई थी। ओंकारजी कबीर में लीन हो गए थे।
महाराज की धूनि में उन्होने अपने को रमा लिया था। गांजे में डूबे ओंकारजी के पास
उन दिनों कुछ सटोरिए उनकी देह भाषा और उंगलियों से किसी गणित को समझने का प्रयास
करते दिखाई देते थे।
सुधा की माँ हमारे घर के बर्तन साफ करने और साफ
सफाई का काम करने लग गई थी। साल-दो साल में छिपते छिपाते सुधा हमारे घर के
पिछ्वाडे के दरवाजे से अपनी माँ से मिलने आ जाया करती थी। कुछ सालों बाद हमने अपना
शहर छोड दिया.. इन्दौर आ गए। कई बरस बीत गए। रेडियो ओंकारजी की तरह हो गया या
ओंकारजी रेडियो की तरह कुछ समझ नही पाया मैं । पर यह जरूर लगता है कि दोनों के
वैसे दिन फिर कभी नही आए।
दरी पर बैठे-बैठे पैर थोडे अकड गए थे। मैने
स्थिति बदलते हुए पास बैठे व्यक्ति को देखा। सुधा की तरह एक शक्ल नजर आई। ‘कौन हैं आप?
कहाँ रहती हैं? मैने पूछा।
‘जी! मैं रिसर्च कर रही हूँ कबीर गायन परम्परा पर..
सूरत में रहती हूँ.. मेरी माँ मालवा की थीं.. प्रहलाद जी को सुनने के लिए यहाँ चली
आई।’
मेरी आवाज जैसे भर्रा गई थी। चाहकर भी कह नही
पाया- ‘रिश्ते में मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ!’
प्रहलादजी गा चुके थे। शिवाजी हॉल तालियों से
गूंज रहा था।
ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क,
कनाडिया रोड, इन्दौर-452018
मो.न.09893944294
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