अदृश्य बोझ
'सुनो इस्माइल, इधर तो आओ, जरा मदद करो!'
वह चौंक पड़ा। शायद ही किसी ने उसे कभी उसके असली नाम से पुकारा होगा। स्कूल की छुट्टी वाले दिन अपने अब्बू के साथ कस्बे से कोई चार किलोमीटर दूर स्थित छोटे से रेलवेस्टेशन पर पिता के साथ पहुंचता, स्टेशन पर कैंटीन वाले और अन्य कर्मचारी यही बोलते कि आज तो कुली का बेटा भी आया है साथ में। पिता पुत्र की पहचान बस कुली और कुली पुत्र जितनी ही थी।
कस्बे से दूर स्थित उस स्टेशन पर दो चार रेलगाड़ियां ही रुकती थीं। अल सुबह छह बजे एक पैसेंजर गाड़ी मुंबई की ओर से और दूसरी दोपहर तीन बजे दिल्ली से। आस पास के गांवों के कुछ लोग जो बाहर नौकरी गए थे या फौज में सिपाही थे उनका आना जाना बना रहता था। स्टेशन पर एक मात्र वही था जो कुली था। पहले पिता यात्रियों का सामान सिर पर लादकर तांगे तक पहुंचाता था फिर बेटे ने यह काम संभाल लिया। बस ऐसे ही गुजर बसर हो रहा था उसका और उसके परिवार का।
समय के साथ उसका काम भी धीरे धीरे कम होता गया। यात्रियों ने भारी भरकम बॉक्स की जगह पहियों वाले सूटकेस और अटैचियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। कभी कभी ही सुनाई देता कुली...कुली इधर यह सामान ले चलो...। अलबत्ता स्टेशन मास्टर के सहयोग से किसी बीमार यात्री की व्हील चेयर धकेलने का काम भी थोड़ा बहुत मिल जाता था।
सरकार ने भले ही तिरस्कार भाव वाले कुली शब्द की पुरानी छबि बदलने के प्रयास में सहायक शब्द को चलन में बढ़ाने के निर्देश दिए थे किंतु वह बस कागजी ही रहे। कुली, सुनो कुली! इधर आओ कुली! कितना लोगे कुली...! कुली को इन शब्दों से मुक्ति नहीं मिली। कुली कुली ही रहा। अंततः मान लिया था, कुली जीवन तेरी यही कहानी।
लेकिन जीवन की हर कहानी में कभी न कभी कोई क्षण तो ऐसा आता ही है जो चमत्कार से कम नहीं होता।
यह कौन है जो उसे उसके नाम से पुकार रहा है? अचरज से उसने अभी अभी रुकी गाड़ी के स्लीपर डिब्बे की खिड़की की ओर देखा। एक फौजी उधर इशारे से बुला रहा था। दौड़कर वह डिब्बे में चढ़कर यात्री तक पहुंचा। फौजी के एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा था, दाहिने पांव में भी जख्म थे। बैसाखी के सहारे वह अपनी सीट से उठा तो इस्माइल ने उसे सहारा देकर प्लेटफार्म पर उतारा। बैग संभाला। दौड़कर स्टेशन मास्टर के ऑफिस से व्हील चेयर ले आया।
पहचाना नहीं इस्माइल? मैं दिनेश, पाटीदार जी का बेटा हूं। तुम्हारी कक्षा में तो पढ़ता था। भूल गए क्या? फौजी ने मुस्कुराते हुए कहा।
इस्माइल हतप्रभ था। खुश भी था। उसे लगा आज वह किसी यात्री का बोझा नहीं ढो रहा है बल्कि एक यात्री ने उसे नाम से पुकारकर उसका अदृश्य बोझ उसके ऊपर से उतार दिया है।
रेलगाड़ी धीरे धीरे स्टेशन छोड़ गई।
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ब्रजेश कानूनगो
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