Tuesday, December 8, 2015

केकड़ा

कहानी
केकड़ा
ब्रजेश कानूनगो  

शहर से थोड़ा दूर भले ही रहने आ गए थे हम मगर बहुत शान्ति थी इधर. मेरी तबीयत भी ठीक रहने लगी थी. कौशल कहते थे यहाँ आकर हमने शहर के ‘कैंसर’ से भी मुक्ति पा ली थी. जब भी किसी भीड़ भरे चौराहे से गुजरते, वे कहते ‘देखो वसुधा, केकड़ा आ गया’. उनके अनुसार चौराहा केकड़े का पेट और उससे जुडी गलियाँ केकड़े के पैर होते थे.

शुरू-शुरू में कुछ अकेलापन लगा यहाँ आकर लेकिन जब कुछ और परिवार आकर रहने लगे तो सब ठीक हो गया था. टाउनशिप में सब सुविधाएं थीं. किराना दूकान से लेकर क्लब हाउस और एक छोटा-सा मंदिर भी. कौशल जानते थे कि मैं सुबह-सुबह स्नान के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना और देव दर्शन के बाद ही दूसरे काम हाथ में लेती हूँ. इसीलिए उन्होंने बायपास की इस टाउनशिप में फ्लेट को प्राथमिकता दी थी. और फिर यहाँ से ‘सेंटर’ भी पास पड़ता था जहां हर तीन महीने में मुझे चेकअप के लिए जाना जरूरी था. पांच वर्षों तक निगरानी आवश्यक थी ताकि बीमारी नियंत्रण में रहे.

कई दिनों से सोच रही थी कि शहर में जा कर एक बार सराफा और राजबाड़ा घूम आऊँ. मौसम भी बड़ा सुहावना बना हुआ था. सावन के महीने में सब कुछ वैसे भी बहुत भला लगता है. मेरे जैसी किसी आस्तिक को तो फिर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करने से ही असीम संतुष्टि मिल जाती है. मैंने कौशल से जूने शहर चलने को कहा तो पहले तो वे हिचकिचाए. शहर की भीड़ में अब इस उम्र में कुछ परेशानी-सी  महसूस होती है उन्हें. मगर मेरी खुशी उनके लिए सर्वोपरि. अतः राजी हो गए.

थोड़ी ही देर में हम दोनों खुशनुमा मौसम और मारुति के सफ़र का भरपूर मजा ले रहे थे.
‘वसुधा,याद है तुम्हे आज हमारी कार की सालगिरह है!’ कौशल ने स्टीयरिंग से एक हाथ उठा कर मुस्कुराते हुए कहा.
‘अरे वाह! बधाई. मुझे तो याद ही नहीं रहा. मगर आप ज़रा आगे सड़क पर ध्यान दे कर गाडी ड्राइव करिए’. कौशल वैसे तो बहुत इतमिनान से अच्छी तरह ड्राइव करते हैं मगर मैं उन्हें टोके बगैर रहती नहीं.

रिटायरमेंट के थोड़ा पहले उन्होंने कार चलाना सीख कर बहुत अच्छा काम किया था. हालांकि इस महानगर में जब शुरू में पर्यटन के लिए आये थे तो कहते थे ’यहाँ यदि ट्रांसफर हो जाए तो मेरे लिए तो बहुत मुश्किल होगा वसुधा! मैं तो स्कूटर भी नहीं चला पाउँगा.’ और सचमुच हुआ भी यही.  जब वाकई यहाँ ट्रांसफर होकर आये तो दो महीने के भीतर ही उनके बाँए हाथ में दो  माह के लिए प्लास्टर पट्टा चढ़ गया था. फिर तो ऐसे रमें इस शहर में कि बस यहीं के हो गए. शहर की तासीर से एकरस होते गए.

बायपास को पार कर हम शहर की लिंक रोड पर आ गये थे. कौशल मजे लेकर कार ड्राइव कर रहे थे. मदन मोहन के संगीत वाले गीतों का एक कैसेट हमारी कार के प्लेयर में लगभग स्थायी रूप से बजा करता है.  बच्चे आते थे तब ही वह बदलता था. उनके जाते ही कभी मदन मोहन तो कभी कुमार गन्धर्व. बस और कुछ नहीं. नई नई नौकरी में बच्चों का बार-बार इधर आना संभव भी नहीं होता है. और इस नई टेक्नोलोजी पढ़े हुए लोगों के लिए तो इधर कोई वैसा जॉब भी नहीं कि यहाँ आकर रहें हमारे पास.

उन दिनों तो तीन चार महीने ही हुए होंगे बेटे की नौकरी को , जब मेरी बीमारी का पता चला था. यह बहुत अच्छा रहा कि बीमारी प्रारम्भिक स्टेज पर ही थी. ख्यातिप्राप्त डॉ जोसफ ने ऑपरेशन करके प्रभावित अंग को ही निकाल दिया था. बेटा कब तक पास रहता.  पंद्रह दिन सेवा करके उसे लौटना ही पडा . कौशल जानते थे कि इलाज लंबा चलेगा. कीमो थेरेपी, रेडियेशन और बाद की देखभाल. वे चिंतित तो थे ही उनके बैंक के मर्जर ने उनकी चिंता और बढ़ा दी. घर से तीन सौ किलोमीटर दूर ट्रांसफर हो गया उनका. विलयीकरण की प्रक्रिया में दोनों बैंकों के प्रबंधन में ही इतनी समस्याएँ आ रहीं थी कि कौशल के अटेचमेंट के निवेदन पर ध्यान ही नहीं दिया गया. कौशल ने बहुत सोच विचार कर आखिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुन लिया.
और यह कार ‘मारुति-800’ हमारे घर की भरोसेमंद सदस्य बन गयी. भले ही पांच साल पहले रिटायर्ड हुए अपने साथियों से भी थोड़े ज्यादा वरिष्ठ दिखाई देने लगे हैं मगर इतनी अधिक उम्र भी नहीं है कौशल की. कार बहुत इत्मीनान से चलाते हैं. मैं अच्छी तरह जानती हूँ उनके इस ढलान का कारण. शायद मेरी खुशी में अभी भी वे अपना ख़याल नहीं रख पाते. आज भी कहते ही चल दिए थे साथ में... जूने शहर की ओर.. मेरे साथ... मदन मोहन की गजलों को गुनगुनाते हुए.
‘पता है वसुधा! ये बाय पास क्यों बनाया जाता है, शहर के बाहर.’ कौशल ने मेरी तंद्रा तौडते हुए पूछा.
‘शहर के विकास के लिए और क्या. शहर बड़ा होने लगता है तो नई कोलोनिया जरूरी हो जाती है. कुछ लोग योजना की भनक लगते ही पहले से ही सस्ते दामों पर आसपास की जमीन  किसानों से खरीद लेते है. फिर विकास के साथ मुनाफ़ा कमाते हैं’ मैंने अपनी समझ से कहा.
‘ये तो है ही वसुधा, मगर असल में बायपास बनाने का मतलब शहर की सर्जरी करना है. जब शहर का दिल संकरी गलियों और पतली सडकों के कारण अवरुद्ध होने लगता है तो शहर को हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. बायपास बनाकर शहर की रक्त वाहिनियों में यातायात के संचरण को सुगम किया जाता है.’ कौशल ने जोरदार ठहाका लगाया.

हम शहर की सड़क पर आ गए थे. भीड़ और चहल पहल आज कुछ ज्यादा दिखाई दे रही थी. ‘ओह! आज तो सोमवार भी है सावन का.’ मुझे याद आया. हम प्रमुख चौराहे के नजदीक से गुजर रहे थे. हालांकि सिग्नल की बत्तियाँ अपने निर्धारित समय पर जल बुझ रही थीं मगर इसका कोई  महत्व फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा था. यातायात के सिपाही और कुछ पुलिस कर्मचारियों ने व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी थी. जिस मार्ग पर हमें आगे जाना था उधर बेरिकेट्स लगा दिए गए थे. कोई ‘शोभा यात्रा’ गुजर रही थी उधर. पीले वस्त्रों में सिर पर कलश उठाए सैकड़ों स्त्रियाँ  पेंग्विन पक्षियों के झुण्ड की तरह मंगल गीत गाते हुए मंथर गति से आगे बढ़ रहीं थीं.

चौराहे की दो तरफ स्वागत मंच बने थे जिनसे कुछ नेता टाइप व्यक्ति शोभायात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे थे. पुलिस जवान मुस्तैदी से गाड़ियों को मुख्य सडकों से जुडी गलियों की ओर डाइवर्ट कर रहे थे. इसके कारण अफरा तफरी फ़ैली थी, लंबा और घना जाम चौराहे पर लग गया था.

कौशल ने किसी तरह अपनी कार पास की गली की ओर घुमाना चाही तो साइड मिरर एक बाइक सवार के कंधे से जा टकराया. वह वहीं रुककर हमें गालियाँ देने लगा. उसके रुकने से और गाड़ियां भी रुक गईं. गाड़ियों के इंजनों और हॉर्नों की चिल्ल-पों ऐसी मची कि कौशल को घबराहट सी होने लगी. हमारी गाडी बुरी तरह फंस गयी थी. न आगे जा पा रहे थे न गाडी को पीछे ले जा पा रहे थे. एक ऑटो चालक ने खुद खड़े हो कर बीच से रास्ता बनाया और किसी तरह हमने एक गली में प्रवेश कर लिया.

यह गली भी पूरी तरह आगे से जाम थी. हुआ यों था कि उसमें भी अगले चौराहे से डायवर्ट होकर वाहन आ रहे थे. कौशल के चेहरे पर पसीने की बूंदे छलक आईं थी. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें.
‘वसुधा, मुझे घबराहट सी हो रही है..सीने में जैसे कुछ फंस गया है..’ कहते कहते कौशल का हाथ हॉर्न के स्विच पर ठहर गया. कार की चीख इतनी तेज गूँज रही थी कि उसके आगे सारा कोलाहल जैसे बे-आवाज हो गया.

कौशल को ही नहीं, शहर को भी दिल का दौरा पडा था. बड़े अस्पताल का चमचमाता बोर्ड ऊंची इमारत पर बहुत आसानी से दिखाई दे रहा था. मगर अस्पताल तक पहुँचना इतना आसान नहीं था. तगड़ा ट्रेफिक जाम लगा था. धड़कने रुकने को अभिशप्त थीं.  

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
    
        
            
     
 
      


मस्ती टाइम


कहानी
मस्ती टाइम
ब्रजेश कानूनगो 

लिली में काफी फूल आ गए थे. पानी देने के बाद नीबू के पौधे को सींचने लगा तो मेरे सामने वही सूखा गमला आ गया. यह वही गमला था जिसमें केवल मिट्टी भरी थी. मैं उसमें पानी नहीं डालता था .सोचता था  कोई अच्छे फूल का बीज या कलम लगा दूंगा. यही गमला हमारे ‘मस्ती-टाइम’ का कारण बन गया था. अमोल मेरे साथ छत पर आता तो मेरे हाथ से बाल्टी-मग  झपट लेता. खुद ही नल के नीचे रखकर पानी भरता. यहीं से हमारी थोड़ी झड़प शुरू हो जाती थी. वह बाल्टी को पानी से लबालब तब तक भरता रहता जब तक कि वह बाहर निकलने नहीं लगे. मैं रोकता, नल बंद कर देता, वह हंसता और फिर से नल खोल देता. मुझे चिढाता. उसे पानी से खेलने में बहुत मजा आता. फिर मग से गमलों में पानी देता, तब भी इतना पानी देता जब तक कि वह गमले से ओवर फ्लो न होने लगे. मैं उसे समझाता कि गमले में इतना पानी मत डालो मगर वह नहीं रुकता. यहाँ तक कि जो गमले खाली पड़े थे उनमें भी पानी भर देता. मुझे चिढ भी होती और उस पर प्यार भी उमड़ आता. रोज यही होता. खाली गमलों को वह पूरा पानी से भर देता और शरारत से मेरी और देखता, हंसता..खिलखिलाता. सब गमलों में पानी डालने के बाद थोड़ा पानी बाल्टी में बचा लेता और मेरी ओर उछालते हुए कहता-‘दादा! मस्ती-टाइम’..!! मैं उसे डपटता तो और नजदीक आकर पानी उडाता..’ पूरी छत और मुझे भिगोने के बाद उसका मस्ती टाइम आखिर ख़त्म होता.

जब तक वह रहा घर में टीवी नहीं देखा गया था और अखबार बिना तह खुले रैक पर जमा होते गए थे. सुबह-सुबह अमोल बहुत उत्साह से मेरे हाथ से चाबी छीनकर गेट का ताला खोल  देता और चेन घुमाते हुए सीधे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ता था..वह आगे-आगे मैं उसके पीछे-पीछे. सुबह की सैर को निकले कॉलोनी वासी  हमारी इस भाग-दौड़ को बहुत कुतूहल से देखने लगते थे.
‘पोता आया है शायद शर्माजी का..’ जैसे शब्द मुझे बहुत अद्भुत अनुभूति से भर देते थे.

केनेडा जाने के बाद इस बार बेटे का परिवार लगभग तीन साल बाद ही घर आ पाया था. इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता. परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बनती रही कि वे लोग चाहकर भी न आ पाये. नौकरी की भी अपनी मजबूरियां होती हैं. ये भी सच है कि इस बीच हमारा वहां जाना भी संभव नहीं हो सका. हालाँकि ‘स्काइप’ या ‘जी-टॉक’ के जरिये रोज ही लेपटॉप पर मिलना हो जाता था. लेकिन  अमोल स्क्रीन पर बहुत कम आता.. कुछ झिझक रहती थी .. बहुत कहने पर बस ‘हाय-बाय’ करके अदृश्य हो जाता था.

यह तो उसके यहाँ आने पर ही स्पष्ट हुआ कि हमारे सामने हिन्दी बोलने में होने वाली दिक्कत के कारण वह सामने नहीं आता था. हिन्दी आसानी से समझ लेता था लेकिन टोरंटो के स्कूल में अपने दोस्तों के साथ अंगरेजी में दिन भर बातचीत की आदत के कारण हिन्दी में बोलना उसके लिए कठिन हो गया था.  यह दिक्कत शायद वैसी ही रही होगी जैसे अंगरेजी में सारी पढाई करने के बावजूद गैर हिन्दी भाषी व्यक्ति से सामना होने पर मुझे होती है.  कनाडा जाने से पहले जब वह यहाँ था तब उसकी भाषा  सुनकर हमें बड़ा सुखद आश्चर्य होता था. ‘डोरेमान’ और अन्य कार्टून चरित्रों के हिन्दी में डब संवादों की वजह से हिन्दुस्तानी के इतने बढ़िया शब्द बोलता था कि हम हत-प्रभ रह जाते थे.

अभी दस दिनों में उसने हमसे हिन्दी में बात करने में खूब मेहनत की थी. बात करने में उसकी कोशिश साफ़ दिखाई देती थी. धूल खा रही शतरंज और कैरम के दिन फिर गए थे. मोहरों के अंगरेजी नामकरण से हमारा पहला परिचय हुआ. वरना हमारे लिए तो वजीर, राजा, हाथी, घोड़ा, ऊँट, प्यादे ही हुआ करते थे.

कॉलोनी के हमउम्र बच्चों के बीच भी वह बहुत पसंद किया जाने लगा. आम तौर पर हिन्दी में बात करते बच्चों को भी स्कूल के अलावा अंगरेजी में बतियाने में खूब मजा आ रहा था. शुरू शुरू में जब अमोल कुछ नहीं बोल पा रहा था तो अटपटा लगा लेकिन जब पता चला कि वह केनेडा से आया है तो खुलकर अंगरेजी में बातचीत करने लगे. इधर अमोल की झिझक भी टूटने लगी, वह भी हिन्दी ही बोलने की कोशिश करने लगा. हिन्दी दिवस के दिन जब मैं एक कार्यक्रम के मुख्य आतिथ्य के बाद घर लौटा तो गेंदे की अपनी माला मैंने सहज अमोल के गले में डाल दी.

उनके वापिस लौटते ही हमारा ‘मस्ती-टाइम’ ख़त्म हो गया. रोज की तरह छत पर गमलों में लगे पौधों में पानी दे रहा था. सब कुछ पहले जैसा हो गया. वही नियमित दिनचर्या हो गयी जो उनके आने के पहले हुआ करती थी. सुबह उठते ही मेन गेट पर लगी चेन और ताला खोलना, दूध के पैकेटों की थैली और अखबारों को भीतर लाकर घूमने निकल जाना. फिर पत्नी और खुद के लिए चाय बनाकर टीवी पर रात को देखे समाचारों को अखबारों में पुनः पढ़ना. छत पर रखे गमलों में पानी डालना, पौधों की देखभाल करना. हुआ तो शाम को किसी साहित्यिक-सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेना और देर रात तक टीवी पर समाचार-बहसें आदि देखते हुए सो जाना.


न जाने क्या सोंचकर मैंने भी अमोल की तरह मिट्टी भरे गमले में पानी डालने को सहज ही मग आगे बढ़ा दिया. अचंभित था सूखे गमले में गेंदे के कुछ पौधों का अंकुरण हो आया था. 


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018




  

 


संगीत सभा

कहानी
संगीत सभा
ब्रजेश कानूनगो

साहित्य समिति के शिवाजी हॉल में आज सामान्य दिनों से कुछ ज्यादा चहल-पहल दिखाई दे रही थी। आमतौर पर जो बीस-पच्चीस कुर्सियाँ पडी रहती हैं वे भी बमुश्किल ही भर पाती थीं। साहित्य गोष्ठियों का विस्तार भी समिति के परिसर की तरह छोटा होता गया था और शिवाजी हॉल तक ही सिमट गया था। शिवाजी हॉल में साहित्य होता था और शेष परिसर में व्यवसाय। समाज में साहित्य के बने रहने के लिए बाजार में प्रोफेशनल नजरिया रखना समय की मांग थी। बहरहाल, शिवाजी हॉल में आज अतिरिक्त कुर्सियाँ लगाईं गईं थीं। कुर्सियों के आगे मंच के सामने कुछ दरियाँ भी बिछा दी गईं थी।

हरिहर पटेल जी को पूरा विश्वास था कि टिपानिया जी को सुनने बडी संख्या में लोग आएंगे। यों भी प्रहलाद सिंह टिपानिया के प्रशंसक मालवा-निमाड में कम नही थे, और अब जब सरकार ने उन्हे पद्मश्री से सम्मानित कर दिया था तब महानगरीय और एलिट वर्ग में भी उन्हे सुनना स्टेटस की बात हो गई थी। लोक गायक के मुख से कबीर को सुनना और फिर मित्रों परिचितों को बताना कि हम टिपानिया जी को सुनकर आये हैं अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था। टिपानियाजी भी भले ही गाँव-देहात के आदमी थे मगर दुनिया देख चुके थे सो कबीर को गाने के पहले बता देते थे कि पद या भजन में कबीर ने क्या कहा है। और फिर श्रोताओं को इससे कोई मतलब नही रह जाता था कि वे क्या गा रहे हैं। लोग उनकी फक्कड ओजस्वी आवाज के जादू में खो जाते और तानपूरा, हारमोनियम, मंजीरों, ढोलक से निकलते लोक संगीत के साथ बहते चले जाते थे।

वैसे शिवाजी हॉल में किसी भी कार्यक्रम का होना आयोजकों के लिये बडे सम्मान की बात होती है। संचालकगण भी यह बताना कभी नही भूलते कि संस्था की स्थापना को सौ वर्षों से भी अधिक का समय हो गया है, और यह भी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं इसकी स्थापना के समय यहाँ पधारे थे। स्टेज के ठीक पीछे की दीवार पर गाँधीजी की तस्वीर सदैव श्रोताओं का ध्यान खींचती थी, जिसमें वे काठियावाडी पगडी पहने हुए थे।

हरिहरजी का अनुमान ठीक था। छह बजने के काफी पहले ही बडी संख्या में लोग आने लग गए थे। माइक पर उन्हे घोषणा भी करनी पडी कि जो लोग नीचे बैठ सकते हैं वे दरियों पर बैठ जाएं ताकि बुजुर्गों,महिलाओं को कुर्सियों पर जगह दी जा सके। मैं स्वयं कुर्सी छोड ही रहा था कि हरिहरजी ने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया। मैं दरी पर आ बैठा। बहुत से लोग दरी पर आ बैठे। कार्यक्रमों में नियमित आने वालों की संख्या इनमें अधिक थी। नए लोग कुर्सियों की जुगाड में लगे रहे।
प्रहलाद सिंह टिपानियाजी की ठोस लेकिन लोचदार आवाज से पूरा हॉल गूंज रहा था। संगीत के लिए शायद व्यवस्था अनुकूल नही थी फिर भी लोक वाद्यों की थाप में सब मुग्ध थे। टिपानिया जी कबीर को गा रहे थे। मगर कबीर का मालवीकरण भी कुछ हो गया था..फिर भी कबीर तो थे ही वहाँ।

प्रहलाद जी को सुनते हुए मुझे ओंकारजी याद आ गए। ओंकारजी को ही सबसे पहले मैने कबीर गाते हुए सुना था। रेडियो पर। शायद छठी-सातवीं कक्षा में रहा होंगा। ओंकारजी हमारे मुहल्ले में रहते थे अपने परिवार के साथ। बेटा कैलाश मेरे साथ खेला करता था। बेटी बडी थी सुधा, उस वक्त शायद दसवीं-ग्यारहवीं में पढती थी। बहुत अच्छा गाती और नाचती थी। केशव मन्दिर की काकण आरती के समय उसको गाते-नाचते देखा था। लेकिन उसकी इस प्रतिभा के कारण वह ज्यादा चर्चित नही हुई बल्कि जब एक युवा ठेकेदार अपनी प्रीमियर पद्मिनी कार से मुहल्ले में नियमित मन्डराने लगा तब सुधा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। पिता तो बेचारे अपनी मिल की बदलती पालियों की थकान को तानपुरे के साथ कबीर गाकर मिटाने का प्रयास करते रहते थे, लेकिन सुधा की माँ लीला बाई चौकन्नी हो गई थी। खैर!

रेडियो पर गाना उन दिनों बहुत प्रतिष्ठा की बात हुआ करती थी। लोक संगीत के भी बहुत से  कार्यक्रम प्रसारित होते थे। खेती-गृहस्थी, श्रमिक जगत आदि में गाँव-देहात से लेकर मिलों-कारखानों में काम करने वाले किसानों,मजदूरों की प्रतिभाओं को प्रदर्शन का मौका मिला करता था। ओंकारजी बहुत अच्छा गाते थे। एक बार मिल में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में पंडित कुमार गन्धर्व को अतिथि के रूप में बुलाया गया था। उन्होने जब ओंकारजी को गाते हुए सुना तो बहुत प्रभावित हुए। घर भी बुलाया उन्हे। कुमार जी को सुबह सुबह रियाज करते भी ओंकार जी ने देखा था। फिर तो ये सिलसिला बना रहा। मालवा में कबीर परम्परा के गीतों को खोजने और उन्हे शास्त्रीय आधार पर गाने का बहुत बडा अभियानसा कुमार गन्धर्व जी ने उस वक्त छेड रखा था। ओंकारजी जैसे कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता गया।

गाडी धीरे-धीरे हाँको मेरे राम गाडी वाले..शिवाजी हॉल में प्रहलादजी गा रहे थे। स्मृति में ओंकारजी गा रहे थे रेडियो पर, श्रमिक जगत कार्यक्रम में। मेरे घर की बैठक में दरी पर ओंकारजी, कैलाश,सुधा,उसकी माँ,इस्माइल चाचा सहित हमारा परिवार और घर में आए मेहमान सब मंत्र मुग्ध सुन रहे थे। आज बहुत दिनों बाद घर में रेडियो सुना गया था। दरअसल, 11 मई को बापूसाहब का स्वर्गवास हुआ था। तेरह दिन का शोक चल रहा था घर में। लेकिन 24 मई को पंडित नेहरू नही रहे थे। रेडियो पर समाचार सुनने के लिए दादाजी के शोक को भुलाकर राष्ट्रीय शोक के बारे में सबकी रुचि बढ गई थी। उसी शाम ओंकारजी का भजन प्रसारित होना था। यह भी एक विडम्बना थी कि ओंकारजी जिस व्यक्ति को अपना गाना सुनाना चाहते थे वही दुनिया से चला गया था। बापू साहब याने मेरे दादाजी उसी मिल के मेनेजर थे जिसमें ओंकारजी श्रमिक थे। दादाजी ने बहुत से गरीब लोगों को अपनी मिल में नौकरियाँ दी थी। ओंकार जी भी उन्ही में से एक थे। बापू साहब न सिर्फ नगर की शान थे बल्कि मिल का सेठ भी उनकी बहुत मानता था। मिल ने घर से दस किलोमीटर दूर स्थित कपडा मिल तक आने-जाने के लिए उनके लिए जाफर भाई का तांगा रखा हुआ था। यह भी बडा दिलचस्प हुआ करता था हमारे लिए कि जब सुबह बापू साहब को मिल छोडकर आने के बाद जाफर भाई बस स्टेंड से किसी सवारी को लेकर मुहल्ले से गुजरते तो घोडा हमारे घर के आगे जाने से इंकार कर देता था।   तब जाफर भाई तांगे से उतरकर घोडे को लगाम से खींच कर थोडा आगे बढाते। घर से आगे जाने के बाद ही घोडा सडक पर आगे बढता था।

प्रहलादजी अब कबीर की कोई उलटबासी सुना रहे थे। ओंकारजी के जीवन में भी एकबार  उलटबासी घट गई थी, एक दिन युवा ठेकेदार की प्रीमियर पद्मिनी में सवार हो कर सुधा अचानक गायब हो गई। बाद में किसी ने बताया प्रीमियर पद्मिनी सूरत की ओर गई थी। ओंकारजी कबीर में लीन हो गए थे। महाराज की धूनि में उन्होने अपने को रमा लिया था। गांजे में डूबे ओंकारजी के पास उन दिनों कुछ सटोरिए उनकी देह भाषा और उंगलियों से किसी गणित को समझने का प्रयास करते दिखाई देते थे।

सुधा की माँ हमारे घर के बर्तन साफ करने और साफ सफाई का काम करने लग गई थी। साल-दो साल में छिपते छिपाते सुधा हमारे घर के पिछ्वाडे के दरवाजे से अपनी माँ से मिलने आ जाया करती थी। कुछ सालों बाद हमने अपना शहर छोड दिया.. इन्दौर आ गए। कई बरस बीत गए। रेडियो ओंकारजी की तरह हो गया या ओंकारजी रेडियो की तरह कुछ समझ नही पाया मैं । पर यह जरूर लगता है कि दोनों के वैसे दिन फिर कभी नही आए।

दरी पर बैठे-बैठे पैर थोडे अकड गए थे। मैने स्थिति बदलते हुए पास बैठे व्यक्ति को देखा। सुधा की तरह एक शक्ल नजर आई। कौन हैं आप? कहाँ रहती हैं? मैने पूछा।
जी! मैं रिसर्च कर रही हूँ कबीर गायन परम्परा पर.. सूरत में रहती हूँ.. मेरी माँ मालवा की थीं.. प्रहलाद जी को सुनने के लिए यहाँ चली आई।
मेरी आवाज जैसे भर्रा गई थी। चाहकर भी कह नही पाया- रिश्ते में मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ!
प्रहलादजी गा चुके थे। शिवाजी हॉल तालियों से गूंज रहा था।

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इन्दौर-452018
मो.न.09893944294


Sunday, November 15, 2015

समाधि

कहानी
समाधि
ब्रजेश कानूनगो

प्रलय ही आ गया था जैसे . किसी ने शायद ही कभी प्रलय देखा था लेकिन हर कोई कह रहा था प्रलय आ गया है. जो बुजुर्ग थे बता रहे थे कि उन्होंने ऐसी घनघोर बारिश पिछले साठ बरसों में नहीं देखी थी. बच्चे डर भी रहे थे और बारिश का मजा भी ले रहे थे. मजा तो यह था कि स्कूलों की छुट्टी कर दी गयी थी. लेकिन दानवी शक्ल के काले बादलों की गडगडाहट के बीच बिजली चमकती तो वे सिहर जाते थे. दिन के अभी बारह भी नहीं बजे थे लेकिन अन्धेरा ऐसा हो गया था जैसे शाम के सात बज गए हों.

ऐसे में रहमान ने किसी तरह अपने को फटी बरसाती से थोड़ा बचा रखा था. हाथ में औजारों की पेटी लिए सड़क के गड्ढों से बचता बचाता वह कोठी की ओर चला जा रहा था. ठाकुर साहब का हुक्म टालने का तो वह कभी सोंच ही नहीं सकता था. न सिर्फ पुरानी बरसाती उनकी दी हुई थी बल्कि कई बार ठाकुर साहब ने उसकी बहुत मदद भी की थी. और आज जब उनका संदेशा आया तो उसने मौसम की परवाह किये बगैर तुरंत कोठी का रुख कर लिया था.

ठाकुर साहब बड़े अफसर थे. और हर तरह से बड़े थे. उनके पिताजी भी बड़े अफसर रहे थे, उनकी कोठी बड़ी थी, नाम बड़ा था, शरीर भी कोई पचासी-नब्बे किलो का रहा होगा. ठाकुर साहब नगर पालिका के स्वच्छता अधिकारी या शिक्षा विभाग के निरीक्षण अधिकारी की तरह केवल नाम के अफसर नहीं थे. वे अफसर शब्द का बोझ ढोते नहीं थे बल्कि उसे जीते थे. उनकी अफसरी का आभा मंडल उनके साथ-साथ चलता था. ठाकुर साहब में वे सब गुण थे जो किसी अफसर को बड़ा अफसर बनाते हैं. मसलन वे इतने सख्त थे कि दफ्तर में उनके कैबिन के आगे से भी गुजरने से कर्मचारी कतराते थे. उनकी  मौजदगी मात्र से दफ्तर के सारे काम काज बड़े व्यवस्थित रूप से चलते-होते दिखाई देते थे.
      
लेकिन बहुत से ऐसे कारण भी थे जिनके कारण ठाकुर साहब की दफ्तर की सख्ती घर-परिवार में विनम्रता की गंगा बन जाती थी. अफसरी के पहाड़ को घर में अक्सर पिघलते देखा जा सकता था. यों तो रहमान को उनके दफ्तर में मरम्मत आदि के काम से बुलाया जाता था मगर  ठाकुर साहब की कोठी पर जरूरत होती तो वहाँ भी वह पहुँच जाता था. धीरे-धीरे जैसे वह ठाकुर साहब की कोठी का ही एक कर्मचारी हो गया था. शौक़ीन तबीयत के तो थे ही ठाकुर साहब और रहमान मुर्गा साफ़ करने पकाने में भी माहिर था. पार्टियों आदि में उसके पकाए मुर्गे की बड़ी तारीफ़ होती थी. आज कोठी ही पहुँचना था रहमान को.

आज कोई दावत आदि भी नहीं होनी थी..फिर क्यों बुलवाया था ठाकुर साहब ने..अब तो सूमो भी नहीं है कोठी में..रहमान सोंचने लगा. कहीं ऐसा तो नहीं कि बारिश को देखते हुए गोष्ठी वगैरह का इंतजाम करना हो. शायर लेखक आ रहे हों..महफ़िल ज़मने वाली हो कोठी पर..साहित्य और कला से ठाकुर साहब का विशेष लगाव रहा था. कभी-कभी उन्हें अफसोस भी होता था कि वे इस महकमें में गलत आ गए हैं. उन्हें तो किसी कॉलेज में हिन्दी का प्रोफ़ेसर होना था या किसी कला अकादमी का अध्यक्ष. मगर ऐसा होता कहां हैं. वे यह सोंचकर संतोष कर लेते थे कि यह केवल उनके साथ तो नहीं हो रहा. जिन्हें परचून की दूकान में पुडिया बांधना था वे कालिदास और शेक्सपियर पढ़ा रहे थे, जिन्हें ठेकेदारी करते हुए सड़कें बनानी थीं वे प्रजातंत्र की बिछात पर शतरंज खेल रहे थे. इसलिए उन्होंने अपने को कुछ ऐसे एडजेस्ट कर लिया था कि अब वे एक तरफ सख्त अफसर थे तो दूसरी तरफ एक संवेदनशील कवि और कलाप्रेमी व्यक्ति की छवि शहर के प्रबुद्ध वर्ग में बनाने में सफल हुए थे.

कोठी अभी दूर थी. बारिश जरूर कम हुई लेकिन हवा बहुत तेज चल रही थी. रहमान की बरसाती थोड़ी सी और फट गयी इस हवा में. किसी तरह वह सड़क किनारे ‘ साहित्य भवन’ के वरांडे में बरसाती को ठीक से अपने शरीर पर लेने के लिए आ खडा हुआ. साहित्य भवन के निर्माण में भी ठाकुर साहब की महती भूमिका रही थी. ठाकुर साहब के प्रयासों से नगर की कला और साहित्यिक संस्थाओं को लगातार सहयोग मिलता रहा था. उनके कहने भर से स्मारिकाओं और फोल्डरों के लिए विज्ञापनों और प्रायोजकों की व्यवस्था बड़ी आसानी से हो जाया करती थी. अनियतकालीक तथा अव्यावसायिक लघु मगर महवपूर्ण साहित्य पत्रिका ‘साहित्य ऋतु’ के वे अवैतनिक व आजीवन प्रधान सम्पादक भी थे. बाकी सम्पादन का जहां तक सवाल है कवि ‘निडर’ जी सब देख लेते थे. निडर जी उनके महकमें के हिन्दी अधिकारी थे.
‘ठाकुर साहब जैसे मर्मज्ञों के कारण ही साहित्य और कलाओं को प्रोत्साहन मिलता है.’ इस एक वाक्य के निरंतर उपयोग से नगर को ‘साहित्य भवन’ उपलब्ध हुआ था. जिसमें साहित्य और कला का सरंक्षण हो रहा था.गोष्ठियां हो रही थी, बेशक अध्यक्षता करना ठाकुर साहब की एक बड़ी जिम्मेदारी हुआ करती थी.

बारिश फिर तेज हो गयी थी. साहित्य भवन पर रहमान अब ज्यादा रुक नहीं सकता था. वह सड़क पर आ गया. सूमो होता तो आज बारिश में कितना मजा करता वह.. रहमान को भी भीगते हुए दौड़ लगानी पड़ती उसके पीछे-पीछे. उसके ही बस में था सूमो. बहुत प्यार करते थे साहब सूमो से. यों अफसरों के कुत्ता-प्रेम के अनेक किस्से प्रचलित हैं मगर सूमो और ठाकुर साहब की बात ही कुछ और थी. नगर के लोग भी सूमो से बहुत प्यार करते थे. जितना साहब से करते उतना सूमो से भी करते. ठाकुर साहब लोगों की कमजोरी थे और सूमो ठाकुर साहब की कमजोरी था. कहा जाता है ठाकुर साहब के सूमो से अनुराग के बड़े गहरे कारण थे. दरअसल सूमो के पूर्वज ठाकुर साहब के ससुराल पक्ष के थे. जब ठाकुर साहब का प्रेम विवाह हुआ था तब मैडम अपने साथ एक गर्भवती कुतिया भी लेती आईं थी. कालान्तर में इधर बाबा का जन्म हुआ उधर सूमो धरती पर अवतरित हो गए. एक संयोग और घटित हुआ, सूमों के जन्म के तेरह दिन पहले मैडम के पिताजी हृदयाघात से चल बसे. मैडम के मन में कुछ ऐसी बात जम गयी कि वे सूमो में अपने डैडी की छवि देखने लगीं. मैडम की खुशी साहब की खुशी. ठाकुर साहब अपने और कुतिया के पिल्ले से सामान रूप स्नेह करने लगे.

नगर के लोग साहब और सूमो के जरिये नगर को संवारने में लगे हुए थे. कुत्ता शहर में साहब की तरह ही लोकप्रिय हो गया था. जैसे शहर की जान उस कुत्ते में आ बसी थी. कला और साहित्य जैसी विधाओं का विकास हो ही रहा था कि अचानक नगर को गहरे आघात का सामना करना पड़ा. एक सुबह सूमों अपने घर में मरा हुआ पाया गया. यह रहस्य ही था कि उसने आत्महत्या की या किसी दुश्मन ने उसकी हत्या कर डाली थी.

बरसात में भीगते हुए रहमान के भीतर भी संवेदनाओं की बरसात हो रही थी..कैसा ग़मगीन दिन था वह... सूमो के असामयिक निधन से न सिर्फ मैडम और साहब पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा ,मगर नगर के लोग और संस्थाएं भी उनके दुःख में उनके सहभागी बने हुए थे.
जैसे-जैसे कुत्ते के निधन की खबर फ़ैल रही थी नागरिकों की भीड़ भी कोठी में जमा होती गयी. एक-एक करके लोग शव के करीब जाते और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर कुछ ऐसे लौटते कि उनका ग़मगीन चेहरा किसी तरह मैडम और साहब की नज़रों में आ जाए. कुछ संस्थाओं ने तो सूमो पर ’पुष्प-चक्र’ भी अर्पित किये, ज्यादातर ने फूल मालाएं चढ़ाई. दुख की घड़ी में बहुत देर तक किसी को ध्यान ही नहीं रहा कि शव का अंतिम संस्कार भी किया जाना है. शव को इस तरह तो रखा नहीं जा सकता. साहब से बात की गयी ,उन्होंने मैडम को रेफर किया. पहले तो मैडम सूमो को अपनी आँखों के सामने से हटाने को तैयार ही नहीं हुईं, लेकिन जब उन्हें लगा कि कब तक ऐसी ही बैठी रहेंगी, किटी पार्टी और शापिंग के लिए भी देर हो रही है सो वे अंतत: राजी हो गई.

सूमो को पूरे सम्मान के साथ कोठी परिसर में दफना दिया गया. दो मिनट के मौन के बाद श्रद्धांजलि दी गई. दुखी मन से लोग अपने-अपने घर लौट गए थे. मगर साहब के मन में भावनाओं का ज्वार बहुत देर तक उठता रहा.

रहमान कोठी पहुँच गया था. गेट पार कर वह अब सूमों की समाधि के सम्मुख था. उसे याद है सूमों की तेरहवी के दिन मार्वल और ग्रेनाईट पत्थरों से निर्मित उसकी समाधि का लोकार्पण साहब के करकमलों से ही हुआ था. आज तेज बरसात में वह भीग रही थी.

कोठी के पोर्च में साहब खड़े थे, रहमान को देखा तो बोले. ‘रहमान, ये कुछ चद्दरें मंगवाईं हैं, इन्हें सूमो की समाधि पर लगाना है... बरसात से बेहाल हो रही है..हो सके तो आज ही लगा दो.’
‘जी,साहब’ कहकर वह अपने काम में जुट गया. बारिश अब कम हो गयी थी.

कोई चार घंटों में अपना काम ख़त्म करके वह घर पहुंचा तो उसकी आँखें फटी रह गईं. नाले के किनारे बनी उसकी झोपडी तेज बहाव में बह गई थी. यास्मिन किसी तरह नाले के बीचों बीच मलबे पर खडी ठिठुरती बकरी को बचाने के प्रयास में जुटी थी.

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रीजेंसी,चमेली पार्क,कनाडिया रोड, इंदौर-452018
मो.न.09893944294          
 


पिछली खिडकी

पिछली खिडकी

दूरदर्शन पर अपना कविता पाठ करके लौट रहा था। राजधानी से प्रकाशित होने वाला राष्ट्रीय दैनिक मेरे हाथों में था। रेलगाडी छूटने के इंतजार में अखबार के पन्ने पलटता हुआ अंतिम पृष्ठ तक पहुंच गया। आचार्यजी कला प्रदर्शनी का उद्घाटन करते नजर आए। साथ में आचार्यजी की चित्रकार की तारीफ और चित्रों पर उनकी टिप्पणी भी प्रकाशित हुई थी। समाचारों में ऐसा डूब गया कि पता ही नही चला कब गाडी ने सीटी दी  और कब स्टेशन पीछे छूट गया।
 बहुत दिनों से प्रयास में था कि किसी तरह दूरदर्शन पर रचना पाठ कर आऊँ। इधर देख रहा था हर ऐरा-गैरा रंगीन बूशर्ट पहन कर अपने चुटकुले छोटे पर्दे की कवि गोष्ठी सुनाकर ऐंठ रहा था। ऐसा नही है कि ऐसे जुगाडू कवियों के प्रति कोई द्वेष भाव रहा था किंतु यह शायद मेरी ही कमजोरी या मेरी कविता में कोई कमी थी जिस वजह से मैं ऐसा नही कर पा रहा था। हाँलाकि रेडियो पर कई बार अपनी लम्बी-लम्बी कविताएँ सुना आया था लेकिन रेडियो का स्वांत: सुखाय प्रसारण वह सुख नही दे रहा था जो टीवी का रंगीन स्क्रीन दे पाता है। ऐसी हताशा के समय आचार्यजी का सहयोग मुझे मिला। हालांकि आचार्यजी से मेरा कोई सीधा परिचय कभी नही रहा। मेरा मित्र मुकेश माथुर राजधानी के महाविद्यालय में प्रोफेसर था जिसने किसी तरह आचार्यजी के माध्यम से दूरदर्शन केन्द्र से मेरा कांट्रेक्ट लेटर निकलवाया था। दरअसल आचार्यजी महानगर के विशिष्ठ व्यक्तियों में से एक हैं। राजधानी आनेवाला शायद ही कोई बुद्धिजीवी ऐसा रहा हो जो आचार्यजी का आशीर्वाद लिए लौट गया हो।
मैं मुकेश के घर ही ठहरा था। उसकी बहुत इच्छा थी कि जब यहाँ आया हूँ तो आचार्यजी से अवश्य मिलता जाऊँ। आचार्यजी देश के जाने-माने विचारक,संस्कृति मर्मज्ञ और प्रतिष्ठित साहित्यकार तो थे ही,राजनीतिक क्षेत्रों में भी उनकी खासी पूछ-परख और घुसपैठ थी। नए रचनाकार के लिए उनसे मिलना लगभग किसी साहित्यिक तीर्थ पर होकर आने जैसा था। उन्होने कई नवोदित रचनाकारों की पुस्तकों के फ्लेप लिखकर उपकृत किया था। साहित्य के क्षेत्र में यह गहरी मान्यता रही है कि उनके लिखे फ्लेप और ब्लर्व के बाद पुस्तक की आधी समालोचना सम्पन्न हो जाती है और पुरस्कार प्राप्ति की सम्भावनाएँ बड जाया करती हैं। पिछले दिनों लेखक संघ की एक गोष्ठी में युवा कवियत्री की नितांत अचर्चित कविताओं पर उसकी प्रतिभा पर अपनी बात कही तभी लोगों को विश्वास हो गया था कि सेठ वैभवदास की स्मृति में दिया जाने वाला अगला साहित्य सम्मान उसे ही प्राप्त होगा। और यह हुआ भी। आचार्यजी के आशीर्वाद से कई रचनाकारों को अपनी सही दिशा प्राप्त हुई थी। उनसे मिलना मेरे लिए सचमुच सौभाग्य की बात थी।
दूरदर्शन की कवि गोष्ठी मे भाग लेने के बाद अगले दिन हम आचार्यजी के दर्शन करने और उनका आशीर्वाद लेने हम उनके निवास पर जा पहुंचे थे। उनके भवन के आगे छोटा-सा खूबसूरत उद्यान था। उसमे अधिकांश वे पेड-पौधे लगे हुए थे जिनका उल्लेख अक्सर प्रेम गीतों और फिल्मी नगमों में बहुतायत से होता रहा है। ऐसा आभास होता था जैसे उनके हिस्से की धरती ने गुलमोहर और पलाश के रंगों की चुनरी ओढ रखी हो। उनके आँगन में इन पेड-पौधों के सौन्दर्यपूर्ण उपस्थिति से आचार्यजी की सुरुचि और उनके दिव्य व्यक्तित्व का अनुमान लगाते हुए हमने चौकीदार से अपने आने का प्रयोजन कहा। उसने हमें भवन की ऊपरी मंजिल पर बने उस कक्ष तक पहुंचा दिया जहाँ आचार्यजी अगंतुकों से भेंट किया करते थे।  आचार्यजी का वह कक्ष बहुत ही तरतीब से संवारा गया था। जिस ओर से हमने प्रवेश किया था,अर्थात मुख्य द्वार की ओर दो खिडकियाँ थीं। एक दरवाजा बाहर की ओर खुलता था,जहाँ छत थी। सामनेवाली दीवार पर मकबूल फिदा हुसैन द्वारा माधुरी दीक्षित की तस्वीर लगी थी, जिसमें वह किसी आदिवासी औरत की तरह अपने खूबसूरत दांतों का प्रदर्शन करते दिखाई दे रही थी। कक्ष के एक कोने में तिपाही पर एक सितार रखा हुआ था, हालांकि किसी ने आचार्यजी को सितार बजाते कभी रूबरू देखा नही था।
कुछ देर बाद आचार्यजी ने कक्ष में प्रवेश किया। उनके साथ जैसे कोई प्रभामंडल चल रहा था, उसी के तिलस्म से हमारे हाथ बरबस नमस्कार की मुद्रा में जुड गए। सफेद ढीला कुर्ता और चुस्त पायजामा धारण किए आचार्यजी ने मैदानी क्षेत्र में पैदा होने बावजूद सिर पर हिमाचली टोपी लगाई हुई थी। आचार्यजी की उपस्थिति वातावरण में विशिष्ठ गरिमा घोल रही थी। अनके आते ही जैसे केवडे की मीठी खुशबू बिखर गई थी। ध्यान से सुनने पर भीतर वाले कक्ष से आती बाँसुरी की मद्दिम-मद्दिम धुन सुनाई पड रही थी। उनके ललाट पर अद्भुत तेज दिखाई दे रहा था। लगता था उनकी आँखें छलछला रही हों। जैसे प्रेम का कोई सागर उन आँखों में लहरा रहा  हो। आत्मीय मुस्कान और महर्षि की धीर-गम्भीर वाणी लिए उनके मुख से शब्दों की गंगा प्रवाहित हुई- बैठिए! बैठिए!!,परिचय चाहूंगा मैं आपका!

मुकेश को वे थोडा-बहुत जानते थे, लेकिन वे इतने विराट थे कि छोटी पहचान को याद रखा जाना उनके लिए सहज नही था।
जी, मैं ब्रजकिशोर यादव, मध्यप्रदेश की कन्नौद तहसील के स्कूल में अध्यापक हूँ। दूरदर्शन पर कविता पढने आया था,सोचा आपके दर्शन भी करता चलूँ।किसी तरह मैं तिलस्म से बाहर आने का प्रयास करके बोला।
 वे मुस्कुराए,जैसे आशीर्वाद दे रहे हों।
आपका लेख क्रांतिवीर में पढा था, बहुत सटीक टिप्पणी की है आपने नई पीढी पर।मैने बातचीत का सिलसिला शुरू करने की गरज से कहा। मैं जानता था विद्वानों के समक्ष एक बार प्रश्न रखकर चुप हो जाना ही उचित होता है। उसके बाद तो वे स्वयं ही हमें उपकृत करने लगते हैं। हुआ भी यही। आचार्यजी ने हमें सम्बोधित करना शुरू कर दिया था।
आराम कुर्सी को पिछली खिडकी के पास खींचकर बैठते हुए वे बोले-आज का युवा भटकाव के रास्ते पर है, हमारे संस्कार, हमारे आदर्श मूल्यहीन हो रहे हैं।आचार्यजी ने अपनी कुर्सी पिछली खिडकी के और नजदीक खिसकाते हुए आगे कहा-देश और समाज की चिंता छोड युवा पीढी पतन की राह पर दौड रही है..।आचार्यजी ने हमारी ओर से नजरें पूरी तरह हटा कर खिडकी के बाहर देखते हुए कहा- नशा उनकी रगों मे समाता जा रहा है..पश्चिम की गन्दगी उनके भविष्य को चौपट कर रही है...कहते कहते आचार्यजी खडे हो गए, ‘ पोर्न फिल्मों और घटिया साहित्य उन्हे जकडता जा रहा है..कहते कहते आचार्यजी खिडकी के बाहर एकटक देखने लगे। हमने महसूस किया, आचार्यजी हमसे ज्यादा पिछली खिडकी के बाहर देखने में अधिक दिलचस्पी ले रहे थे। बातचीत करते समय उनके वाक्य जैसे टूट रहे थे। तभी पास वाले कमरे में टेलीफोन की घंटी घनघनाई। बेमन से वे फोन सुनने भीतर चले गए।
उत्सुकतावश मैने उठकर पिछली खिडकी से बाहर देखा। सामने से बेहद खूबसूरत दिखाई देने वाले आचार्यजी के प्रासाद के पिछ्वाडे झुग्गी-झोपडियों का घना जंगल था। पिछली दीवार के समीप कुछ सार्वजनिक नल लगे थे, जहाँ गरीब बस्ती की औरतें अपनी देह और कपडों का मैल बहाने में व्यस्त थीं।

मैं पुन: सोफे पर आ बैठा। अन्दर वाले कमरे से आचार्यजी की आवाज सुनाई दे रही थी। शायद किसी कला प्रदर्शनी के उद्घाटन करने का निमंत्रण उन्होने स्वीकार कर लिया था।
हम लौट आए थे। उनके भवन की तरह ही उनके व्यक्तित्व की भी कुछ खिडकियाँ पीछे की ओर खुलती थीं।
मैने रेलगाडी की खिडकी से बाहर देखा, दृश्य बदल चुका था। कांक्रीट के विराट जंगल बहुत पीछे छूट चुके थे। नीले आकाश के तले काम करती औरतों की रंग बिरंगी औडनियाँ हरे भरे खेतों की पृष्ठभूमि में लहरा रही थीं। यह वह चित्र था जिसे किसी आचार्य की समीक्षा की कोई दरकार नही थी।





भिंडी का भाव

भिंडी का भाव   

रामदीन के घर आखिर वह घडी आ ही गई थी जिसका सबको बेसब्री से इंतजार था। उसके घर शहनाई क्या बजी जैसे पूरे गाँव में उत्सव मनने लगा। जानकीदास हलवाई ने पूरे ग्यारह सेर पेडे बनवाकर रामदीन के घर भिजवाए। भला क्यों न भेजता, रामदीन जैसे भले इंसान की आखिर भगवान ने सुन ही ली थी। उसके यहाँ देर जरूर है पर अन्धेर नहीं, गाँव के हर व्यक्ति की जुबान पर बस यही बात थी।  रामदीन ने पूरे दस बरस अपने आँगन में बच्चे की किलकारी सुनने का इंतजार किया था। छोटे से गाँव में शादी के बाद इतने लम्बे समय तक बच्चे का जन्म न हो तो लोग तरह तरह की बातें उछालने लगते हैं। वह तो रामदीन का भला व्यवहार ही था जिसके कारण उस पर छींटाकशी करने की बजाए लोग दुआएँ करते रहे कि रामदीन के घर एक नन्हे-मुन्ने के रूप में खुशियाँ आएँ।

किसी काम से पास के शहर में गई करीमा चाची ने जब अपने फूफा के यहाँ रामदीन के घर बच्चे के जन्म की खबर सुनी तो दौडी-दौडी बाजार गई, सवा सेर पेडे और एक झुनझुना खरीद कर शाम की रेल से ही गाँव कौट आई। रामदीन के यहाँ गाना-बजाना जारी था। करीमा चाची ने नन्हे की बलाइयाँ लीं और बहुरानी की गोद भरी। नन्हे से बच्चे को जब चाची ने गोद में लिया तो उनकी आँखों में खुशी के आँसू छलछला आए। बोलीं- ‘बडा होके अपने अब्बा पर जाना,बडा नेक इंसान बनेगा हमारा नन्हा रामदीन।’

आदमी के पहचान हर व्यक्ति अपने-अपने हिसाब से करता है। रामदीन भला आदमी है यह बात करीमा चाची भी कहतीं थीं और जानकीदास हलवाई भी। जहाँ जानकीदास उसकी खुशमिजाजी से प्रभावित था, वहीं करीमा चाची रामदीन की दरियादिली से। करीमा चाची को शौक था तो बस अच्छा खाने का। बाजार में जो नई सब्जी आती,सबसे पहले करीमा चाची के घर ही बनती थी। कारण-रामदीन की इकलौती सब्जी की दुकान जो थी गाँव में। शहर से जो ताजी सब्जी वह लेकर आता करीमा के घर पहले पहुंचाता था। अगर करीमा स्वयं उसकी दुकान पर आती तो बडे ही प्रेम से ताजी सब्जियाँ तोलता और तोलने के बाद कुछ सब्जी ऊपर से और थैली में डाल देता।

बाद में करीमा चाची तो गाँव में ही रह गई, लेकिन रामदीन का परिवार शहर चला आया। रामदीन की खबरें आते-जाते लोगों से करीमा को मिलती रहतीं। किसी ने बताया था कि शहर में रामदीन ने ‘कारपोरेशन’ के सब्जी बाजार में अपनी दुकान ले ली है और उसका धन्धा खूब अच्छा चल निकला है। फुटकर के साथ-साथ उसने थोक व्यवसाय भी शुरू कर दिया है। कुछ दिनों बाद चाची को पता चला कि रामदीन ने एक मकान भी शहर में खरीद लिया है और उसका बेटा भी उसके करोबार में हाथ बंटाने लगा है। करीमा चाची को यह सब सुनकर बहुत खुशी होती, ईश्वर से यही दुआ करती- ‘रामदीन और उसका बेटा खूब फलें-फूलें।’
समय बीतता रहा। खबर मिली रामदीन नही रहा। करीमा चाची बूढी हो गईं और फूफा के लडके के पास रहने शहर चली आईं। चाची बूढी जरूर हो गई थी पर खाने-पीने का शौक पहले जैसा ही अब भी बरकरार था।  फूफा के लडके की बहू लाख बढिया खाना पकाती पर चाची को तृप्ति नही होती थी। ‘यह क्या बेकार कूढा बना डाला है, तुम्हे तो सब्जी लाना- बनाना ही नही आता, कितनी सडी-गली गिलकियाँ लाई हो, बैंगन में कितने छेद हैं।’ ऐसे जुमले तो बेचारी बहू को रोज ही सुनने को मिलते थे।
परेशान हो कर बहू ने एक दिन थैली चाची को थमाई और बोल दिया-‘पास ही बाजार है- जा कर खुद ही ले आओ।’

और चाची बाजार के लिए निकल पडी। सोचने लगी रामदीन की भी सब्जी की दुकान है इसी शहर में, अब उसका बेटा बैठता होगा। शक्ल तो जरूर मिलती होगी रामदीन से, बचपन में तो उसके जैसा ही दिखता था। खुदा ने चाहा तो उसी की दुकान से सब्जियाँ खरीदूंगी।

और वास्तव में चाची की खुदा ने सुन ली। सब्जी की दुकान पर जैसे हूबहू रामदीन ही बैठा था। चाची की चाल खुशी से तेज हो गई। दुकान पर पहुंची और रामदीन के बेटे की और देख मुस्कुराई तो रामदीन के बेटे ने उन्हे ऊपर से नीचे तक निहारा। चाची की खस्ता माली हालत उनके पहने कपडों से बयान हो रही थी। चाची ने सब्जियों की टोकरियों पर नजर दौडाई। उनकी मनपसन्द सब्जियों से टोकरियाँ भरी हुईं थीं। मनपसन्द भिंडी की टोकरी से भिंडियाँ छांटने के लिए जैसे ही उन्होने हाथ आगे बढाया चार भिंडियाँ अलग से देने वाले बाप के बेटे ने झुंझलाकर चाची का हाथ पकड लिया- ‘हाथ मत लगाओ माई, तुम्हारे बस की नही है।’

चाची की आँखों के सामने कभी रामदीन आ रहा था, तो कभी ताजी भिंडियों की टोकरी, तो कभी फूफा के बेटे की बहू का बुझा-बुझा सा चेहरा। इस बीच चाची को पता ही नही चला कि नए ग्राहकों की भीड ने उन्हे दुकान से बहुत दूर ढकेल दिया था।



घूँसा

घूँसा

जब घर छोड़ा था तब सारे बाल काले थे . लगभग बीस बरस का अंतराल कम नहीं होता, जिस प्रकार मेरी देह और जुल्फों में बदलाव आया था वैसा ही कुछ अपने शहर को देखने पर महसूस हो रहा था. बरसों बाद मैं अपने शहर में पैदल भटक  रहा था. बहुत ढूँढने के बाद भी मुझे अपने बचपन का वह प्यारा कस्बा कहीं नजर नहीं आ रहा था. सब कुछ जैसे बदल सा गया था. कई मॉल खुल गए थे,शहर का औद्योगीकरण भी हो गया था. आई टी पार्क स्थापित होने की तैयारियां शुरू हो गईं थी. नई-नई कॉलोनियां दिखाई दे रहीं थीं. पुराने रहवासियों ने अपने बड़े मकानों में या तो किराएदारों के लिए चालें बनवा ली थीं या फिर उन्हें छोटे-मोटे बाजार में बदल डाला था. नगर पालिका परिषद नगर निगम में बदल चुकी थी.  महानगर निगम बनने में शायद कुछ ही समय बचा होगा ऐसा स्पष्ट दिखाई दे रहा था,  नगर की सीमा वहाँ तक बढ़ गई थी जहाँ पहले गाँव और लहलहाते खेत हुआ करते थे.   'फिकर नाट पान भण्डार 'या 'क्या चाहिए मिठाई के लिए सीधे चले आइए ' जैसे बोर्डों के स्थान पर 'गुप्ता कंस्ट्रक्शन' अथवा 'कृष्ण कॉलोनी' जैसे बड़े-बड़े बोर्ड लटके नजर आ रहे थे.

पत्नी का आग्रह था कि बिटिया का विवाह अपने शहर से ही किया जाए. रिश्तेदार और परिचित सब इधर ही हैं . उधर हैदराबाद तो कोई आने से रहा. अपना घर है ही यहाँ . छोटा भाई यहीं रहता है.अगर अपनो के बीच कार्यक्रम होता है तो बहुत अच्छा रहेगा. और हम यहाँ आ गए थे. अपने शहर.

शहर जरूर बदल गया था ,मगर हमारा घर वैसा ही आज तक था जैसा हम छोडकर गए थे.मैंने महसूस किया था वे सब घर वैसे ही थे जहाँ संपत्ति का बटवारा नहीं हुआ था. हालांकि ऐसे घरों की संख्या कम ही थी. हम बाहर थे भाई यहाँ नौकरी में था ,स्थानीय नौकरी थी , इसलिए ट्रांसफर आदि का झमेला नहीं था. अगर बटवारा हो जाता तो अभी तक हमारे घर में भी चार दुकानें निकल आतीं. भला पांच-छः हजार की मासिक आमदनी कौन छोडता है इस जमाने में. फिर बढता शहर था यह,  लेकिन हम ऐसा नहीं कर पाए थे. दुनियादार लोग भले ही मूर्ख समझते रहे ,लेकिन शायद हमने बटवारे की बजाए  घाटा उठाते हुए रिश्तों की रक्षा करने को अधिक महत्त्व दे डाला था. मुझे मालूम था शहर में फ़ैली यह महामारी अब हमारे घर को भी नहीं छोडेगी.लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता था कि यह सब बिटिया के विवाह के बाद ही होगा.

हमारे घर के अलावा नहीं बदला था तो मेरा स्कूल-आनंद भवन प्राथमिक पाठशाला . स्कूल का  यह भवन आज चालीस बरस बाद भी वैसा ही नजर आ रहा था जैसा पहले नजर आता था. भवन को अब  गोबर और पीली मिट्टी से तो नहीं लीपा जाता होगा  लेकिन  देखकर लगता था कि गुरुकुल परम्परा का पालन हमारे वक्त की तरह ही हो रहा है . जब टाटपट्टी बिछाने पर धूल उडती थी. ज्ञान गंगा में नहाने से पहले बच्चे धूल गंगा में स्नान कर लेते थे.अब भी ऐसा ही दिखाई देता  था. अब तो हमारे  स्कूल में  कुछ गरीब बस्ती के बच्चों को ही जाते देख रहा था ,जबकि उस समय शाला में हर वर्ग और हर स्तर के परिवार के बच्चे साथ-साथ बैठकर पढा करते थे. सेठ धर्मदास का सुपुत्र टाट पट्टी पर बैठकर पढ़ता था, तो ठेलागाड़ी चलानेवाले निसार का बेटा अब्दुल भी हमारे पास बैठता था. पुरोहित वृंदावनलाल का बेटा वंशी भी उसी स्कूल में पढ़ता था वहीं मै भी नंगे पैर, कपडे का बना बस्ता लटकाए ,स्कूल की ओर दौड पडता था. स्कूल प्रवेश  के समय पिताजी के   एक चांटे के प्रसाद के कारण कभी स्कूल न जाने का विचार मन में नहीं आया. बस्ते का बोझ दौडने में कभी बाधक नहीं बना , उस समय बहुत सारी पुस्तकें कंधे पर लादकर भी नहीं ले जाना पडती थीं.  मेरा बस्ता मेरी माँ द्वारा हर वर्ष नया सिल कर दिया जाता था. पिताजी का पुराना पैंट पूरी तरह घिसकर जब रिटायर्ड हो जाता तब उसकी तीन चीजें बनती थी . बाजार से सब्जियां,सामान वगैरह लाने के लिए एक थैला,दादी माँ के लिए ठण्ड में पहनने के लिए पूरी आस्तिनों वाला पोलका और मेरे लिए एक बस्ता,जिसे पाकर मैं बहुत खुश हो जाता था.

हर शनिवार को हमारे स्कूल में 'बाल सभा' होती थी. बाल सभा होने के पहले साप्ताहिक टेस्ट होता था. जो लडके फेल हो जाते थे ,उन्हें उस दिन कक्षा की लिपाई करनी होती थी और जो पास हो जाते थे वे 'बाल सभा' में कवितायें, कहानियां  और चुटकुलों का आनंद उठाते थे. अब्दुल और वंशी को कभी बालसभा में रूचि नहीं रही,वे अक्सर कक्षा की लिपाई ही करते थे. 'बाल सभा' समाप्त होती तो सब बच्चे रविवार की छुट्टी के आकर्षण में दौड़ते हुए स्कूल से बाहर निकलते . नीली आँखों वाला बद्री प्रसाद मुझसे पूछता-'कल क्या है ?' मैं खुशी से चहकता 'कल छुट्टी है.' तब बद्रीप्रसाद तुक मिलाते हुए मुझे चिढाता-'तेरी दादी बुड्ढी है.' मुझे बहुत दुःख होता. घर पहुंचकर रोता और दादी को यह बात बताता तो वे मुस्करा देतीं.उनके कुल तीन दाँत थे,वे भी अपनी पकड़ छोड़ बैठे थे.वे मुस्करातीं तो उनमे से एक दाँत लटककर और बाहर निकल आता. वे इस रूप में मुझे और भी ममतामयी लगतीं थीं. वे कहतीं-'बद्री ठीक ही तो कहता है,मैं बुढिया ही तो हूँ..' मैं उनकी गोद में सर रखकर सब कुछ भूल जाता.
कक्षा में बद्रीप्रसाद और मै पास-पास ही बैठते थे. बद्री मुझसे ढाई गुना मोटा था.बद्री के पिताजी शहर के जाने-माने पहलवान थे.उनके साथ बद्री भी कसरत वगैरह किया करता था. बद्री की नीली आँखें उसके कसरती बदन में चार चाँद लगाती थीं. बद्री हमेशा दूसरे सहपाठियों से मेरी रक्षा किया करता था. वह मेरा बहुत अच्छा मित्र था. लेकिन एक छोटी सी घटना ने हमारी मित्रता पर पानी फेर  दिया. मास्टरजी ने हमें कुछ शब्दार्थ याद करके लाने को कहा था. वे एक के बाद एक बच्चे से अर्थ पूछते जा रहे थे.जो बच्चा गलत जवाब देता ,उसे सजा मिलती. उसे पास बैठे सहपाठी का घूँसा खाना पडता था. हालांकि मास्टरजी इसे धौल ज़माना ही कहते थे लेकिन बच्चे पडौसी की पिटाई बड़े जोरदार ढंग से ही किया करते थे. बल्कि हरेक को इंतज़ार रहता था कि कब अपना पड़ोसी गलती करे. जब एक बार मेरी बारी आई तो मास्टर जी ने पूछा-'बताओ रघुवीर 'शक्तिशाली' यानी क्या?' और मैं बगलें झांकने लगा. पास में ही बद्री पहलवान बैठे थे. इशारा होते ही मुझे लगा कि मेरी पीठ से कोई वजनदार चीज टकराई है, और पेट में जैसे कोई गड्ढा सा गहराता जा रहा है.   आँखों के सामने सितारे उभर आए. मै गिर पढ़ा.मास्टर साहब मेरे पास आए, बद्री खुद दौडकर पानी लाया  और मुझ पर छींटे मारे,मुझे पानी पिलाया गया. मै तो ठीक हो गया ,लेकिन इसके साथ ही  मास्टर जी की उस पिटाई परम्परा का भी अंत हो गया. बाद में मैंने बद्री प्रसाद से सदा के लिए बोलचाल बंद कर दी  .फिर कभी हम एक दूसरे से नहीं बोले.मैं उससे दूर इस्माइल के पास बैठने लग गया.

बचपन की यादों में डूबा मै हमारे स्कूल से लगे बाजार में जहाँ खडा  था,उसके ठीक सामने बर्तनों की दूकान थी. मेहमानों को  बिदाई में उपहार स्वरूप स्टील की प्लेंटे देने की योजना थी.मैं दूकान में चढ गया.'भैया ज़रा स्टील की प्लेंटे दिखाना.' मैंने कहा. 'जरूर देखिए साहब.' दुकानदार ने पलटकर कहा. हमारी आँखें मिली. दुकानदार की शक्ल मेरी जानी-पहचानी सी लग रही थी.बरबस मेरा हाथ मेरी पीठ की तरफ गया.दुकानदार ने मुझे पहचान लिया था.-'तुम रघुवीर ही हो ना.' वह काउंटर छोडकर बाहर आ गया था और मेरे गले में उसकी बाहें हार बनकर अपने शहर में मेरा स्वागत कर रहीं थीं.  आंसुओं से धुंधलाती दृष्टि के बावजूद मै बद्री की नीली आँखों में झिलमिलाता हुआ अपना प्यारा शहर स्पष्ट देख रहा था.