Sunday, May 26, 2024

स्टीम इंजिन

स्टीम इंजिन

हरिभाऊ के जीवन का बड़ा हिस्सा महानगर के रेलवे स्टेशन की आपाधापी, कोलाहल और प्लेटफार्म पर दौड़ लगाते ही गुजरा।

जिस तरह समय के साथ उनकी उम्र,शरीर और सेहत में बदलाव आए महानगरीय स्टेशन और उसकी प्रकृति भी दिन प्रतिदिन बदलती गई।

जब हरिभाऊ युवक थे, मांसपेशियां भी मजबूत थीं। सिर पर दो अटैचियाँ और बगल में बैग लटकाए एक सूटकेस को थामकर बीसियों सीढियां चढ़ना उतरना बहुत आसान था। समय के साथ शरीर शिथिल हो गया। उम्र भी अब बोझ उठाने की नहीं रही। नए युवा कुलियों ने काम संभाल लिया।

जो पुराना काला स्टीम इंजिन स्टेशन पर धरोहर के रूप में गौरव बढ़ा रहा है हरिभाऊ ने उसे पटरियों पर दौड़ते देखा था। बाद में डीजल और इलेक्ट्रिक इंजनों के दौर में भी मजबूत रेलगाड़ियों के डिब्बों से यात्रियों के भारी भरकम सामान को लादकर तांगों,रिक्शों तक पहुंचाया।

उनकी उम्र और अनुभव और विनम्र स्वभाव ने स्टेशन के कुली समुदाय में मुखिया और मार्गदर्शक के रूप में ही स्वीकारा गया था। रेलवे स्टाफ भी हरिभाऊ को पर्याप्त सम्मान देता।

ज्यादा समय वे कुलियों के विश्रामालय में बैठकर कुलियों की समस्याओं को सुनते और रेलवे के संबंधितों तक बात पहुंचाते। कुलियों के विश्रामालय में मच्छरों की समस्या थी, लेटने बैठने के उचित साधन नहीं थे,स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की समस्याओं पर भी प्रशासन तक उन्होंने कुलियों की बातें पहुंचाई थीं। यही कारण था कि वे सर्वप्रिय अघोषित कुली नेता थे। सबका आदर पाते थे।

जब स्टेशन से नई आधुनिक वंदे भारत रेल के शुभारंभ का अवसर आया तो कुछ लोगों का सुझाव आया कि नई रेलगाड़ी का औपचारिक शुभारंभ हरिभाऊ के करकमलों द्वारा होना चाहिए। वे ही नई रेल को हरी झंडी दिखाएं। स्थानीय रेलवे स्टाफ और रेलवे सलाहकार मंडल की भी यही राय रही। उनके नाम का प्रस्ताव भी उच्चाधिकारियों तक पहुंचा दिया गया।

शुभारंभ के दिन आधुनिक नई रेलगाड़ी को हार फूलों से सजाया गया था। हरिभाऊ भी उत्साह से प्लेटफार्म पर इंजन के सामने अपने साथियों सहित खड़े रहे। इस अवसर के लिए उन्होंने नया गणवेश भी सिलवाया था।

तभी रेलवे के एक अधिकारी कुलियों के समूह के पास आए और कुछ समझाने लगे। थोड़ी देर में कुलियों का समूह पीछे हट गया। हालांकि हरिभाऊ को वहीं रुकने का आग्रह किया गया। वे वहीं रुक गए।  नेताओं की भीड़ बढ़ने लगी।

शुभारंभ के ठीक मुहूर्त समय पर मंत्री जी,उनके सहायक, रेलवे अधिकारी, स्थानीय नेतागण उपस्थित हुए। पूजन आदि किया गया। स्थानीय स्टेशन मास्टर ने अतिथियों का स्वागत किया। असिस्टेंट स्टेशन मास्टर ने एक पुष्प गुच्छ और एक अभिनंदन पत्र हरिभाऊ को प्रदान कर उनका सम्मान किया।

 

इधर हरिभाऊ सम्मान पत्र थामे देखते रह गए उधर तालियों की गड़गड़ाहट के बीच मंत्रीजी ने एक्सप्रेस रेलगाड़ी को हरी झंडी दिखाई तो रेलगाड़ी धीरे धीरे प्लेटफार्म छोड़ने लगी।

शुभारंभ समारोह के बाद हरिभाऊ ने कुली विश्रामालय की बेंच पर अपना सम्मानपत्र रखा और स्टेशन प्रांगण में सजे स्टीम इंजिन को आत्मीयता से निहारने लगे।


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ब्रजेश कानूनगो 

Saturday, May 25, 2024

अदृश्य बोझ

अदृश्य बोझ

'सुनो इस्माइल, इधर तो आओ, जरा मदद करो!' 

वह चौंक पड़ा। शायद ही किसी ने उसे कभी उसके असली नाम से पुकारा होगा। स्कूल की छुट्टी वाले दिन अपने अब्बू के साथ कस्बे से कोई चार किलोमीटर दूर स्थित छोटे से रेलवेस्टेशन पर पिता के साथ पहुंचता, स्टेशन पर कैंटीन वाले और अन्य कर्मचारी यही बोलते कि आज तो कुली का बेटा भी आया है साथ में। पिता पुत्र की पहचान बस कुली और कुली पुत्र जितनी ही थी।

कस्बे से दूर स्थित उस स्टेशन पर दो चार रेलगाड़ियां ही रुकती थीं। अल सुबह छह बजे एक पैसेंजर गाड़ी मुंबई की ओर से और दूसरी दोपहर तीन बजे दिल्ली से। आस पास के गांवों के कुछ लोग जो बाहर नौकरी गए थे या फौज में सिपाही थे उनका आना जाना बना रहता था। स्टेशन पर एक मात्र वही था जो कुली था। पहले पिता यात्रियों का सामान सिर पर लादकर तांगे तक पहुंचाता था फिर बेटे ने यह काम संभाल लिया। बस ऐसे ही गुजर बसर हो रहा था उसका और उसके परिवार का।

समय के साथ उसका काम भी धीरे धीरे कम होता गया। यात्रियों ने भारी भरकम बॉक्स की जगह पहियों वाले सूटकेस और अटैचियों का इस्तेमाल शुरू कर दिया। कभी कभी ही सुनाई देता कुली...कुली इधर यह सामान ले चलो...। अलबत्ता स्टेशन मास्टर के सहयोग से किसी बीमार यात्री की व्हील चेयर धकेलने का काम भी थोड़ा बहुत मिल जाता था। 

सरकार ने भले ही तिरस्कार भाव वाले कुली शब्द की पुरानी छबि बदलने के प्रयास में सहायक शब्द को चलन में बढ़ाने के निर्देश दिए थे किंतु वह बस कागजी ही रहे। कुली, सुनो कुली! इधर आओ कुली!  कितना लोगे कुली...! कुली को इन शब्दों से मुक्ति नहीं मिली। कुली कुली ही रहा। अंततः मान लिया था, कुली जीवन तेरी यही कहानी। 

लेकिन जीवन की हर कहानी में कभी न कभी कोई क्षण तो ऐसा आता ही है जो चमत्कार से कम नहीं होता।

यह कौन है जो उसे उसके नाम से पुकार रहा है? अचरज से उसने अभी अभी रुकी गाड़ी के स्लीपर डिब्बे की खिड़की की ओर देखा। एक फौजी उधर इशारे से बुला रहा था। दौड़कर वह डिब्बे में चढ़कर यात्री तक पहुंचा। फौजी के एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा था, दाहिने पांव में भी जख्म थे। बैसाखी के सहारे वह अपनी सीट से उठा तो इस्माइल ने उसे सहारा देकर प्लेटफार्म पर उतारा। बैग संभाला। दौड़कर स्टेशन मास्टर के ऑफिस से व्हील चेयर ले आया। 

पहचाना नहीं इस्माइल? मैं दिनेश, पाटीदार जी का बेटा हूं। तुम्हारी कक्षा में तो पढ़ता था। भूल गए क्या? फौजी ने मुस्कुराते हुए कहा।

इस्माइल हतप्रभ था। खुश भी था। उसे लगा आज वह किसी यात्री का बोझा नहीं ढो रहा है बल्कि एक यात्री ने उसे नाम से पुकारकर उसका अदृश्य बोझ उसके ऊपर से उतार दिया है। 

रेलगाड़ी धीरे धीरे स्टेशन छोड़ गई।

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ब्रजेश कानूनगो