Tuesday, December 8, 2015

केकड़ा

कहानी
केकड़ा
ब्रजेश कानूनगो  

शहर से थोड़ा दूर भले ही रहने आ गए थे हम मगर बहुत शान्ति थी इधर. मेरी तबीयत भी ठीक रहने लगी थी. कौशल कहते थे यहाँ आकर हमने शहर के ‘कैंसर’ से भी मुक्ति पा ली थी. जब भी किसी भीड़ भरे चौराहे से गुजरते, वे कहते ‘देखो वसुधा, केकड़ा आ गया’. उनके अनुसार चौराहा केकड़े का पेट और उससे जुडी गलियाँ केकड़े के पैर होते थे.

शुरू-शुरू में कुछ अकेलापन लगा यहाँ आकर लेकिन जब कुछ और परिवार आकर रहने लगे तो सब ठीक हो गया था. टाउनशिप में सब सुविधाएं थीं. किराना दूकान से लेकर क्लब हाउस और एक छोटा-सा मंदिर भी. कौशल जानते थे कि मैं सुबह-सुबह स्नान के बाद मंदिर में पूजा-अर्चना और देव दर्शन के बाद ही दूसरे काम हाथ में लेती हूँ. इसीलिए उन्होंने बायपास की इस टाउनशिप में फ्लेट को प्राथमिकता दी थी. और फिर यहाँ से ‘सेंटर’ भी पास पड़ता था जहां हर तीन महीने में मुझे चेकअप के लिए जाना जरूरी था. पांच वर्षों तक निगरानी आवश्यक थी ताकि बीमारी नियंत्रण में रहे.

कई दिनों से सोच रही थी कि शहर में जा कर एक बार सराफा और राजबाड़ा घूम आऊँ. मौसम भी बड़ा सुहावना बना हुआ था. सावन के महीने में सब कुछ वैसे भी बहुत भला लगता है. मेरे जैसी किसी आस्तिक को तो फिर शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करने से ही असीम संतुष्टि मिल जाती है. मैंने कौशल से जूने शहर चलने को कहा तो पहले तो वे हिचकिचाए. शहर की भीड़ में अब इस उम्र में कुछ परेशानी-सी  महसूस होती है उन्हें. मगर मेरी खुशी उनके लिए सर्वोपरि. अतः राजी हो गए.

थोड़ी ही देर में हम दोनों खुशनुमा मौसम और मारुति के सफ़र का भरपूर मजा ले रहे थे.
‘वसुधा,याद है तुम्हे आज हमारी कार की सालगिरह है!’ कौशल ने स्टीयरिंग से एक हाथ उठा कर मुस्कुराते हुए कहा.
‘अरे वाह! बधाई. मुझे तो याद ही नहीं रहा. मगर आप ज़रा आगे सड़क पर ध्यान दे कर गाडी ड्राइव करिए’. कौशल वैसे तो बहुत इतमिनान से अच्छी तरह ड्राइव करते हैं मगर मैं उन्हें टोके बगैर रहती नहीं.

रिटायरमेंट के थोड़ा पहले उन्होंने कार चलाना सीख कर बहुत अच्छा काम किया था. हालांकि इस महानगर में जब शुरू में पर्यटन के लिए आये थे तो कहते थे ’यहाँ यदि ट्रांसफर हो जाए तो मेरे लिए तो बहुत मुश्किल होगा वसुधा! मैं तो स्कूटर भी नहीं चला पाउँगा.’ और सचमुच हुआ भी यही.  जब वाकई यहाँ ट्रांसफर होकर आये तो दो महीने के भीतर ही उनके बाँए हाथ में दो  माह के लिए प्लास्टर पट्टा चढ़ गया था. फिर तो ऐसे रमें इस शहर में कि बस यहीं के हो गए. शहर की तासीर से एकरस होते गए.

बायपास को पार कर हम शहर की लिंक रोड पर आ गये थे. कौशल मजे लेकर कार ड्राइव कर रहे थे. मदन मोहन के संगीत वाले गीतों का एक कैसेट हमारी कार के प्लेयर में लगभग स्थायी रूप से बजा करता है.  बच्चे आते थे तब ही वह बदलता था. उनके जाते ही कभी मदन मोहन तो कभी कुमार गन्धर्व. बस और कुछ नहीं. नई नई नौकरी में बच्चों का बार-बार इधर आना संभव भी नहीं होता है. और इस नई टेक्नोलोजी पढ़े हुए लोगों के लिए तो इधर कोई वैसा जॉब भी नहीं कि यहाँ आकर रहें हमारे पास.

उन दिनों तो तीन चार महीने ही हुए होंगे बेटे की नौकरी को , जब मेरी बीमारी का पता चला था. यह बहुत अच्छा रहा कि बीमारी प्रारम्भिक स्टेज पर ही थी. ख्यातिप्राप्त डॉ जोसफ ने ऑपरेशन करके प्रभावित अंग को ही निकाल दिया था. बेटा कब तक पास रहता.  पंद्रह दिन सेवा करके उसे लौटना ही पडा . कौशल जानते थे कि इलाज लंबा चलेगा. कीमो थेरेपी, रेडियेशन और बाद की देखभाल. वे चिंतित तो थे ही उनके बैंक के मर्जर ने उनकी चिंता और बढ़ा दी. घर से तीन सौ किलोमीटर दूर ट्रांसफर हो गया उनका. विलयीकरण की प्रक्रिया में दोनों बैंकों के प्रबंधन में ही इतनी समस्याएँ आ रहीं थी कि कौशल के अटेचमेंट के निवेदन पर ध्यान ही नहीं दिया गया. कौशल ने बहुत सोच विचार कर आखिर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का रास्ता चुन लिया.
और यह कार ‘मारुति-800’ हमारे घर की भरोसेमंद सदस्य बन गयी. भले ही पांच साल पहले रिटायर्ड हुए अपने साथियों से भी थोड़े ज्यादा वरिष्ठ दिखाई देने लगे हैं मगर इतनी अधिक उम्र भी नहीं है कौशल की. कार बहुत इत्मीनान से चलाते हैं. मैं अच्छी तरह जानती हूँ उनके इस ढलान का कारण. शायद मेरी खुशी में अभी भी वे अपना ख़याल नहीं रख पाते. आज भी कहते ही चल दिए थे साथ में... जूने शहर की ओर.. मेरे साथ... मदन मोहन की गजलों को गुनगुनाते हुए.
‘पता है वसुधा! ये बाय पास क्यों बनाया जाता है, शहर के बाहर.’ कौशल ने मेरी तंद्रा तौडते हुए पूछा.
‘शहर के विकास के लिए और क्या. शहर बड़ा होने लगता है तो नई कोलोनिया जरूरी हो जाती है. कुछ लोग योजना की भनक लगते ही पहले से ही सस्ते दामों पर आसपास की जमीन  किसानों से खरीद लेते है. फिर विकास के साथ मुनाफ़ा कमाते हैं’ मैंने अपनी समझ से कहा.
‘ये तो है ही वसुधा, मगर असल में बायपास बनाने का मतलब शहर की सर्जरी करना है. जब शहर का दिल संकरी गलियों और पतली सडकों के कारण अवरुद्ध होने लगता है तो शहर को हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है. बायपास बनाकर शहर की रक्त वाहिनियों में यातायात के संचरण को सुगम किया जाता है.’ कौशल ने जोरदार ठहाका लगाया.

हम शहर की सड़क पर आ गए थे. भीड़ और चहल पहल आज कुछ ज्यादा दिखाई दे रही थी. ‘ओह! आज तो सोमवार भी है सावन का.’ मुझे याद आया. हम प्रमुख चौराहे के नजदीक से गुजर रहे थे. हालांकि सिग्नल की बत्तियाँ अपने निर्धारित समय पर जल बुझ रही थीं मगर इसका कोई  महत्व फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा था. यातायात के सिपाही और कुछ पुलिस कर्मचारियों ने व्यवस्था अपने हाथ में ले रखी थी. जिस मार्ग पर हमें आगे जाना था उधर बेरिकेट्स लगा दिए गए थे. कोई ‘शोभा यात्रा’ गुजर रही थी उधर. पीले वस्त्रों में सिर पर कलश उठाए सैकड़ों स्त्रियाँ  पेंग्विन पक्षियों के झुण्ड की तरह मंगल गीत गाते हुए मंथर गति से आगे बढ़ रहीं थीं.

चौराहे की दो तरफ स्वागत मंच बने थे जिनसे कुछ नेता टाइप व्यक्ति शोभायात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे थे. पुलिस जवान मुस्तैदी से गाड़ियों को मुख्य सडकों से जुडी गलियों की ओर डाइवर्ट कर रहे थे. इसके कारण अफरा तफरी फ़ैली थी, लंबा और घना जाम चौराहे पर लग गया था.

कौशल ने किसी तरह अपनी कार पास की गली की ओर घुमाना चाही तो साइड मिरर एक बाइक सवार के कंधे से जा टकराया. वह वहीं रुककर हमें गालियाँ देने लगा. उसके रुकने से और गाड़ियां भी रुक गईं. गाड़ियों के इंजनों और हॉर्नों की चिल्ल-पों ऐसी मची कि कौशल को घबराहट सी होने लगी. हमारी गाडी बुरी तरह फंस गयी थी. न आगे जा पा रहे थे न गाडी को पीछे ले जा पा रहे थे. एक ऑटो चालक ने खुद खड़े हो कर बीच से रास्ता बनाया और किसी तरह हमने एक गली में प्रवेश कर लिया.

यह गली भी पूरी तरह आगे से जाम थी. हुआ यों था कि उसमें भी अगले चौराहे से डायवर्ट होकर वाहन आ रहे थे. कौशल के चेहरे पर पसीने की बूंदे छलक आईं थी. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था कि करें तो क्या करें.
‘वसुधा, मुझे घबराहट सी हो रही है..सीने में जैसे कुछ फंस गया है..’ कहते कहते कौशल का हाथ हॉर्न के स्विच पर ठहर गया. कार की चीख इतनी तेज गूँज रही थी कि उसके आगे सारा कोलाहल जैसे बे-आवाज हो गया.

कौशल को ही नहीं, शहर को भी दिल का दौरा पडा था. बड़े अस्पताल का चमचमाता बोर्ड ऊंची इमारत पर बहुत आसानी से दिखाई दे रहा था. मगर अस्पताल तक पहुँचना इतना आसान नहीं था. तगड़ा ट्रेफिक जाम लगा था. धड़कने रुकने को अभिशप्त थीं.  

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018
    
        
            
     
 
      


मस्ती टाइम


कहानी
मस्ती टाइम
ब्रजेश कानूनगो 

लिली में काफी फूल आ गए थे. पानी देने के बाद नीबू के पौधे को सींचने लगा तो मेरे सामने वही सूखा गमला आ गया. यह वही गमला था जिसमें केवल मिट्टी भरी थी. मैं उसमें पानी नहीं डालता था .सोचता था  कोई अच्छे फूल का बीज या कलम लगा दूंगा. यही गमला हमारे ‘मस्ती-टाइम’ का कारण बन गया था. अमोल मेरे साथ छत पर आता तो मेरे हाथ से बाल्टी-मग  झपट लेता. खुद ही नल के नीचे रखकर पानी भरता. यहीं से हमारी थोड़ी झड़प शुरू हो जाती थी. वह बाल्टी को पानी से लबालब तब तक भरता रहता जब तक कि वह बाहर निकलने नहीं लगे. मैं रोकता, नल बंद कर देता, वह हंसता और फिर से नल खोल देता. मुझे चिढाता. उसे पानी से खेलने में बहुत मजा आता. फिर मग से गमलों में पानी देता, तब भी इतना पानी देता जब तक कि वह गमले से ओवर फ्लो न होने लगे. मैं उसे समझाता कि गमले में इतना पानी मत डालो मगर वह नहीं रुकता. यहाँ तक कि जो गमले खाली पड़े थे उनमें भी पानी भर देता. मुझे चिढ भी होती और उस पर प्यार भी उमड़ आता. रोज यही होता. खाली गमलों को वह पूरा पानी से भर देता और शरारत से मेरी और देखता, हंसता..खिलखिलाता. सब गमलों में पानी डालने के बाद थोड़ा पानी बाल्टी में बचा लेता और मेरी ओर उछालते हुए कहता-‘दादा! मस्ती-टाइम’..!! मैं उसे डपटता तो और नजदीक आकर पानी उडाता..’ पूरी छत और मुझे भिगोने के बाद उसका मस्ती टाइम आखिर ख़त्म होता.

जब तक वह रहा घर में टीवी नहीं देखा गया था और अखबार बिना तह खुले रैक पर जमा होते गए थे. सुबह-सुबह अमोल बहुत उत्साह से मेरे हाथ से चाबी छीनकर गेट का ताला खोल  देता और चेन घुमाते हुए सीधे बाहर सड़क पर दौड़ पड़ता था..वह आगे-आगे मैं उसके पीछे-पीछे. सुबह की सैर को निकले कॉलोनी वासी  हमारी इस भाग-दौड़ को बहुत कुतूहल से देखने लगते थे.
‘पोता आया है शायद शर्माजी का..’ जैसे शब्द मुझे बहुत अद्भुत अनुभूति से भर देते थे.

केनेडा जाने के बाद इस बार बेटे का परिवार लगभग तीन साल बाद ही घर आ पाया था. इसके लिए किसी को दोष नहीं दिया जा सकता. परिस्थितियाँ ही कुछ ऐसी बनती रही कि वे लोग चाहकर भी न आ पाये. नौकरी की भी अपनी मजबूरियां होती हैं. ये भी सच है कि इस बीच हमारा वहां जाना भी संभव नहीं हो सका. हालाँकि ‘स्काइप’ या ‘जी-टॉक’ के जरिये रोज ही लेपटॉप पर मिलना हो जाता था. लेकिन  अमोल स्क्रीन पर बहुत कम आता.. कुछ झिझक रहती थी .. बहुत कहने पर बस ‘हाय-बाय’ करके अदृश्य हो जाता था.

यह तो उसके यहाँ आने पर ही स्पष्ट हुआ कि हमारे सामने हिन्दी बोलने में होने वाली दिक्कत के कारण वह सामने नहीं आता था. हिन्दी आसानी से समझ लेता था लेकिन टोरंटो के स्कूल में अपने दोस्तों के साथ अंगरेजी में दिन भर बातचीत की आदत के कारण हिन्दी में बोलना उसके लिए कठिन हो गया था.  यह दिक्कत शायद वैसी ही रही होगी जैसे अंगरेजी में सारी पढाई करने के बावजूद गैर हिन्दी भाषी व्यक्ति से सामना होने पर मुझे होती है.  कनाडा जाने से पहले जब वह यहाँ था तब उसकी भाषा  सुनकर हमें बड़ा सुखद आश्चर्य होता था. ‘डोरेमान’ और अन्य कार्टून चरित्रों के हिन्दी में डब संवादों की वजह से हिन्दुस्तानी के इतने बढ़िया शब्द बोलता था कि हम हत-प्रभ रह जाते थे.

अभी दस दिनों में उसने हमसे हिन्दी में बात करने में खूब मेहनत की थी. बात करने में उसकी कोशिश साफ़ दिखाई देती थी. धूल खा रही शतरंज और कैरम के दिन फिर गए थे. मोहरों के अंगरेजी नामकरण से हमारा पहला परिचय हुआ. वरना हमारे लिए तो वजीर, राजा, हाथी, घोड़ा, ऊँट, प्यादे ही हुआ करते थे.

कॉलोनी के हमउम्र बच्चों के बीच भी वह बहुत पसंद किया जाने लगा. आम तौर पर हिन्दी में बात करते बच्चों को भी स्कूल के अलावा अंगरेजी में बतियाने में खूब मजा आ रहा था. शुरू शुरू में जब अमोल कुछ नहीं बोल पा रहा था तो अटपटा लगा लेकिन जब पता चला कि वह केनेडा से आया है तो खुलकर अंगरेजी में बातचीत करने लगे. इधर अमोल की झिझक भी टूटने लगी, वह भी हिन्दी ही बोलने की कोशिश करने लगा. हिन्दी दिवस के दिन जब मैं एक कार्यक्रम के मुख्य आतिथ्य के बाद घर लौटा तो गेंदे की अपनी माला मैंने सहज अमोल के गले में डाल दी.

उनके वापिस लौटते ही हमारा ‘मस्ती-टाइम’ ख़त्म हो गया. रोज की तरह छत पर गमलों में लगे पौधों में पानी दे रहा था. सब कुछ पहले जैसा हो गया. वही नियमित दिनचर्या हो गयी जो उनके आने के पहले हुआ करती थी. सुबह उठते ही मेन गेट पर लगी चेन और ताला खोलना, दूध के पैकेटों की थैली और अखबारों को भीतर लाकर घूमने निकल जाना. फिर पत्नी और खुद के लिए चाय बनाकर टीवी पर रात को देखे समाचारों को अखबारों में पुनः पढ़ना. छत पर रखे गमलों में पानी डालना, पौधों की देखभाल करना. हुआ तो शाम को किसी साहित्यिक-सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेना और देर रात तक टीवी पर समाचार-बहसें आदि देखते हुए सो जाना.


न जाने क्या सोंचकर मैंने भी अमोल की तरह मिट्टी भरे गमले में पानी डालने को सहज ही मग आगे बढ़ा दिया. अचंभित था सूखे गमले में गेंदे के कुछ पौधों का अंकुरण हो आया था. 


ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018




  

 


संगीत सभा

कहानी
संगीत सभा
ब्रजेश कानूनगो

साहित्य समिति के शिवाजी हॉल में आज सामान्य दिनों से कुछ ज्यादा चहल-पहल दिखाई दे रही थी। आमतौर पर जो बीस-पच्चीस कुर्सियाँ पडी रहती हैं वे भी बमुश्किल ही भर पाती थीं। साहित्य गोष्ठियों का विस्तार भी समिति के परिसर की तरह छोटा होता गया था और शिवाजी हॉल तक ही सिमट गया था। शिवाजी हॉल में साहित्य होता था और शेष परिसर में व्यवसाय। समाज में साहित्य के बने रहने के लिए बाजार में प्रोफेशनल नजरिया रखना समय की मांग थी। बहरहाल, शिवाजी हॉल में आज अतिरिक्त कुर्सियाँ लगाईं गईं थीं। कुर्सियों के आगे मंच के सामने कुछ दरियाँ भी बिछा दी गईं थी।

हरिहर पटेल जी को पूरा विश्वास था कि टिपानिया जी को सुनने बडी संख्या में लोग आएंगे। यों भी प्रहलाद सिंह टिपानिया के प्रशंसक मालवा-निमाड में कम नही थे, और अब जब सरकार ने उन्हे पद्मश्री से सम्मानित कर दिया था तब महानगरीय और एलिट वर्ग में भी उन्हे सुनना स्टेटस की बात हो गई थी। लोक गायक के मुख से कबीर को सुनना और फिर मित्रों परिचितों को बताना कि हम टिपानिया जी को सुनकर आये हैं अब ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया था। टिपानियाजी भी भले ही गाँव-देहात के आदमी थे मगर दुनिया देख चुके थे सो कबीर को गाने के पहले बता देते थे कि पद या भजन में कबीर ने क्या कहा है। और फिर श्रोताओं को इससे कोई मतलब नही रह जाता था कि वे क्या गा रहे हैं। लोग उनकी फक्कड ओजस्वी आवाज के जादू में खो जाते और तानपूरा, हारमोनियम, मंजीरों, ढोलक से निकलते लोक संगीत के साथ बहते चले जाते थे।

वैसे शिवाजी हॉल में किसी भी कार्यक्रम का होना आयोजकों के लिये बडे सम्मान की बात होती है। संचालकगण भी यह बताना कभी नही भूलते कि संस्था की स्थापना को सौ वर्षों से भी अधिक का समय हो गया है, और यह भी कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं इसकी स्थापना के समय यहाँ पधारे थे। स्टेज के ठीक पीछे की दीवार पर गाँधीजी की तस्वीर सदैव श्रोताओं का ध्यान खींचती थी, जिसमें वे काठियावाडी पगडी पहने हुए थे।

हरिहरजी का अनुमान ठीक था। छह बजने के काफी पहले ही बडी संख्या में लोग आने लग गए थे। माइक पर उन्हे घोषणा भी करनी पडी कि जो लोग नीचे बैठ सकते हैं वे दरियों पर बैठ जाएं ताकि बुजुर्गों,महिलाओं को कुर्सियों पर जगह दी जा सके। मैं स्वयं कुर्सी छोड ही रहा था कि हरिहरजी ने मेरी पीठ पर हाथ रख दिया। मैं दरी पर आ बैठा। बहुत से लोग दरी पर आ बैठे। कार्यक्रमों में नियमित आने वालों की संख्या इनमें अधिक थी। नए लोग कुर्सियों की जुगाड में लगे रहे।
प्रहलाद सिंह टिपानियाजी की ठोस लेकिन लोचदार आवाज से पूरा हॉल गूंज रहा था। संगीत के लिए शायद व्यवस्था अनुकूल नही थी फिर भी लोक वाद्यों की थाप में सब मुग्ध थे। टिपानिया जी कबीर को गा रहे थे। मगर कबीर का मालवीकरण भी कुछ हो गया था..फिर भी कबीर तो थे ही वहाँ।

प्रहलाद जी को सुनते हुए मुझे ओंकारजी याद आ गए। ओंकारजी को ही सबसे पहले मैने कबीर गाते हुए सुना था। रेडियो पर। शायद छठी-सातवीं कक्षा में रहा होंगा। ओंकारजी हमारे मुहल्ले में रहते थे अपने परिवार के साथ। बेटा कैलाश मेरे साथ खेला करता था। बेटी बडी थी सुधा, उस वक्त शायद दसवीं-ग्यारहवीं में पढती थी। बहुत अच्छा गाती और नाचती थी। केशव मन्दिर की काकण आरती के समय उसको गाते-नाचते देखा था। लेकिन उसकी इस प्रतिभा के कारण वह ज्यादा चर्चित नही हुई बल्कि जब एक युवा ठेकेदार अपनी प्रीमियर पद्मिनी कार से मुहल्ले में नियमित मन्डराने लगा तब सुधा की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ। पिता तो बेचारे अपनी मिल की बदलती पालियों की थकान को तानपुरे के साथ कबीर गाकर मिटाने का प्रयास करते रहते थे, लेकिन सुधा की माँ लीला बाई चौकन्नी हो गई थी। खैर!

रेडियो पर गाना उन दिनों बहुत प्रतिष्ठा की बात हुआ करती थी। लोक संगीत के भी बहुत से  कार्यक्रम प्रसारित होते थे। खेती-गृहस्थी, श्रमिक जगत आदि में गाँव-देहात से लेकर मिलों-कारखानों में काम करने वाले किसानों,मजदूरों की प्रतिभाओं को प्रदर्शन का मौका मिला करता था। ओंकारजी बहुत अच्छा गाते थे। एक बार मिल में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में पंडित कुमार गन्धर्व को अतिथि के रूप में बुलाया गया था। उन्होने जब ओंकारजी को गाते हुए सुना तो बहुत प्रभावित हुए। घर भी बुलाया उन्हे। कुमार जी को सुबह सुबह रियाज करते भी ओंकार जी ने देखा था। फिर तो ये सिलसिला बना रहा। मालवा में कबीर परम्परा के गीतों को खोजने और उन्हे शास्त्रीय आधार पर गाने का बहुत बडा अभियानसा कुमार गन्धर्व जी ने उस वक्त छेड रखा था। ओंकारजी जैसे कलाकारों को प्रोत्साहन मिलता गया।

गाडी धीरे-धीरे हाँको मेरे राम गाडी वाले..शिवाजी हॉल में प्रहलादजी गा रहे थे। स्मृति में ओंकारजी गा रहे थे रेडियो पर, श्रमिक जगत कार्यक्रम में। मेरे घर की बैठक में दरी पर ओंकारजी, कैलाश,सुधा,उसकी माँ,इस्माइल चाचा सहित हमारा परिवार और घर में आए मेहमान सब मंत्र मुग्ध सुन रहे थे। आज बहुत दिनों बाद घर में रेडियो सुना गया था। दरअसल, 11 मई को बापूसाहब का स्वर्गवास हुआ था। तेरह दिन का शोक चल रहा था घर में। लेकिन 24 मई को पंडित नेहरू नही रहे थे। रेडियो पर समाचार सुनने के लिए दादाजी के शोक को भुलाकर राष्ट्रीय शोक के बारे में सबकी रुचि बढ गई थी। उसी शाम ओंकारजी का भजन प्रसारित होना था। यह भी एक विडम्बना थी कि ओंकारजी जिस व्यक्ति को अपना गाना सुनाना चाहते थे वही दुनिया से चला गया था। बापू साहब याने मेरे दादाजी उसी मिल के मेनेजर थे जिसमें ओंकारजी श्रमिक थे। दादाजी ने बहुत से गरीब लोगों को अपनी मिल में नौकरियाँ दी थी। ओंकार जी भी उन्ही में से एक थे। बापू साहब न सिर्फ नगर की शान थे बल्कि मिल का सेठ भी उनकी बहुत मानता था। मिल ने घर से दस किलोमीटर दूर स्थित कपडा मिल तक आने-जाने के लिए उनके लिए जाफर भाई का तांगा रखा हुआ था। यह भी बडा दिलचस्प हुआ करता था हमारे लिए कि जब सुबह बापू साहब को मिल छोडकर आने के बाद जाफर भाई बस स्टेंड से किसी सवारी को लेकर मुहल्ले से गुजरते तो घोडा हमारे घर के आगे जाने से इंकार कर देता था।   तब जाफर भाई तांगे से उतरकर घोडे को लगाम से खींच कर थोडा आगे बढाते। घर से आगे जाने के बाद ही घोडा सडक पर आगे बढता था।

प्रहलादजी अब कबीर की कोई उलटबासी सुना रहे थे। ओंकारजी के जीवन में भी एकबार  उलटबासी घट गई थी, एक दिन युवा ठेकेदार की प्रीमियर पद्मिनी में सवार हो कर सुधा अचानक गायब हो गई। बाद में किसी ने बताया प्रीमियर पद्मिनी सूरत की ओर गई थी। ओंकारजी कबीर में लीन हो गए थे। महाराज की धूनि में उन्होने अपने को रमा लिया था। गांजे में डूबे ओंकारजी के पास उन दिनों कुछ सटोरिए उनकी देह भाषा और उंगलियों से किसी गणित को समझने का प्रयास करते दिखाई देते थे।

सुधा की माँ हमारे घर के बर्तन साफ करने और साफ सफाई का काम करने लग गई थी। साल-दो साल में छिपते छिपाते सुधा हमारे घर के पिछ्वाडे के दरवाजे से अपनी माँ से मिलने आ जाया करती थी। कुछ सालों बाद हमने अपना शहर छोड दिया.. इन्दौर आ गए। कई बरस बीत गए। रेडियो ओंकारजी की तरह हो गया या ओंकारजी रेडियो की तरह कुछ समझ नही पाया मैं । पर यह जरूर लगता है कि दोनों के वैसे दिन फिर कभी नही आए।

दरी पर बैठे-बैठे पैर थोडे अकड गए थे। मैने स्थिति बदलते हुए पास बैठे व्यक्ति को देखा। सुधा की तरह एक शक्ल नजर आई। कौन हैं आप? कहाँ रहती हैं? मैने पूछा।
जी! मैं रिसर्च कर रही हूँ कबीर गायन परम्परा पर.. सूरत में रहती हूँ.. मेरी माँ मालवा की थीं.. प्रहलाद जी को सुनने के लिए यहाँ चली आई।
मेरी आवाज जैसे भर्रा गई थी। चाहकर भी कह नही पाया- रिश्ते में मैं तुम्हारा मामा लगता हूँ!
प्रहलादजी गा चुके थे। शिवाजी हॉल तालियों से गूंज रहा था।

ब्रजेश कानूनगो
503,गोयल रिजेंसी, चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इन्दौर-452018
मो.न.09893944294