ब्रजेश कानूनगो : रचनात्मक पृष्ठभूमि और रचना प्रक्रिया
यह मेरा सौभाग्य रहा कि जो वातावरण किसी संवेदनशील व्यक्ति को सृजन की दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित और प्रेरित करता है वह मुझे अपने बचपन में ही मिल सका. घर में पढ़ने लिखने का वातावरण था.काका श्री यतीश कानूनगो विज्ञान, गणित के शिक्षक थे लेकिन साहित्य,चित्रकला आदि में उनकी गहरी रुचि थी। मैं उनका शिष्य भी था तो उनसे खूब सीखने-समझने को मिला । उस जमाने में स्कूलों में लेखन की प्रतियोगिताएं बहुत हुआ करती थीं। भरपूर प्रोत्साहन मिलता, खूब भाग लेता। विजेता रहा तो हौसला बढ़ता गया. इसी पारिवारिक प्रोत्साहन से लिखने पढ़ने के संस्कारों के बीज शायद मेरे भीतर तभी से अंकुरित होने लगे थे.
प्रारम्भ में छोटी-छोटी बाल कविताएँ, कहानियां अपने आसपास की घटनाओं को देख-देख कर लिखता और उन्हें नईदुनिया अखबार के ख़ास पन्ने ‘बच्चों की दुनिया’ में भेज देता. वे छपने लगीं तो और और अधिक उत्साह से लिखने लगा. थोड़ा विचार संपन्न हुआ तो पढी हुई सामग्री और समाज में होने वाली घटनाओं, कठिनाइयों पर अपनी प्रतिक्रिया लिख डालता और ‘संपादक के नाम पत्र’ स्तम्भ में भेजने लगा. लगभग प्रति सप्ताह ही कोई न कोई पत्र प्रकाशित हो ही जाता था. उन दिनों अखबारों में सम्पादक के नाम लिखे पाठकों के पत्रों का बहुत महत्व हुआ करता था. विशेषकर नईदुनिया में छपे पत्रों का बड़ा वैचारिक और बौद्धिक महत्व होता था. पत्रों पर भी प्रतिक्रियात्मक पत्र छापते. कई लम्बी-लम्बी बहसें हुआ करती थीं. मेरा कुछ छप जाता तो मुहल्ले, स्कूल और कस्बें में बहुत प्यार और सम्मान मिलता।
मेरे लिखे प्रतिक्रियात्मक पत्रों में कभी-कभी थोड़ा हास्य और कटाक्ष का भाव रहा करता था. उन दिनों नईदुनिया में विख्यात पत्रकार श्री राजेन्द्र माथुर सम्पादक हुआ करते थे. नईदुनिया के पत्र स्तम्भ में अक्सर मेरे व्यंग्यात्मक लघु पत्र भी प्रकाशित होते रहते थे. मुझे एक दिन यह देखकर बहुत आश्चर्य मिश्रित खुशी हुई कि मेरे एक लघु व्यंग्य पत्र को उन्होंने ‘अंतिम-पत्र’ उपशीर्षक देते हुए ख्यात कार्टूनिस्ट श्री देवेन्द्र शर्मा के बनाए कार्टून के साथ बॉक्स में प्रकाशित कर नई शुरुआत कर दी. इसके बाद एक बार फिर चकित होने का मौक़ा उन्होंने मुझे दिया. उन्होंने मेरे एक पत्र को लौटाते हुए टिप्पणी लिखी कि इसे आप थोड़ा विस्तार दें. मैंने उनके निर्देश के अनुसार अपने पत्र को विस्तार दिया. और उस रचना को उन्होंने नईदुनिया में पत्र से अलग स्वतन्त्र व्यंग्य लेख के रूप में प्रकाशित किया. यहाँ मैं इतना अवश्य बता देना चाहता हूँ कि श्री राजेन्द्र माथुर जी से मेरी कभी कोई मुलाक़ात नहीं हुई थी. इस बीच मेरी रचनाएँ धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सन्डे मेल , रविवार, वामा आदि में भी प्रकाशित होने लगी थीं.
नईदुनिया और अन्य अखबारों के स्तंभों में नियमित व्यंग्य लेखन में मेरी थोड़ी-थोड़ी पहचान बन रही थी. नईदुनिया में ‘अधबीच’ जैसे दिलचस्प और लोकप्रिय कॉलम की शूरुआत हो चुकी थी. परसाई जी के ‘सुनो भाई साधू’ और शरद जी के ‘..और शरद जोशी’ के कॉलमों के विराम के बाद राजेन्द्र माथुर जी ने इस स्तम्भ की विवेकपूर्ण शुरुआत करके नए व्यंग्य रचनाकारों को प्रोत्साहित करने का काम किया था. इस कॉलम की शुरुआत के पहले दिन ही इसमे मेरा आलेख ‘एटनबरो का गांधी और सफलता के देसी नुस्खे’ दिनांक 21 अप्रैल 1981 को प्रकाशित हुआ . इसके बाद नवभारत टाइम्स के ‘चौखट’. दैनिक हिन्दुस्तान के ‘कुल्हड़ में हुल्हड़’, जनसत्ता के रविवारीय आदि में नियमित व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित होती गईं. पहला व्यंग्य संग्रह वरिष्ठ कथाकार, व्यंग्यकार श्री सूर्यकांत नागर जी के प्रोत्साहन से दिशा प्रकाशन दिल्ली से ‘पुनः पधारें’ शीर्षक से सन 1995 में आया. यह संग्रह मैंने स्व. शरद जोशी और स्व राजेन्द्र माथुर जी को समर्पित किया है. नईदुनिया में श्री सूर्यकांत नागर जी जब व्यंग्य के साप्ताहिक कॉलम ‘खुला खाता’ का सम्पादन किया करते थे तब उनकी प्रेरणा से लम्बे कथात्मक व्यंग्य लेख लिखने में बहुत संतुष्टि का अहसास होने लगा था. मेरे लेखकीय विकास में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण रही है.
जिन्हें पढ़-पढ़ कर व्यंग्य विधा में लिखने की मुझे सच्ची प्रेरणा मिली उनमें स्व शरद जोशी और श्री हरिशंकर परसाई सबसे आगे हैं. जिन दिनों व्यंग्य के महापुरुष स्व शरद जोशी जी को पद्मश्री घोषित हुई थी तब विख्यात नवगीतकार प्रो नईम जी की कृपा से मैं भी एक ऐसे कार्यक्रम में था जहां शरद जी का सम्मान किया गया था. शाजापुर में लायंस क्लब के एक कार्यक्रम में चूंकि शरद जी से रचनाएं सुनी जानी थी सो डग्गे-मग्गे की तरह मुझे और उस समय शाजापुर महाविद्यालय में पदस्थ आलोचक एवं व्यंग्यकार प्रो.बी एल आच्छा जी को भी रचना पाठ का अवसर मिल गया. यह मेरा पहला मौक़ा था जब मैंने किसी मंच से रचना पाठ किया था. देर रात शरद जी ने मुझे अपनी कार से देवास के मेरे घर छोड़ा था. यात्रा में मंच पर प्रभावी रचना पाठ के जो सूत्र उन्होंने मुझे समझाए थे वे मेरी अमूल्य निधि हैं।
‘इंदौर बैंक’(अब स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया) में सहकर्मी के रूप में कुमार अम्बुज जैसे दोस्त मिल गए तो अपनी बातें कविता में कहने लग गया। वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता श्री आलोक खरे का सानिध्य मिला तो प्रतिबद्धता और समाज सेवा में रचनाकार की भूमिका के सही अर्थ समझ में आये. रचना शिविरों में सर्वश्री भगवत रावत, चंद्रकांत देवताले जी और कमला प्रसाद जी का मार्ग दर्शन रचना शिविरों में मिला तो कविताओं को संवारने लग गया। समकालीन कविताओं का खूब अध्ययन किया. चार कविता संग्रह भी आये. लेकिन व्यंग्य लेखन भी साथ-साथ चलता रहा. पुनः पधारें (1995 ) के बाद क्रमशः सूत्रों के हवाले से (2014),मेथी की भाजी और लोकतंत्र(2017),पाषाणपुष्प का किस्सा (2021) आए. एक उपन्यास के साथ साथ एक यात्रा वृतांत तथा एक संस्मरणों का संग्रह भी पाठकों ने पसंद किया है. यही सब रचनात्मक रूप से सक्रीय रहने की ऊर्जा प्रदान करता रहता है.
पत्नी कुमुद जी का सहयोग और अग्रज,एकता,अभिरुचि,संकल्प जैसे पुत्र,पुत्री,पुत्रवधू,बेटे जैसे दामाद और पौत्र अक्ष बाबू की रचनात्मक समझ और सक्रियता जीवन में संतोष की वजह बन जाता है. खुशी देता है.
रचना शिविरों में जो सीखा वह कार्यशालाओं में खुद सिखाने लग गया। इसलिए लिखते हुए सीखा, सिखाते हुए..सीखता रहा...अब भी सीख रहा हूँ। लेकिन एक बात जो मैं अपने लिखने में हमेशा बनाये रखने की कोशिश करता हूँ उनमें आदर्श जीवन मूल्य, समाजवादी और प्रगतिशील विचारधारा और मनुष्य के प्रति प्रतिबद्धता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण के लिए अपने आग्रह। इसी लेखकीय दृष्टि से मैं अपनी दुनिया और समाज को अभिव्यक्त करने की कोशिश में लगा रहता हूँ।
अपनी रचना प्रक्रिया को साफ साफ अभिव्यक्त करना मेरे लिए ही नहीं किसी भी रचनाकार के लिए रचना लिखने से भी ज्यादा कठिन काम होता है।
मेरे भीतर रचनात्मकता के बीज जो पहुंचे वे मेरी रचनात्मक पृष्ठभूमि में विस्तार से व्यक्त करने की कोशिश की है। घर में साहित्यिक वातावरण का बने रहना मेरी रचनात्मक मनःस्थिति के लिए उत्प्रेरक का कार्य अभी भी करता है। मेरी नव सृजित कृति में परिवार और दोस्तों की रुचि भी मेरे अगले लेखन के लिए प्रोत्साहित करती है। प्रशंसा और आलोचना को मैं समानरूप से ग्रहण करता हूं। किसी भी एक व्यक्ति द्वारा भी कोई संदेह व्यक्त किया जाता है तो मैं उस पर विचार करता हूं, संभव हुआ तो संशोधित भी करने की कोशिश अवश्य करता हूं। हरेक रचना अपने अगले प्रारूप में बेहतर होती जाती ही है। अनेक प्रारंभिक रचनाओं के प्रकाशन के उपरांत भी कई बार मैं उनका पुनर्लेखन करता रहा हूं, मैने पाया कि जो बाद में स्वरूप सामने आया वह मुझे चमत्कृत कर गया है।
मेरा प्रयास रहता है कि तात्कालिक या मांग पर लिखी गई रचना यहां तक कि वाट्सएप समूहों में लिखी चंद पंक्तियों को भी मैं बेकार न जानें दूं। मैं उन्हें सहेज कर रखता हूं और उन पर पुनः पुनः काम करते हुए उन्हें संवारता रहता हूं। सार्वकालिक लंबी रचनाओं में रूपांतरित करने के प्रयास करता रहता हूं।
जब नौकरी में था तब कोई विचार, विषय या सूत्र ध्यान में आता मैं अपने बैंक के लेज़रों में रखे जाने वाले फ्लैग पर नोट कर जेब में रख लेता। ऐसे कई फ्लैग मेरी रचनाओं के लिखे जाने में सहायक बनते रहे। शुरुआती स्तंभीय व्यंग्य लेख इसी तरह अखबारों में छप जाते तो उत्साह बढ़ जाता था। इन्हीं बीज लेखों पर मैने पुनः पुनः काम किया और वे मेरे संग्रहों में सार्वकालिक रचनाओं के रूप में पाठकों तक पहुंचे।
मैं कभी भी यह सोचकर बैठता नहीं कि अभी लिखना है। लिखने का कोई खास समय निर्धारित नहीं है। यह जरूर है कि ज्यादातर रचनाओं का पहला प्रारूप गुसलखाने अथवा देर रात सोने के पहले भीतर उथलपुथल मचाने लगता है। तब उसी वक्त बगैर देरी किए लिख डालता हूं। इसके बाद ही अन्य कामों में मेरा मन लगता है। यह अवश्य है रचना को संवारने का काम बाद में चलता ही रहता है। रहा काम रावण से भी नहीं होता, इस उक्ति में मेरा संपूर्ण विश्वास है। किसी भी रचनात्मक अवसर को जहां तक संभव होता है उसे मैं गंवाने की भूल नहीं करता। मैं जानता हूं कि इससे कहीं न कहीं मेरा ही रचनात्मक विकास ही जुड़ा होता है।
जिस विषय या विचार पर मैं लिखना चाहता हूं ज्यादातर वे अपनी विधा स्वयं चुन लेते हैं। ज्यादातर लेखक कविता से गद्य की ओर आगे बढ़ते हैं , मैने गद्य पहले लिखा, बाद में कविता की ओर आया हूं। हर विधा में पूरी क्षमता और उसके अनुशासन को समझकर लिखने की कोशिश रहती है। पत्र लेखन,बाल साहित्य और व्यंग्य लेखन ने मुझे कविता लेखन में भी मदद की है। मेरा मानना है जब कविता में व्यंग्य के तत्व शामिल होते हैं, वह प्रभावी और सार्थक हो जाती है। ऐसा ही जब कोई गद्य, कविता की तरह होता जाता है वह अधिक बेहतर प्रभाव छोड़ जाता है। सभी विधाएं एक दूसरे की पूरक होती है। सभी विधाओं में अच्छी रचना का सृजन समान रूप से मुश्किल होता है। जब किसी विधा में मैं अपने आप को दोहराने लगता हूं, कदमताल करने लगता हूं, तब अन्य विधा में सक्रिय हो जाता हूं, कुछ नया करने लगता हूं। कविता के बाद यह गैप मुझे कविता में बेहतर करता है, ऐसा ही गद्य रचनाओं में भी मेरे साथ होता है। इसी जरूरी ब्रेक में मैने संस्मरण लिखे, किताबों पर चर्चाएं लिखीं, यूट्यूब वीडियो बनाए। अपने आपको किसी तरह नए सृजन के लिए सक्रिय रखने की कोशिश की।
पिछले दस बारह वर्षों से कागज पर कलम से नहीं लिखा है। मोबाइल और टेबलेट पर लिखता हूं। लैपटॉप पर पांडुलिपि बनाता हूं। हर रचना अपने विभिन्न ब्लॉगों में पोस्ट कर सहेज लेता हूं। यही कारण है कि मेरे लिए कोई भी रचना को संशोधित करना आसान हो जाता है।
मेरी रचना प्रक्रिया तो लगभग यही रहती आई है। विषय चयन, विचारधारा, सरोकारों और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर कभी अलग से बात की जा सकती है। इनका भी सार्थक समकालीन लेखन में बड़ा महत्व होता है।
*ब्रजेश कानूनगो*