लघुकथा पर वरिष्ठ साहित्यकार ब्रजेश कानूनगो से नेतराम भारती का साक्षात्कार
प्रश्न :- सर! लघुकथा आपकी नजर में क्या है लघुकथा को लेकर बहुत सारी बातें जितने स्कूल उतने पाठ्यक्रम वाली स्थिति है यदि नव लघुकथाकार के लिए सरल शब्दों में आपसे पूछा जाए तो आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे ?
ब्रजेश कानूनगो : लघुकथा जीवन की संवेदनाओं, प्रसंगों, प्रतिक्रियाओं, संभावनाओं, कामनाओं, आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का एक साहित्यिक माध्यम है,जो रचनाकार द्वारा संक्षिप्त कथात्मक प्रारूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसमें लेखक अपनी अभिव्यक्ति को कई शैलियों में पाठको तक पहुंचाता है। नए प्रयोग भी करता है। लघुकथा का एक तरह से यह विकास क्रम भी कहा जा सकता है।
प्रश्न :- सर! आपकी दृष्टि में साहित्य क्या है ?
ब्रजेश कानूनगो : साहित्य को प्रारंभ से ही समाज का दर्पण कहा जाता रहा है। यह एक तरफा नही है, समाज का प्रतिबिंब यदि साहित्य में दिख रहा हो तो दूसरी तरफ साहित्य भी समाज पर अच्छे बुरे प्रभाव के लिए उत्तरदायी हो सकता है। इसीलिए अच्छे साहित्य की पहचान बहुत जरूरी है। हर लिखा साहित्य नहीं होता। शब्दों को क्रमबद्ध रूप से पिरो देने भर से खूबसूरत साहित्यिक रचना नहीं बन जाती। साहित्य एक स्वीकार्य अनुशासन में लिखी अभिव्यक्ति है, हर विधा का एक सौंदर्य शास्त्र क्रमशः विकसित होता चला जाता है। अंततः साहित्य मनुष्य, समाज और संसार को सुंदर बनाने का एक रचनात्मक प्रयास है। साहित्य का काम ही है बोध कराना। विधा को कुछ भी नाम दें दें। सच का बोध या सृजन का प्रयोजन हासिल न हो तो उस साहित्य का क्या मोल?
प्रश्न :- सर! आपके लिए लेखन का क्या महत्व है?
ब्रजेश कानूनगो : लेखन सुंदर समाज, मनुष्य और दुनिया के विकास की आकांक्षा का परिणाम है। यदि रचना में यह सब लेखक कर पाता है तो वह अपना महत्व प्रमाणित करता है। रचना महत्वपूर्ण कही जा सकती है।
प्रश्न :- समकालीन लघुकथाकारों के सामने आप क्या चुनौतियाँ देखते हैं?
ब्रजेश कानूनगो : लघुकथाकार ही नहीं हर विधा के लेखक के सामने अनेक चुनौतियां रहती हैं। लघुकथाओं की बाढ़ में कितने सचमुच के जवाहरात बहकर साहित्य के मैदान में चमकते हैं यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। अधिकांश में साहित्य विवेक बहुत कम नजर आता है। बहुत सी आज लिखी,कल समाप्त की श्रेणी की होती हैं। बहुत कम लघुकथाएं ऐसी हैं जिनमे विचारधारा, सरोकार और प्रतिबद्धता की झलक दिखाई देती हों। मेरा मानना है जिन लघुकथाओं में समय के सवालों और चुनौतियों पर कलम चलाई गई होती हैं वही साहित्य की स्थायी धरोहर बनती हैं, वरना अन्य का हाल भी अखबार या पत्रिका के अस्तित्व की तरह ही बहुत लघु ही होता है, जिन्हें कोई याद नहीं रख पाता। कई में अनेक तरह के दुहराव भी नजर आते हैं लेकिन इनमें से ही श्रेष्ठ लघुकथाएं निकलकर आने की संभावनाएं भी पैदा होती है।
जिस दौर में टेक्नोलॉजी का व्यापक विकास हो गया हो, स्त्रियों की आर्थिक और सामाजिक स्थितियों में बदलाव आया हो। तब लघुकथाओं में भी इनका नजर आना स्वाभाविक रूप से अपेक्षित है। भूमंडलीकरण और उदारीकरण के बाद समाज में कई बदलाव हुए है। पाखण्ड,धूर्तताओं ,चालाकियां और सांस्कृतिक प्रदूषण के आगमन के साथ समाज का नैतिक अवमूल्यन हुआ है। बाजारवाद ने हरेक वस्तु को बिकाऊ, यहां तक कि देह, आत्मा और मूल्यों तक की बोलियां लग जाने को अभिशप्त किया है। परिवारों में रिश्तों की मधुरता और सम्मान के साथ छोटे-बड़ों के बीच का कोमल और संवेदन सूत्र टूटने लगा है। घर के बुजुर्ग हाशिये पर हैं।
दुनिया को जीत लेने की किसी शहंशाह की ख्वाहिश की तरह राजनीति के नायक-महानायक किसी भी हद तक जाने को तैयार दिखाई देते हैं। सत्ता सुख की खातिर अपने पितृ दलों को डूबते जहाज की तरह कभी भी त्याग देने में नेताओं, प्रतिनिधियों को कोई परहेज नहीं होता। असहमति किसी भी स्तर पर स्वीकार्य नहीं। आश्वासन और विश्वास जुमलों की तरह इस्तेमाल हो रहे हैं। हिंदीभाषा और देवनागरी लिपि को नष्ट भ्रष्ट करने में उन्ही संस्थानों और अखबारों की मुख्य भूमिका दिखाई देती है जिन पर उनके संरक्षण की उम्मीद लगी रही हो। नए समय के बहुत से नए सवाल हैं,जिन पर गंभीरता से लघुकथाएं ही नहीं अन्य विधाओं में भी रचनाएँ लिखी जाना चाहिए। इस मामले में अभी संतोष कर लेने की स्थिति नहीं कही जा सकती..लेकिन भरोसा जरूर किया जा सकता है कि ऐसा अवश्य होगा। अच्छी और सार्थक लघुकथा व लेखकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही अक्सर सामने आकर खड़ी हो जाती है।
प्रश्न :- लघुकथा विधा में आपकी विशेष रुचि कब और कैसे उत्पन्न हुई?
ब्रजेश कानूनगो : लघुकथा में रुचि तो इसे लघुकथा विधा माने जाने के संघर्ष के काफी पूर्व ही हो चुकी होगी। पंचतंत्र और अन्य अनेक लोककथाएं पढ़ते हुए भी परोक्ष रूप से रुचि हो ही जाती है। अपने बचपन में ऐसी अनेक प्रेरक और संदेश परक कथाओं से गुजरते गुजरते ही आधुनिक लघुकथा में अकस्मात हम प्रवेश कर लेते हैं। अपने समय की दीन दुनिया की सच्चाइयों, विडंबनाओं ,जीवन दर्शन की उतनी बात शायद नहीं करती थीं बोधकथाएँ, जितनी समकालीन लघुकथाएं करती हैं।
बोधकथाओं में कोई सीख और उपदेश का भाव जरूर होता रहा है। यदा-कदा बोध कथाएं कठिनाइयों से उबरने का कोई रास्ता सुझाने का प्रयास भी करती हैं।
वर्तमान में अब समाज और साहित्य का जब पर्याप्त विकास हुआ है, सच्ची और अच्छी लघुकथाएं सार्थक टिप्पणी के साथ अपने समय की सच्चाइयों का बोध कराने का प्रभावी प्रयास करती हैं। यही कारण है कि लघुकथा में इस तरह रुचि बढ़ती गई।
प्रश्न :- लघुकथा,कहानी और उपन्यास के बीच क्या अंतर है,आपके दृष्टिकोण से?
ब्रजेश कानूनगो : ये तीनों विधाएं किसी न किसी कहानी की अभिव्यक्ति के अलग प्रारूप हैं। इनमे आप नाटक, एकांकी, नौटंकी, पंडवानी, माच, सिनेमा जैसे माध्यमों को भी जोड़ सकते हैं। ये सभी कहानियां ही कह रहे हैं। विषय, प्रसंग, संवेदनाएं, घटनाक्रम आदि सभी अपना विस्तार चुन लेते हैं। जिस विधा में जो बात अपनी श्रेष्ठता में संभव हो जाती है वही लेखक से चुनाव करवा ले जाती है। जैसा मैंने पूर्व में कहा सभी विधाओं का अपना सौंदर्य शास्त्र विकसित हो जाता है। कहानी, उपन्यास और लघुकथा का भी। देशकाल और समय के साथ इसमें बदलाव होते रहते हैं। उपन्यास, कहानी और लघुकथा में अंतर की अकादमिक बहस को प्रबुद्ध पाठकों के साथ साझा करना बेमानी होगा। मैं किसी विधा के विकास के आंदोलन के झंडाबरदार की बजाए एक लेखक के तौर पर अपनी बात कहना चाहता हूं।
प्रश्न :- एक लघुकथा में सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व आप किसे मानते हैं ?
ब्रजेश कानूनगो : जैसा मैंने पूर्व में कहा है, लघुकथा में समकालीन यथार्थ को विषय बनाना सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं। इससे रचना अपने समय की साक्षी बन जाती है। भविष्य में जब इतिहास बदल दिया जाता है तब भविष्य के पाठक अपने भूतकाल को सही परिप्रेक्ष्य में साहित्य में तलाश पाते हैं।
प्रश्न :- आजकल देखने में आ रहा है कि लघुकथा की शब्द सीमा को लेकर पूर्व की भांति सीमांकन नहीं है बल्कि एक लचीलापन देखने में आ रहा है । अब आकार की अपेक्षा कथ्य की संप्रेषणीयता पर अधिक बल है । मैं छोटी बनाम लंबी लघुकथाओं की बात कर रहा हूंँ । आप इसे किस रूप में देखते हैं ?
ब्रजेश कानूनगो : मैं कहानी को कहानी की तरह ही लिखता रहता हूं। मित्र कुछ में लघुकथा के तत्व पा लेते हैं तो खुशी होती है। मेरे कथासंग्रह ' रिंगटोन ' को मैने छोटी बड़ी कहानियां ही कहा है। विषय और संप्रेषण मेरे लिए महत्वपूर्ण है। विस्तार और विधा का चयन रचना स्वयं करती जाती है। जब बात बनती नहीं तो अन्य माध्यम चुन लेता हूं। हरेक लेखक को इस मामले में पूर्ण स्वतंत्रता देना शायद उचित ही होगा।
प्रश्न :- क्या लघुकथा साहित्य में वह बात है कि वह एक जन आंदोलन बन जाए अथवा क्या वह समाज को बदल सकने में सक्षम है?
ब्रजेश कानूनगो : एक लेखक का सही काम अपने समय की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करना होता है। साहित्यकार का काम इशारा भर करना है। दूसरी ओर विचारक, चिंतक और विशेषज्ञ उचित अध्ययन के बाद समाधान का रास्ता खोजने का उपाय करते हैं। इसके आगे की जिम्मेदारी प्रायः नीति निर्धारकों की योजना बनाने और प्रशासन को लागू करने की होती है। लेखक हमेशा गलत के विरोध में होता है। लेखक के तौर पर वह लिखता है, उसका लिखा यदि जन गीत बनकर कार्यकर्ताओं की सभा में गाया जाता है तो उसका परोक्ष योगदान तो बदलाव या आंदोलन की दिशा में हो ही सकता है। ऐसे अनेक उदाहरण हमारे स्वर्णिम अतीत में खोजे जा सकते हैं जब साहित्यकारों ने क्रांति की मशालें भी थामी और उनकी कलम ने शब्दों की जगह जागरण की ज्वाला प्रज्जवलित हुई है।
हरेक व्यक्ति की सीमा है। साहित्यकार की भी। वह अपना काम निष्ठा और ईमानदारी से करता है तो वह भी काफी होगा। जो इससे अधिक कर सकता है तो वह कुछ अधिक दे रहा साहित्य और समाज को। लेकिन हरेक की अपनी क्षमता और सीमाएं भी होती हैं। हर व्यक्ति प्रेमचंद या परसाई नहीं होता। और न ही हर लेखक जवाहरलाल नेहरू जिसके अपनी बेटी को लिखे पत्र भी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान बना लेते हैं। लघुकथाकर के संदर्भ में भी यह बात कही जा सकती है।
प्रश्न :- क्या आपको लगता है कि समकालीन लघुकथाएं समाज के वास्तविक मुद्दों को प्रतिबिंबित करती हैं?
ब्रजेश कानूनगो : इस प्रश्न का उत्तर कुछ हद तक पूर्व में विस्तार से दे चुका हूं। बहुत सी लघुकथाएं वास्तविक मुद्दों का चित्रण करती हैं किंतु इससे अभी संतोष नहीं किया जा सकता।
प्रश्न :- लघुकथा आज एक सर्वप्रिय विधा है बावजूद इसके, पाठकों तक लघुकथा की अधिकाधिक पहुंँच और उनमें इसके प्रति और जुड़ाव और जिज्ञासा को बढ़ाने के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे ?
ब्रजेश कानूनगो : सबसे बड़ी चिंता तो पाठकों का ही छपे साहित्य से दूर होते जाना है। पाठको को पुस्तकों से जोड़ना होगा। पत्र पत्रिकाओं में फिलर की तरह साहित्य कॉलमों में लघुकथाओं के प्रकाशन की जगह श्रेष्ठ और सार्थक रचनाओं का चयन करना होगा। अच्छी लघुकथाओं के मंचन और फिल्मांकन पर भी जोर देना होगा। पुरस्कारों की अतिवृष्टि से बचा जाना चाहिए। पुरस्कारों की संख्या कम से कम हो, जो श्रेष्ठता के नवोन्मेष प्रयासों और गुणवत्ता पर ही प्रदान किए जाएं। पुरस्कार प्राप्ति की वास्तविक लालसा लेखकों में पैदा हो सके, ऐसे प्रयास होने चाहिए।
प्रश्न :- सर ! लघुकथा के ऐसे कौन- से क्षेत्र हैं जिन्हें देखकर आपको लगता है कि अभी भी इनपर और काम करने की आवश्यकता है ?
ब्रजेश कानूनगो : इस प्रश्न पर मेरे लिए अलग से कुछ कह पाना कठिन होगा। लघुकथा के सौंदर्य शास्त्र के विकास पर काम कर रहे वरिष्ठ विद्वजन प्रकाश डाल पाएंगे।
प्रश्न :- एक और प्रश्न । यह शायद सभी लघुकथाकार मित्रों के जहन में घुमड़ता होगा कि आमतौर पर पत्र-पत्रिकाओं और लघुकथा आधारित प्रतियोगिताओं में एक शर्त होती है कि लघुकथा अप्रकाशित , मौलिक व अप्रसारित ही होनी चाहिए । इस आलोक में प्रश्न यह उठता है कि क्या एक बार रचना प्रकाशित हो जाने के बाद,अपनी उपयोगिता बड़े पाठक वर्ग , बड़े मंचों या अन्य पत्र-पत्रिकाओं या आलोचकों- समीक्षकों की प्रशंसा- आलोचना को प्राप्त करने का हक खो देती है ? क्या उस लघुकथा का पुनः प्रयोग नहीं किया जा सकता है ? इस पर आप क्या कहेंगे ?
ब्रजेश कानूनगो : अब न तो पहले जैसा व्यापक पाठक वर्ग है न पहले की तरह याद रह जाने वाली बहुत सी रचनाएं और महत्वपूर्ण पत्रिकाएं रह गईं हैं। मानदेय देने वाले प्रकाशन संस्थान भी नहीं रहे। सबके अपने पाठक, अपनी पत्रिका, अपने सदस्य हैं। अलग अलग पाठक वर्ग में यदि श्रेष्ठ रचनाएं पहुंचती हैं तो कोई बुराई भी नहीं। श्रेष्ठ तो बार बार पढ़ा जाए तो अपना काम करेगा ही। समीक्षा और आलोचना की बजाए अब तो किसी प्रतिभावान नए लेखक को लिखते रहने देने को प्रोत्साहित करना ज्यादा जरूरी है। नए लेखक को बचाने की हम सबकी जिम्मेदारी है। पढ़ते पढ़ते संवेदनशील लेखक खुद ही अपना आलोचक बनकर श्रेष्ठता की ओर बढ़ता जाता है।
प्रश्न :- सर! वर्तमान लघुकथा में आप क्या बदलाव महसूस करते हैं ?
ब्रजेश कानूनगो : पाठक,लेखक और रचना अपना रास्ता स्वयं चुनते रहते हैं। यह स्वाभाविक रूप से होता है, हम कुछ सुझा नहीं सकते।
प्रश्न :- आपको अपनी लघुकथाओं के लिए प्रेरणा कहाँ से मिलती है?
ब्रजेश कानूनगो : जीवन से।
प्रश्न :- सर एक प्रश्न और सिद्ध लघुकथाकारों को पढ़ना नए लघुकथाकारों के लिए कितना जरूरी है जरूरी है भी या नहीं क्योंकि कुछ विद्वान कहते हैं कि यदि आप पुराने लेखकों को पढ़ते हैं तो आप उनके लेखन शैली से प्रभावित हो सकते हैं और आपके लेखन में उनकी शैली के प्रतिबिंब उभर सकता है जो आपकी मौलिकता को प्रभावित कर सकती है इस पर आपका क्या दृष्टिकोण है ?
ब्रजेश कानूनगो : केवल वरिष्ठ लघुकथाकारों को ही नही, हर विधा के वरिष्ठों को पढ़ना चाहिए। साहित्य ही नहीं इतिहास, भूगोल, विज्ञान,राजनीति, समाज विज्ञान, दर्शन और आधुनिक विषयों को भी पढ़ना चाहिए। पत्रकारिता और अन्य भाषा के अनुवादों को भी। मौलिक तो कुछ नहीं होता, हर चीज एक परंपरा का हिस्सा होती है। आज की कविता में जो कुछ है उसमें कालीदास, सूरदास, कबीर से लेकर निराला, मुक्तिबोध की परंपरा शामिल है। मूल्य वही हैं, नीति, अनीति वही है, अच्छा बुरा वही है, बस शैली और शब्द बदलते हैं, सुख, दुख और संवेदनाएं भी वही रहती हैं।
प्रश्न :- आपके अनुसार, एक अच्छी लघुकथा की विशेषताएं क्या होती हैं?
ब्रजेश कानूनगो : वही जो वरिष्ठ लघुकथालोचक कहते हैं, संक्षिप्तता, सटीकता, संप्रेषणीयता और अंततः सार्थक कथ्य।
प्रश्न :- लघुकथा लिखने की प्रक्रिया के दौरान आप किन चुनौतियों का सामना करते हैं?
ब्रजेश कानूनगो : लिखने की मनःस्थिति बन पाने की चुनौती सबसे बड़ी होती है।
प्रश्न :- आपके पसंदीदा लघुकथाकार कौन-कौन हैं और क्यों?
ब्रजेश कानूनगो : कभी इस तरह विचार नहीं किया। विष्णुनागर जी और चैतन्य त्रिवेदी जी की दो लघुकथाओं पर जरूर सुकेश साहनी जी ने लिखवा लिया था। समकालीन विसंगतियों पर उनकी व्यंग्यात्मक राजनीतिक टिप्पणियां इन लघुकथाएं में की गईं हैं। वैसे आज के सभी चर्चित लेखकों की कुछ लघुकथाएं बहुत अच्छी लगती रही हैं।
प्रश्न :- क्या आपको लगता है कि समकालीन लघुकथाएं आने वाले समय में लघुकथा साहित्य का भविष्य निर्धारित करेंगी अथवा आपके अनुसार लघुकथा का क्या भविष्य है ?
ब्रजेश कानूनगो : भविष्य तो उजला है। यही कामना भी है। केवल लघुकथा को इसका श्रेय देना ठीक नहीं। साहित्य के भविष्य में सारी विधाओं को शामिल किया जाना चाहिए।
प्रश्न :- अगर आपसे पूछा जाए कि उभरते हुए अथवा लघुकथा में उतरने की सोचने वाले लेखक को कुछ टिप्स या सुझाव दीजिए, तो एक नव-लघुकथाकार को आप क्या या क्या-क्या सुझाव देना चाहेंगे ?
ब्रजेश कानूनगो : हर लेखक लिखते समय अपने सर्वश्रेष्ठ को ही देने का प्रयास करता है किंतु अपनी कमियों और अपनी क्षमताओं से प्रायः परिचित नहीं होता। उसकी प्रतिभा का विकास भी धीरे धीरे ही होता है। श्रेष्ठता के भ्रम से निकलकर उसे अपने लिखे से ही अपना मुकाबला करना चाहिए। पहले से और बेहतर होते जाना ही एक रास्ता है। बाकी चीजे पूरक की तरह हमारी मदद करती हैं। खूब पढ़ें, थोड़ा लिखें, खुद समीक्षक बनें, पाठक की तरह पढ़ें। वरिष्ठों और क्लासिक रचनाओं को पढ़ते रहने को आदत बना लें। बस इतना ही कहना चाहता हूं।
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