बुजुर्ग जीवन का योगासन
योगाचार्य जी की समस्या यह थी कि अब वे बूढ़े हो गए थे। पत्नी कोई पच्चीस बरस पहले ही उनका साथ छोड़कर चली गई थीं। एक मात्र बेटी विवाह पश्चात दामाद संग जर्मनी जा बसी।
कोई कितनी ही कोशिश कर ले वह बुढ़ापे को आने से रोक नहीं सकता। वे योगाचार्य थे इसलिए उन्होंने अपने शरीर को असमय के क्षय से काफी बचा रखा था। धन और तन दोनों को वे पूंजी मानते थे और उसे अंत तक बचाए रखना चाहते थे लेकिन पिचासी वर्ष की आयु में आते आते स्वास्थ्य दगा देने लगा। योग आदि भी छूट गया। बदलते समय और समाज से कटते चले गए। किसी से बातचीत तक करने को तरस जाते। बोलने, बात करने की उत्कंठा उन्हे बैचेन किए रहती थी।
धन की पूंजी शरीर के इलाज पर खर्च की जा सकती है लेकिन मन को कैसे ठीक करें। रेडियो, टीवी मनुष्य का विकल्प नहीं हो सकते। टिफिन सेंटर से एक बालक उनका भोजन लेकर रोज आता था। उसी से थोड़ा अपने पास बैठने को कहते। हाल चाल जानते, कहते।
दिनेश एक ऑटो ड्राइवर का बेटा था और अपनी पढ़ाई के साथ साथ टिफिन पहुंचाने का काम भी किया करता था। उसी ने जब उन्हें बताया कि परीक्षाओं के कारण वह अब बैठकर बातचीत नहीं कर पाएगा तो वे निराश हो गए।
दूसरे दिन दिनेश से कोई एक दो वर्ष छोटी लड़की टिफिन लेकर आई। कहने लगी, भैया अब परीक्षा की तैयारी में लगे हैं इसलिए वही उनके पास आएगी और पूरे दिन उनके साथ रहेगी, बातें भी करेगी। कागज और कपड़े की थैलियां बनाने का रोज का अपना काम वहीं बैठकर किया करेगी।
और इसके साथ ही उनके बुजुर्ग जीवन के स्वर्णकाल का शुभारंभ हो गया। संवाद, अपनत्व और भावनाओं के पर्यावरण में जीवन की सूखी बगिया में दिनेश और रत्ना ने खुशियों के फूल खिला दिए। मन की बीमारी के इस इलाज पर उन्होंने धन की पूंजी न्यौछावर कर दी। दिनेश तहसीलदार बन गया और रत्ना क्राफ्ट सेंटर की मालिक होकर विदेशों तक में सॉफ्ट ट्वॉयज निर्यात करने लगी।
बुजुर्ग योगाचार्य का यह नया योगासन सचमुच बड़ा फलदाई और अनुकरणीय रहा। वे तन और मन से निरंतर स्वस्थ होते चले गए।
ब्रजेश कानूनगो