Monday, December 21, 2020

निष्पक्ष संवाद

 निष्पक्ष संवाद

सुबह की सैर के दौरान दो व्यक्ति बातचीत कर रहे थे।

"टीवी पर कौनसी चैनल की खबरें देखते हैं आप?"

"फ़लानी' चैनल की।"

"अच्छा,'ढिकानी' की नहीं देखते क्या?" 

"बिल्कुल नहीं!"

"क्यों?"

"वह हमारे 'पक्ष' की चैनल नहीं है।"

"ओके,ओके, हम भी नहीं देखते 'फलानी' चैनल।" 

"अच्छा, तो मिलते हैं फिर कभी।"

चौराहे पर आकर दोनों नागरिक अपने अपने रास्तों पर आगे बढ़ गए। उन्हें पता ही नहीं था कि इसी चौराहे के समीप एक व्यक्ति ठंड से पिछले दिनों मर गया था। 

मरने वाले व्यक्ति का कोई पक्ष नहीं था।


000

ब्रजेश कानूनगो

Friday, September 4, 2020

लिफाफा

लिफाफा

'पिताजी आप घर चलिए, कब तक यहां वृद्धाश्रम में अकेले घुटते रहेंगें!'

'बेटा, अब तो कोई घुटन नहीं होती यहाँ। यहां के हमउम्र साथी सगे रिश्तेदारों की तरह ही हो गए हैं। जब तुम पांच वर्ष पहले तुम्हारी माँ के जाने के बाद यहां छोड़ गए थे,तब जरूर बहुत अकेलापन लगता था। अब सब ठीक है,मन लग गया है यहां।'

'परन्तु पिताजी, अब आपका पोता राहुल भी बड़ा हो गया है। बहुत याद करता है आपको। संध्या ने भी आपकी सेवा के लिए अपनी नौकरी छोड़ दी है।वह भी आपका अब पूरा ध्यान रखेगी। आप चलिए भी अब।'

'बेटा, मैंने तो सुना था संध्या की कम्पनी में हुई छंटनी में कई कर्मचारियों को जबरन हटाया गया था?'

'हाँ, वह भी है ,पर उसने नई नौकरी नहीं की है।'

'पर बेटा, मेरा घर लौटना तो मुश्किल ही है अब। तुम ही आते जाते रहना।'

'खैर पिताजी, जैसी आपकी मर्जी! आपके दफ्तर में  आपकी पेंशन और अन्य राशि के दावे का प्रकरण निपट गया है। पिछले बीस वर्षों की कोई पचास लाख की राशि मय ब्याज के आपको मिली है। इस प्रपत्र पर आपके हस्ताक्षर करके भिजवाना है उन्हें सात दिनों में।'

पुत्र ने एक सरकारी लिफाफा पिता के हाथों में रख दिया।

000