Monday, June 5, 2017

जामुन

कहानी
जामुन 
ब्रजेश कानूनगो 

नवजात पोते के साथ पहली बार घर आ रहे बहू बेटे के स्वागत की तैयारियों में सब लोग व्यस्त थे। सार्थक अपनी पत्नी नैन्सी और छः माह के बेटे के साथ पहली बार नैरोबी से आनेवाला था और इधर आज सुबह से ही माँ जामुन की रट लगाए बैठीं थीं।

कल मानसून पूर्व की बारिश हुई थी । तेज धूल भरी आंधी आई फिर बड़ी-बड़ी बूंदों ने कार पार्किंग के टीन शेड पर ताल देकर सामने लगे नीम की डालियों और पत्तियों के नृत्य को संगत दी। कुछ निम्बोलियाँ भी टपक कर सड़क पर बिखर गईं।

मौसम के इस बदलते राग को सुनते हुए माँ को फिर से याद आया अपना घर-आंगन। जामुन पक गए होंगे। तेज हवा से पके हुए जामुन आंगन की मिट्टी में गिर रहे होंगे। पता नहीं ज्ञानू ने पेड़ के नीचे चादर बांधी होगी या नहीं। गिरे हुए जामुनों में मिट्टी ,कंकर भीतर प्रवेश कर लेंगे तो जामुन खाने योग्य नहीं रह जाएंगे।

गाँव में हमारे पुश्तैनी घर के आंगन में अमरूद, सहजन,आंवला,नीम, अनार,पपीता आदि बहुत से फलदार और औषध पेड़ पौधे लगे हुए हैं लेकिन जामुन पर माँ ख़ास तौर से जान छिड़कती हैं। 
अक्सर बताती हैं कि बचपन से ही उन्हें जामुन खाने का बड़ा शौक था। उनके पिताजी के खेतों पर बावड़ी के नजदीक जो खास पेड़ थे, उनमें एक कबीट का था और दूसरा जामुन का। 
उनकी जमीन पर  तीन कुएं और दो बावड़ियां थीं। खेत की पहचान भी पेड़, कुओं, बावड़ियों आदि के नाम से होती थी। एक पुरानी बावड़ी की दीवार टूट गई थी तो पास वाला खेत फूटी बावड़ी वाला खेत कहलाता था। जब उसके पास लगे पेड़ पर जामुन फलने लगे तो फिर वह जामुन वाला खेत के नाम से पुकारा जाने लगा। ऐसे ही भंवरिया कुआं के पास आम वाला खेत था। नई बावड़ी के पास बगिया लगी थी, जिसमें गुलाब,गुलदावदी सहित नींबू के पेड़ लगे थे। ब्याह के बाद माँ ने ससुराल आकर भी उसी वातावरण को बनाये रखने के लिए यहां भी जामुन आदि के पेड़ पौधों को पाल पोसकर बड़ा किया था। 

महानगर में बचे छोटे से गाँव के टुकड़े जैसा है हमारा यह नया विकसित इलाका. कुछ पेड़ पौधे भी हमारे पड़ोसी हैं. बारिश की शुरुआत में पेड़ से  निम्बोलियाँ गिरते देख घर के जामुन याद आ रहे थे माँ को । बहुत दिनों से मन ही मन सोच रहा था आते जाते ग्रेटर कैलाश रोड या तिलकनगर से उनके लिए जामुन लेता आऊं। वहां मिल भी जाते हैं, नई आवक के महंगे फल वहीं मिल पाते हैं, खरीदने वाले भी उधर ही होते हैं। गांव से साइकिलों पर आए किसानों से खरीदकर स्थानीय  फल वाले मुनाफे पर बेचते हैं शौकीनों को। शुरुआत में तो तीन सौ रुपये किलो तक भाव होता है जामुनों का । हर कोई तो जामुन खरीदता नहीं। शौकीन तबीयत नौजवान और अस्पताल के बाहर दवाई की तरह भी खरीद लेते हैं  कुछ शुगर पीड़ित लोग। 

माँ को मधुमेह है। जबरदस्त जामुन शौकीन होने के बावजूद बीमारी ने उन्हें घेर लिया है। जब से पता चला इस बीमारी का तब से घर के जामुन के पेड़ और जामुनों की देखभाल भी बढ़ गई। जामुन तो जामुन गुठलियों को भी प्यार मिलने लगा। जामुन की गुठलियों, मैथी दाना और नीम पत्तियों आदि का चूर्ण बनाकर वे अपने पास रखती हैं। अब इस चूर्ण से उन्हें कितना लाभ मिलता है यह तो वही जानें।

जामुन के कारण ही शायद उन्हें जामुनी रंग से भी भारी लगाव है। कोई उन्हें जामुनी शॉल या साड़ी भेंट कर दे तो वे उसी तरह अब भी खिल उठती हैं जैसे कभी फूटी बावड़ी के जामुन के पेड़ के तले पिताजी के साथ जामुन खाते हुए लजाते खिल उठती रहीं होंगी। 

अपनी बीमारी के चलते उन्हें यहां महानगर में आना पड़ा। यह मजबूरी भी थी उनकी, वरना अपने पति का घर  छोड़ना वे कभी स्वीकार नहीं करती। कुमार अम्बुज की कविता की तरह माँ अतिथि ही रहीं हमारे यहां  
 
नाराज थो थी हीं वे हम से। वे चाहती थी पोता इधर देश में ही जाति
, बिरादरी की लड़की से विवाह करे। यह भी क्या कि परदेस में जाकर वहीं की लड़की से ब्याह कर लिया। नैरोबी में अपने साथ काम करने वाली सहयोगी को सार्थक अपना दिल दे बैठा था। ऊपर से वह सांवली भी थी। इस मामले में माँ की सौंदर्य दृष्टि पारंपरिक ही थी।  फिर भी पौत्र वधु और प्रपौत्र के स्वागत के लिए बहुत उत्साह था उनके मन में। 

सार्थक की टैक्सी घर के सामने रुकी। पत्नी ने बच्चों की आरती उतारी । नैंसी की गोद में जामुनी टॉवेल में लिपटा माँ का पड़पोता किसी मखमली सॉफ्ट टॉय सा खूबसूरत लग रहा था।
माँ ने नन्हे को गोद में लिया स्नेह से दुलारा,  प्यार से उसकी चुम्मी ली, ममत्व भरी खुशी से बोल उठीं मेरा प्यारा जामुन'!माँ की आँखें छल छला आईं थीं।

ब्रजेश कानूनगो
503, गोयल रिजेंसी,चमेली पार्क, कनाडिया रोड, इंदौर-452018